भारत के प्रधानमंत्री ने कर्नाटक की एक चुनावी सभा में लोगों से पूछा कि ‘जब भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त जैसे स्वतंत्रता सेनानी जेल में थे, तब क्या कोई कांग्रेसी नेता वहां उनसे मिलने गया था?’जनसमूह की ओर से इस सवाल का जवाब आना चाहिए था कि ‘हां, गया था. स्वयं जवाहरलाल नेहरू गए थे मिलने.’ लेकिन भारत की जनता भारत के राजनेताओं से ज्यादा बड़ी दिलवाली है. यदि उस जनसभा में लोगों को यह बात मालूम भी रही होगी, तो उन्होंने नहीं बोला होगा. कारण कि हम अपने मेहमानों को, वह भी प्रधानमंत्री जैसे पदधारी व्यक्ति को शर्मिंदा करने की संस्कृति वाले नहीं हैं.

एक कारण यह भी हो सकता है कि जो व्यक्ति यह हिमाकत करता उसे अपनी पहचान कर लिए जाने का डर रहा होगा. फिर यदि सचमुच कोई ऐसा करता भी (हो सकता है किया भी हो!) तो उसकी आवाज उस भीड़ में वैसे ही खो जाती, जैसे कहावती नक्कारखाने में तूती की आवाज. इसे उस प्रतिवादी की धृष्टता में भी गिना जा सकता था. फिर हर सभा में प्रधानमंत्री के उपनाम के जयकारे लगाने वाले जोशीले युवकों द्वारा उस प्रतिवादी की धुनाई की भी भरपूर आशंका होती.

इस बात की पूरी संभावना है कि हमारे प्रधानमंत्री जी को उनके सलाहकारों ने बाद में भी यह बात नहीं बताई होगी. अब यह जनक और याज्ञवल्क्य वाला भारत तो है नहीं. यह राजा कृष्णदेव राय और तेनालीराम वाला भारत भी नहीं है और अकबर और बीरबल वाला भारत भी नहीं. यह चाटुकारों की फौज से घिरे रहनेवाले सत्तासीनों का भारत है. कहावत में है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे! इसलिए भाषण संबंधी उनकी रिसर्च-टीम के लोगों ने भी सोचा होगा कि प्रधानमंत्री जी के ज्ञानवर्द्धन करने की हिम्मत कौन करे!

तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है- सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।। यानी - मंत्री, वैद्य और गुरु, ये तीन यदि नाराजगी के डर या लाभ की आशा से हित की बात न कहकर ठकुरसुहाती कहने लगते हैं, तो राज्य, शरीर और धर्म, इन तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है. अपने प्रधानमंत्री के शुभचिंतक के रूप में हम ऐसा कभी नहीं चाहेंगे कि हमारे प्रधानमत्री दूसरी बार यह तथ्यात्मक गलती करके अपनी छवि खराब करें, इसलिए उनके हितार्थ यह बात दुहराई जा रही है.

आठ अगस्त, 1929 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू जेल में भगत सिंह और उनके साथियों से मिलने गए थे. अगले दिन यानी नौ अगस्त, 1929 को ‘दी ट्रिब्यून’ अखबार में इस पर एक रिपोर्ट भी छपी थी. जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार के विरोध में भगत सिंह और उनके साथी उस समय भूख हड़ताल पर थे. नेहरू ने जेल प्रशासन से उनकी पैरवी भी की थी और बाद में जेल प्रशासन का रवैया संभवतः बदला भी था.

अपनी आत्मकथा में नेहरू ने भगत सिंह से अपनी मुलाकात बारे में कुछ इस तरह लिखा है- ‘जब (जेल में भगत सिंह और जतीन्द्रनाथ दास की) भूख-हड़ताल एक महीने तक चल चुकी थी, उस दौरान मैं इत्तफाक से लाहौर पहुंचा. मुझे कुछ कैदियों से जेल में मिलने की इजाजत दे दी गई, और मैंने इसका फायदा उठाया. भगत सिंह से यह मेरी पहली मुलाकात थी. मैं जतीन्द्रनाथ दास वगैरह से भी मिला. भगत सिंह का चेहरा आकर्षक था और उससे बुद्धिमत्ता टपकती थी. वह निहायत गंभीर और शांत था. उसमें गुस्सा दिखाई नहीं देता था. उसकी दृष्टि और बातचीत में बड़ी मृदुलता थी. मगर मेरा खयाल है कि कोई भी शख्स जो एक महीने तक उपवास करेगा, आध्यात्मिक और मृदुल दिखाई देने लगेगा. ...भगतसिंह की खास हसरत अपने चाचा सरदार अजित सिंह, जो 1907 में लाला लाजपतराय के साथ जिला-वतन कर दिए गए थे, से मिलना या कम से कम उनकी खबर पाना मालूम हुई.’ (मेरी कहानी, पंडित जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा, पृष्ठ- 338-339, सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली, 1938)

