महान अफसानानिगार मंटो एक फिल्म पत्रकार भी थे. वे पहली दफा अपने पैदाइश के शहर अमृतसर से महानगर बम्बई एक फिल्म पत्रिका ‘मुसव्वर’ में काम करने के लिए ही गए थे. वह साल था 1936. फिर कुछ साल बाद उन्होंने ‘फिल्म इंडिया’ मैगजीन के मालिक और उस जमाने के मशहूर फिल्म पत्रकार बाबू राव पटेल के लिए भी काम किया. चार-पांच साल तक फिल्मों पर लिखने के बाद वे फिल्में लिखने लगे और बतौर अफसानानिगार पहले से मशहूर होने के बाद बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में बतौर स्क्रीनप्ले राइटर भी उनका नाम होने लगा. 12 साल बम्बई में बिताने वाले मंटो को इस शहर से इतना प्यार था कि वे खुद को ‘चलता-फिरता बम्बई’ कहते थे और कहा जाता है कि अपनी जिंदगी के आखिरी वक्त में लाहौर में होकर भी वे सपनों के इसी शहर को याद किया करते थे.

विभाजन के बाद बम्बई छोड़कर लाहौर जा बसे मंटो ने अपनी जिंदगी का सबसे कठिन समय उस नए मुल्क में बिताया था और उनका सबसे मुकम्मल काम भी उन सात सालों (1948-1954) के दौरान का ही माना जाता है. इसी दौरान उन्होंने पैसों की तंगी को दूर करने के लिए फिल्म पत्रकार की हैसियत से दोबारा लिखना शुरू किया और 40 के दशक की जिस बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री को वे बहुत पीछे छोड़ आए थे, उसके अफसाने अखबार-मैगजीन में दर्ज किए. ये अनुभव बहुत निजी थे, लेकिन लिखने वाले की नजर पत्रकारों वाली थी और चूंकि वो पत्रकार खुद मंटो था इसलिए उसकी बेबाक शैली ने उन दिनों में भी कइयों को नाराज किया था.

बहुत बाद में चलकर इन चटपटे, मसालेदार और फिल्मी शख्सियतों की छिपी दुनिया की जानकारियों से भरे पड़े ‘गॉसिप’ लेखों को पाकिस्तान में एक उर्दू किताब की शक्ल दी गई. इसमें फिल्मी हस्तियों के अलावा भी कई लोगों के संस्मरण शामिल किए गए और नाम रखा गया ‘गंजे फरिश्ते’. हिंदुस्तान में हिंदी भाषा में इसका तर्जुमा वाणी प्रकाशन ने ‘गंजे फरिश्ते’ नाम से ही किया है और सिर्फ फिल्मी शख्सियतों के संस्मरण एकत्रित कर पेंगुइन प्रकाशन ने अंग्रेजी में इन लेखों को ‘स्टार्स फ्रॉम एनदर स्काय’ नाम की किताब का रूप दिया है. इसके मुख पृष्ठ पर ही बताया है कि इसमें 40 के दशक की फिल्मी दुनिया की दास्तानें मौजूद हैं.

‘स्टार्स फ्रॉम एनदर स्काय’ में मंटो के लेखों का उर्दू से अंग्रेजी में तर्जुमा करने वाले स्वर्गीय खालिद हसन लिखते हैं कि एक तरफ तो बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में मंटो की बेहद मांग थी - उनकी पटकथाओं पर फिल्में बन रही थीं, वे फिल्मों में अभिनय कर रहे थे और बड़े-बड़े अदाकारों से उनके निजी ताल्लुकात थे. वहीं पाकिस्तान पहुंचने के बाद उन्हें लाहौर फिल्म इंडस्ट्री में कोई काम नहीं मिल रहा था. एक फिल्म जिसकी कहानी-पटकथा उन्होंने लिखी भी वो बॉक्स-ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप रही.

