कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रचार का आज आखिरी दिन है. 12 मई यानी शनिवार को वहां वोट डाले जाएंगे. प्रचार के आखिरी चरण में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का पूरा मोर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभाला हुआ है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह लगातार यह दावा कर रहे हैं कि इस दक्षिण भारतीय राज्य में भाजपा को बहुमत मिलना तय है.

लेकिन चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में कर्नाटक से भाजपा के लिए अच्छी खबरें नहीं आई हैं. चुनाव प्रचार के काम में लगे उसके सहयोगी संगठनों के कार्यकर्ताओं में से कुछ अपना काम निपटाकर दिल्ली या अपने-अपने केंद्रों पर लौट चुके हैं. ऐसे कई लोगों से हुई बातचीत के आधार पर कर्नाटक की जो सियासी तस्वीर बन रही है उसमें 224 सदस्यों वाली कर्नाटक विधानसभा में भाजपा बहुमत पाती नहीं दिख रही.

कर्नाटक में चुनाव प्रचार के काम से लौटे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता कहते हैं, ‘कर्नाटक में कांग्रेस के पास सिद्धारमैया का चेहरा है. जमीनी स्तर पर उनका असर है. ऐसे में चुनाव प्रचार में भाजपा कार्यकर्ताओं को काफी दिक्कत हुई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपना एक प्रभाव हर जगह है, लेकिन विधानसभा चुनावों में स्थानीय नेतृत्व की निर्णायक भूमिका रहती है.’

भाजपा के पास भी कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा जैसा प्रभावी चेहरा है जो मुख्यमंत्री का भी उम्मीदवार है. तो फिर भाजपा सिद्धारमैया का मुकाबला क्यों नहीं कर पा रही? इस सवाल पर इस कार्यकर्ता का कहना है, ‘अभी कर्नाटक भाजपा में जितने नेता हैं, येदियुरप्पा निश्चित तौर पर उनमें से सबसे अधिक जमीनी पकड़ वाले नेता हैं. लेकिन एक चीज समझने की जरूरत है कि येदियुरप्पा एक बार भाजपा से बाहर जाने को बाध्य हुए और उसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और फिर दोबारा भाजपा में लौटे. इससे जमीनी स्तर के पार्टी कार्यकर्ताओं और आम लोगों में भी वापस लौटने वाले नेता की वह राजनीतिक हैसियत नहीं रहती जो पार्टी में रहते हुए पहले होती है. सच्चाई तो यह है कि अगर येदियुरप्पा अलग पार्टी बनाकर लड़ रहे होते तो हम सिद्धारमैया के मुकाबले में ही नहीं होते.’

कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए 113 विधायकों की जरूरत होती है. चुनावों से एक हफ्ते पहले की स्थिति में भाजपा के अपने सर्वेक्षणों में सीटों की संख्या 90 के आसपास आई है. सर्वेक्षण में यह बात भी आई है कि कांग्रेस भाजपा से आगे चल रही है. कांग्रेस की बढ़त बहुत ज्यादा नहीं बताई जा रही है लेकिन, भाजपा पर उसकी बढ़त लगातार बनी हुई है.

कर्नाटक के चार जिलों में पार्टी का काम देख रहे भाजपा के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी इस बारे में पूछे जाने पर कहते हैं, ‘हमें कितनी सीट मिलने का अनुमान हमारे खुद के सर्वेक्षण में है, यह बताना मेरे लिए ठीक नहीं होगा. लेकिन इतना कह सकता हूं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष समेत पार्टी की पूरी ताकत लगाने के बावजूद हमारी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘भाजपा के लिए आखिरी उम्मीद प्रधानमंत्री की रैलियां रहीं. पार्टी को उम्मीद है कि जिस तरह गुजरात में पिछड़ने के बाद जब आखिरी दिनों में लगातार प्रधानमंत्री मोदी की रैलियां हुईं तो फिजा बदल गई और भाजपा चुनाव जीत गई, उसी तरह का चमत्कार कर्नाटक में भी हो सकता है. अगर प्रधानमंत्री का जादू चला तो हम अपने बूते सरकार बनाने की स्थिति में आ सकते हैं.’

अगर भाजपा को अपने बूते बहुमत नहीं मिलता है तो उसका ‘प्लान बी’ क्या है? इस बारे में वे कहते हैं, ‘आखिरी दिन तक तो हमारी पूरी कोशिश है कि हम बहुमत के करीब पहुंचें. लेकिन अगर बहुमत नहीं मिलता है तो भाजपा के लिए अनुकूल स्थिति यह होगी कि कांग्रेस को भी बहुमत न मिले, भले ही वह सबसे बड़ी पार्टी रहे. कांग्रेस और भाजपा दोनों को बहुमत नहीं मिलने का मतलब यह है कि एचडी देवगौड़ा के जनता दल सेकुलर के पास ठीक-ठाक सीटें आएंगी. ऐसे में भाजपा उनकी पार्टी को अपने साथ लेकर कर्नाटक में सरकार बनाना चाहेगी.’

कुल मिलाकर कर्नाटक से लौटे और आखिरी दिन तक कर्नाटक में चुनाव प्रचार में लगे नेताओं और कार्यकर्ताओं की बातों से यह स्पष्ट दिख रहा है कि भाजपा को अपने बूते बहुमत पाने की उम्मीद नहीं है. उन्हें लगता है कि अगर नरेंद्र मोदी का जादू चला तो ही उन्हें बहुमत मिल सकता है. लेकिन अगर कांग्रेस को भी बहुमत नहीं मिलता है तो जानकारों के मुताबिक कर्नाटक चुनावों के बाद एक बार फिर गोवा और मणिपुर की घटनाएं दोहराई जा सकती हैं. इन राज्यों में भाजपा ने कम सीटों के बावजूद सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की थी. पार्टी नेताओं की बातचीत से लगता है कि किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में पार्टी इसी रणनीति पर चलने की तैयारी कर रही है.