द ट्रिब्यून अखबार की 10 अगस्त 1929 की रिपोर्ट जिसमें जवाहरलाल नेहरू के लाहौर जेल में भगत सिंह और उनके साथियों से मिलने का जिक्र है
द ट्रिब्यून अखबार की 10 अगस्त 1929 की रिपोर्ट जिसमें जवाहरलाल नेहरू के लाहौर जेल में भगत सिंह और उनके साथियों से मिलने का जिक्र है

वैसे इतिहास से जुड़ा गलत दावा करने से इतर भी प्रधानमंत्री जी इस प्रसंग में न ही पड़ते तो अच्छा था क्योंकि भगत सिंह के मामले में उस राजनीतिक परंपरा से जुड़ी संस्थाओं का इतिहास बहुत अच्छा नहीं है, जिससे प्रधानमंत्री जी स्वयं संबंध रखते हैं. बल्कि भगत सिंह को फांसी के बाद कानपुर में दंगे भड़काकर उनकी संप्रदायमुक्त छवि को धूमिल करने का काम मूढ़ हिंदुवादिता के शिकार लोगों ने जरूर किया था. इसपर महात्मा गांधी ने 26 मार्च, 1931 को कांग्रेस के कराची अधिवेशन में कहा था- ‘अखबारों से पता चलता है कि भगत सिंह की शहादत से कानपुर के हिन्दू पागल हो गए, और भगत सिंह के सम्मान में दुकान न बंद करने वालों को धमकाने लगे. नतीजा आपको मालूम ही है. मेरा विश्वास है कि अगर भगत सिंह की आत्मा कानपुर के इस कांड को देख रही है, तो वह अवश्य गहरी वेदना और शरम अनुभव करती होगी.’

इस आलेख का उद्देश्य आज की ‘कांग्रेस पार्टी’ का बचाव करना या उसका पक्ष लेना नहीं है. इस आलेख का उद्देश्य है मनगढंत कहानियों से भरे इतिहास के राजनीतिक दुरुपयोग की पूरी परिघटना पर चिंतन करना, चाहे वह दुष्प्रचार जिस किसी भी दल या संस्था द्वारा किया जा रहा हो. ऐसा नहीं है कि यह केवल भारत में ही हो रहा है. दुनिया भर में यह प्रवृत्ति आज जोरों पर है. बल्कि अब तो समाज-वैज्ञानिकों से लेकर मनोवैज्ञानिक तक इस प्रवृत्ति का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं. इसे ‘हिस्टोरिकल रिविज़निज़्म’ (ऐतिहासिक संशोधनवाद) या हिस्टोरिकल निगेशनिज़्म/डिनायलिज़्म (ऐतिहासिक नकारवाद) का नाम दिया गया है. लेकिन भारत में वॉट्सएप के माध्यम से परोसे जानेवाले इतिहास की स्थिति तो यह हो गई है कि इसे ‘ऐतिहासिक मनगढंतवाद या झूठवाद’ का नाम दे देना चाहिए. वर्तमान की घटनाओं के संदर्भ में जहां ‘फेक न्यूज़’ का इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं ऐतिहासिक प्रसंगों को तोड़-मरोड़ का मनमर्जी का झूठा साहित्य भी अफवाह की तर्ज पर फैलाया जा रहा है.

वैश्विक स्तर पर यहूदियों के साथ नाजी अत्याचारों को झुठलाने के प्रयास हुए हैं. अलग-अलग समय में सोवियत रूस और यूरोपीय शक्तियों द्वारा किए गए अमानवीय कृत्यों को ढंकने की कोशिशें हुई हैं. हाल के समय में भी अमेरिका द्वारा लादे गए युद्धों को न्यायोचित ठहराने के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किए जाने की कोशिशें हुई हैं. आज भी यदि आप बीबीसी वर्ल्ड रेडियो, रेडियो स्पुतनिक, वॉइस ऑफ अमेरिका, सीएनएन, रेडियो ऑस्ट्रेलिया और चाइना रेडियो इंटरनेशनल इत्यादि को एक साथ फॉलो करें, तो समझ में आ जाता है कि इतिहास से लेकर वर्तमान तक को परस्पर-विरोधी परिप्रेक्ष्यों में परोसने के कैसे-कैसे प्रयास चल रहे हैं. तो जो काम आज का अंतर्राष्ट्रीय से लेकर देसी मीडिया तक वर्तमान को परोसने के संदर्भ में कर रहा है, वही काम हमारे राजनेता ऐतिहासिक प्रसंगों को परोसने के मामले में कर रहे हैं.