उनकी कहानियों से ‘आहत’ सरकारी लोगों ने उन्हें रेडियो के लिए लिखने से भी बैन कर दिया और ‘ठंडा गोश्त’ कहानी पर कोर्ट केस अलग चल रहा था. तंगी इतनी निर्मम थी - और फिर शराबनोशी की भी आदत थी - कि पैसों के लिए वे कभी-कभी सीधे अखबार व फिल्म मैगजीन के दफ्तर चले जाया करते थे. वहां लिखने के लिए कागज मांगते और एक-दो घंटे के लिए एक कोने में बैठकर एक ‘पीस’ तैयार कर देते. फिर उसका मेहनताना तभी के तभी लेकर नीचे खड़े तांगे में बैठकर वापस घर लौट आते.

ऐसे ही एक लेख में युवा अशोक कुमार को एवरग्रीन हीरो के ओहदे से नवाजने के बाद मंटो ने उनके साथ धीरे-धीरे सर चढ़ी दोस्ती पर विस्तार से लिखा है. अपने वक्त के सबसे बड़े स्टार की फिल्में लिखने वाले लेखक और उस स्टार के बीच की बेतकल्लुफ दोस्ती का लंबा जिक्र किया है और बड़े प्यार से अपने ‘दादामुनि’ को याद किया है. हालांकि बख्शा उन्हें भी नहीं है – वो मंटो ही क्या जो अपने काम के बीच दोस्ती को आने दे – और कई बार जिक्र किया है कि शादीशुदा अशोक कुमार लड़कियों को सामने पाकर शर्मा तो जाते थे, लेकिन उनका साथ पाने की चाह हमेशा उनके अंदर बलवती रहती – ‘मंटो यार...हिम्मत नहीं पड़ती’, वे मंटो से अकसर कहते. यहां तक कि जिन देविका रानी के साथ परदे पर उनकी जोड़ी 40 के दशक में खूब पसंद की गई, उन्होंने भी अशोक कुमार के साथ अफेयर चलाने की कोशिश की. लेकिन दादामुनि उन्हें भी हिम्मत नहीं पड़ने के कारण झटक देते थे.

अशोक कुमार से जुड़ी कई और भी निजी-दिलचस्प बातों का जिक्र करने के अलावा मंटो ने एक ऐसा किस्सा भी अपने लेख में शामिल किया, जो हमारे वक्त में भी इतना मौजूं है कि डर लगता है यह सोचकर कि हम तब जहां खड़े थे आज भी वहां ही क्यों खड़े हैं. अशोक कुमार के लिए हिट फिल्म ‘एट डेज’ (1946) (Eight Days) लिखने के बाद मंटो ने उन्हीं के लिए एक दूसरी फिल्म लिखना शुरू की थी जिसमें दादामुनि अभिनय करने के अलावा उसका निर्माण भी करने वाले थे. साथ ही उन्होंने फैसला लिया था कि वे अपने मेंटर हिमांशु राय की मौत के बाद बदहाल पड़ी बॉम्बे टाकीज को फिर से जीवित करेंगे. यह काम पार्टीशन वाले रोज शाम को ही शुरू हुआ और हिमांशु राय के पुराने साथी साउंड इंजीनियर साविक वाचा ने इस बदहाल स्टूडियो को फिर से अपने पैरों पर खड़ा करने की जिम्मेदारी उठाई.

शुरुआत उन आर्टिस्टों को निकालने से की जो निठल्ले थे और कंपनी पर बोझ बने हुए थे. लेकिन बदकिस्मती से निकाले गए ये सारे ही लोग हिंदू थे और उनकी जगह भर्ती किए गए आर्टिस्ट मुसलमान. जैसे कि इस्मत चुगताई, कमाल अमरोही, संगीत निर्देशक गुलाम हैदर और मंटो! इससे बॉम्बे टाकीज के बाकी हिंदू कर्मचारियों के मन में ‘हिंदू’ अशोक कुमार और साविक वाचा के प्रति नफरत पैदा हो गई. जब दादामुनि और वाचा ने उन्हें डांटकर समझाने का प्रयास किया तो वाचा को गुमनाम खत मिलने लगे (आज के हेट मेल्स!), जिनके अंदर लिखा होता था कि अगर स्टूडियो से मुसलमानों को नहीं निकाला गया तो उसे आग लगा दी जाएगी.

अशोक कुमार तो इन घटनाओं से कम प्रभावित हुए, उन्हें लगा कि वक्त के साथ ये गुस्सा ठंडा पड़ जाएगा, लेकिन मंटो लिखते हैं कि वे खुद को इस फसाद का जिम्मेदार ठहराने लगे. वे सोचने लगे कि हिमांशु राय द्वारा स्थापित बॉम्बे टाकीज जैसा मकबूल संस्थान अगर उनकी वजह से खाक हो गया तो वे अशोक कुमार को क्या मुंह दिखाएंगे.

इस बीच शहर में दंगे की घटनाएं भी लगातार बढ़ने लगीं और उनसे दो-चार होने के बीच ही एक दिन इक फिल्म मीटिंग ने हमेशा के लिए मंटो का मूड बदल दिया. हुआ ये कि एक फिल्म की चर्चा के दौरान उसके लेखक नजीर अजमेरी ने अशोक कुमार और वाचा के साथ आए मंटो के वहां होने पर कड़े शब्दों में एतराज जता दिया. मंटो को ये बात इतनी चुभ गई कि कुछ दिन तक सोच-विचार करने के बाद वे पाकिस्तान चले गए. अपने लेख का अंत निराशा से करते हुए उन्होंने बहुत बाद में लिखा, ‘…और मैं चुपचाप बाजू की गली से पाकिस्तान चला आया, जहां मेरे अफसाने ‘ठंडा गोश्त’ पर मुकद्दमा चलाया गया.’ (मंटो की कलम का लिखा मौलिक उर्दू लेख आप देवनागरी लिपि में रेख्ता पर पढ़ सकते हैं)

श्याम नाम के एक्टर को शायद आप नहीं जानते होंगे. 40 के दशक का ये अभिनेता भगवान दादा की ‘अलबेला’ (1951) और नरगिस की ‘मीना बाजार’ (1950) जैसी फिल्मों में अभिनय करने के अलावा मंटो का सबसे करीबी दोस्त भी था. उनपर लिखा मंटो का लेख फिल्मी सितारों पर लिखे बाकी संस्मरणों से एकदम अलग सिर्फ एक वजह से है कि वो एक सच्चे दोस्त का मर्सिया जैसा भी कुछ है.

फिल्मी दुनिया की काम निकालने वाली मित्रताओं के बीच जिंदादिल और दिलफेंक श्याम के साथ मंटो ने बम्बई में खुशियों वाले दिन बिताए थे और जब श्याम के संस्मरण में उन खुशियों को पन्नों पर बिखेरा तो उसकी शुरुआत श्याम की मौत की खबर से की. यह खबर मंटो को मिली जब वे लाहौर के एक पागलखाने में अपना इलाज करवा रहे थे, और खुद यह सच्चाई उन्होंने लेख में बयां की है. शराबनोशी और विभाजन के बाद एकदम बदली जिंदगी ने उनके दिमाग पर ऐसी धुंध चढ़ाई थी कि उसे साफ करने के लिए उन्हें मेंटल हॉस्पिटल की मदद लेनी पड़ी थी. बाहर खबर फैली कि मंटो अपने दोस्त की मौत की वजह से पागल हो गया है, और बहुत बाद में लिखे इस लेख में मंटो ने विस्तार से बताया कि वजह यह नहीं थी.

औरतबाजी और शराबखोरी से भरे किस्सों के बीच श्याम संग बिताए बेरोजगारी और मुफलिसी के दिनों का खाका इस लेख में खींचा गया है और एक्टिंग के लिए मिले पैसों को आधा बांटकर बिना हिसाब लगाए अपने संघर्षरत ‘लेखक’ दोस्त मंटो को देने के जिक्र भी मौजूद हैं. मौजूद है लाहौर पहुंचकर फिर से तंगी में जीने को मजबूर मंटो की मजबूरियों की दास्तान और ‘ठंडा गोश्त’ पर निचली अदालत द्वारा मंटो को तीन महीने की कैद और 300 रुपए का जुर्माना लगाए जाने के बाद बम्बई से श्याम का भेजा 500 रुपए का टेलीग्राम.