हालांकि इतिहास-लेखन के क्षेत्र में नित नए साक्ष्य, दस्तावेज और रिकॉर्ड सामने आने से नए शोध के जरिए पुराने निष्कर्षों को चुनौती दी ही जाती रही है. इस तरह एक सीमा तक संशोधनवाद सकारात्मक भी हो सकता है. वह अतीत को नए और तथ्यपरक नज़रिए से देखने में हमारी मदद कर सकता है. लेकिन तभी जबकि यह शोध पूरी तरह तटस्थ और ईमानदाराना नजरिए से किया गया हो. वह सचमुच के विश्वसनीय तथ्यों के साथ हमें बेहतर मनुष्य बनाने में सहायक होता हो.

इतिहास का वास्तविक उद्देश्य अतीतोन्मुखी बनाना नहीं, बल्कि भविष्योन्मुखी बनाना होना चाहिए. सच है कि पहले भी इतिहास और इतिहास-लेखन राजनीति से अछूता नही रहा, लेकिन आज तो राजनीति और राजनेता मानो इतिहास को पूरी ढिठाई से निगलने के लिए ही तैयार हैं. राजनेता इतिहास को राजनीतिक अफवाह और प्रचार का हथकंडा बनाने पर तुले हुए हैं. अतीत के अन्यायों की झूठी कहानियों के जरिए सुनियोजित तरीके से हमारी नई पीढ़ियों में घृणा, द्वेषभाव और सांप्रदायिक आक्रोश भरा जा रहा है. पुराने हिसाब-किताब बराबर करने के लिए उन्हें हिंसा के मार्ग पर धकेला जा रहा है.

यह परिघटना अब और भी ज्यादा खतरनाक इसलिए होती जा रही है कि अब सोशल मीडिया के आक्रामक प्रयोग के जरिए इन झूठों को तेजी से फैला दिया जाता है. फेसबुक पर डाले गए मनगढंत पोस्ट को भी हाथों-हाथ लेने के लिए भीड़ तैयार बैठी रहती है. फोटोशॉप की गई तस्वीरें, यूट्यूब पर अपलोड किए गए वीडियो और वॉट्सएप के माध्यम से करोड़ों लोगों तक एक साथ उन्हें वायरल कर दिए जाने का साधन मौजूद है. पढ़े-लिखे और समझदार लोग तक इन खबरों और झूठे ऐतिहासिक प्रसंगो के झांसे में आ जाते हैं. अब सवाल है कि इसका कारण क्या है?

इसका कारण है कि भारत में इतिहास-लेखन और इतिहास-शिक्षण की प्रक्रिया में कई अनौपचारिक समानांतर धाराएं मौजूद रहीं और कई पीढ़ियों को इन परस्पर-विरोधी ऐतिहासिक प्रसंगों के माध्यम से दिग्भ्रमित कर दिया गया. किसी भी ज्ञान के क्षेत्र में विविधता का होना जरूरी कहा जा सकता है, लेकिन इतिहास के मामले में मनमर्जी के झूठ फैला देना घातक हो सकता है. यह किसी सभ्य और जागरूक समाज की निशानी नहीं है. अपने ही ऐतिहासिक महापुरुषों और महास्त्रियों का चरित्र-हनन करके हमारे यहां पीढ़ियों को कुंठित मानसिकता का बनाया जा रहा है. समाज में द्वेष और विभाजन पैदा करनेवाली ऐतिहासिक शख्सियतों का अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है. यह लोगों की स्मृतियों से खेलने का सुनियोजित प्रयास है. हो सकता है भविष्य में ऐतिहासिक रिकॉर्डों से भी छेड़छाड़ की जाए. आधिकारिक पाठ्यपुस्तकों को भी अजीबो-गरीब नकारात्मक तथ्यों से भर दिया जाए.

ऐसे में सोचने वाली बात है कि खासकर ‘नई सोच’ वाली युवा-पीढ़ी भी क्यों इसे हाथों-हाथ ले रही है? शायद इसलिए कि भारत में इतिहास का ज्ञान स्कूली शिक्षा से अधिक सुनी-सुनाई बातों के आधार पर अधिक होता है. परिवार और पड़ोस के प्रौढ़ और बुजुर्ग अपनी-अपनी तरह का इतिहास बच्चों के सामने परोसते हैं. टीवी धारावाहिकों से लेकर सिनेमा तक इतिहास को अपने तरीके से प्रस्तुत करता रहा है जिसका असर लंबे समय तक लोगों के दिमाग पर रहता है.

भारत में सामाजिक विज्ञान को ठीक से पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति का नितांत अभाव रहा है. विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम और शैक्षणिक गुणवत्ता के स्तर में भी भारी विषमता मौजूद है. स्कूल से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक अध्यापकों और पुस्तक-लेखकों का अपना पूर्वाग्रह हावी रहता है. इसके अलावा युवाओं का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो स्कूली स्तर के बाद सामाजिक विज्ञान से पूरी तरह कट जाता है. वह विचारधारा, परिप्रेक्ष्य, उपागम और हिस्टोरिओग्राफी जैसी चीजों को समझने से कोसों दूर रहता है. मूल स्रोतों को पढ़ने-समझने, जांचने-परखने या उसे मानवीय नज़रिए से देखने की इच्छा और उदारता उनमें नहीं के बराबर होती है. इसका कारण है कि अपने पारिवारिक और सामाजिक परिवेश, जाति, धर्म और आय-वर्ग इत्यादि पूर्वाग्रहों से प्रभावित अन्यान्य स्रोतों से उन्हें जो भी इतिहास-ज्ञान मिलता रहता है, उसे ही वह एकमात्र सत्य समझकर लड़ने-मारने पर उतारू रहते हैं.

आज भले ही हमारे राजनेताओं को यह अच्छा और फायदे का सौदा लग रहा हो, लेकिन है यह आत्मघाती ही. कई-कई पीढ़ियों को आप सामाजिक बुद्धिमत्ता और चिंतनशीलता से वंचित कर रहे हैं. उन्हें बौद्धिक रूप से अवैज्ञानिक और अंधविश्वासी बना रहे हैं. उनकी सहजबुद्धि या कॉमन-सेंस तक को पंगु बना रहे हैं. यही लोग आगे जाकर परिवार, समाज और देश में जिम्मेदार पदों पर आसीन होंगे. शासन और कार्य-व्यापार चलाएंगे. कोई बताए कि ऐसे देश और समाज का भविष्य फिर क्या होगा?

ऐतिहासिक प्रसंगों से कोई छलपूर्वक छेड़छाड़ न करे इसके लिए जर्मनी जैसे देशों ने कड़े कानून तक बनाकर इसे आपराधिक कृत्य की श्रेणी में डाल दिया है. हालांकि ऐसे कानून दोधारी तलवार भी साबित होते हैं. मानवीय चेतना के मुक्त-विकास के लिए तो जरूरी यह है कि हमारी नई पीढ़ियां अपने अतीत और वर्तमान का उदारतापूर्वक मूल्यांकन करने और सह-अस्तित्व की भावना के साथ नए समाज की रचना करने में सक्षम बनें. वे अतीत के प्रसंगों के आधार पर विक्टिमहुड, आत्महीनता या प्रतिशोध की भावना से ग्रसित और बीमार न हों.

कितना अच्छा होता कि भगत सिंह और नेहरू के उपरोक्त प्रसंग में प्रधानमंत्री कार्यालय से एक भूल-सुधार वाली विज्ञप्ति जारी की जाती. कहा जाता कि इस ऐतिहासिक तथ्य के मामले में प्रधानमंत्री से अनजाने में चूक हुई है. अगर ऐसा किया जाता तो न केवल उनका व्यक्तिगत रूप से मान ही बढ़ता, बल्कि यह भी संदेश जाता कि ज्ञान के सृजन, शोधन और प्रस्तुतिकरण के मामले में भारत का समाज तथ्यों से कोई समझौता नहीं करता. उसमें अपनी गलती को स्वीकारने और सुधारने का आत्मविश्वास भी है. न्यूनतम जिम्मेदारी की यह अपेक्षा कुछ ज्यादा तो नहीं है!