फिर उसी लेख में दर्ज है कि जब ‘एक जिस्म दो जान’ वाले दोस्त विभाजन की वजह से हमेशा के लिए दूर होते हैं तो दोनों पर क्या बीतती है. बम्बई फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा हिंदू एक्टर श्याम और छूट गई बम्बई की याद में तन्हा मुसलमान मंटो में से कौन खुद को पहले जैसा बनाए रख पाता है. कहीं से ढूंढ़ कर वो मार्मिक लेख पढ़ मत लीजिएगा, उसका अंत आपका दिल बैठा देगा.

मंटो ने फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी कई महिलाओं पर भी संस्मरण लिखे. वे जो हमारे-आपके लिए अंजान हैं, लेकिन मंटो की कलम ने उनके आसपास घूमती 40 के दशक की बम्बइया फिल्म इंडस्ट्री का दिलचस्प खाका खींचा. चाहे नेगेटिव किरदारों के लिए जानी जाने वाली अभिनेत्री कुलदीप कौर हों, जिनके लिए, बकौल मंटो, युवा प्राण ‘मर्द रखैल’ की तरह थे और पार्टीशन के वक्त जब प्राण की कार लाहौर में छूट गई थी तो किसी से नहीं डरने वाली कुलदीप दंगों के बीच उसे चलाकर बम्बई ले आई थीं.

या फिर पारो देवी हों, जो कि हीरोइन बनने की चाह लेकर मेरठ से आईं एक रईस तवायफ थीं. मंटो अनुसार इनके कोठे पर जोश मलीहाबादी जैसे प्रसिद्ध शायर जाया करते थे और बम्बई आकर जो पहली फिल्म इन्हें मिली उसके लेखक मंटो थे. अभिनय में एकदम कच्ची होने के बावजूद मंटो ने अपने आसपास के फिल्मी लोगों को उनपर मर-मिटते देखा था और बरसों बाद जो-जैसा घटा उसे वैसा का वैसा अपने फिल्मी कॉलम में लिख दिया था. आदमी-औरत के बीच के तरह-तरह के रिश्तों की परतें मंटो ने अपनी कहानियों के अलावा अपने गॉसिप कॉलमों में भी उतारी थीं, और अगर आज के दौर में फिल्मी शख्सियतों पर इस निर्भीकता से कोई लिख दे – जिस दौर में मंटो को बकायदा सेलिब्रेट किया जाता है – तो उसे जूते पड़ने तय हैं.

नरगिस को लेकर भी मंटो की कलम बेबाक चली. वे ‘बरसात’ (1949) के बाद बेहद मशहूर हो चुकीं नरगिस से पहले वाली नरगिस को जानते थे. वह नरगिस जो कि छुटपन से फिल्मों में ‘बेबी नरगिस’ बनकर किए कामों को पीछे छोड़ महबूब खान की ‘तकदीर’ (1943) में नायिका बन कई लोगों की चहेती हीरोइन बन चुकी थी, लेकिन फिर भी मंटो को जिसकी आंखों में उदासी हर वक्त नजर आती थी. मंटो की बीवी और दो सालियों से नरगिस की दोस्ती थी और उनके बहाने मंटो ने परदे के पीछे वाली उस नरगिस को जाना था जो जिंदगी की छोटी-छोटी खुशियां पाने के लिए बहुत कुछ करने को तैयार रहती थी. मंटो वैसे तो नरगिस को कमतर अभिनेत्री मानते थे, लेकिन ये भी कहते थे कि उनकी सफलता की वजह काम के प्रति उनकी ईमानदारी है.

नरगिस की मां का नाम जद्दन बाई था जिन्हें भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की पहली महिला संगीतकार होने का दर्जा हासिल है. जद्दन बाई फिल्मों में नाम कमाने से पहले तवायफ थीं और मंटो ने अपने लेख में उनकी जिंदगी पर भरपूर रोशनी डाली है. उस वाकये का भी जिक्र किया है जब उनकी एक रिश्तेदार घर आकर तवायफों को बुरा-भुला सुना रही थीं और पास बैठी जद्दन बाई बिना किसी क्रोध के अपना सर ऊंचा रखे हुए थीं.

मंटो ने उनके पुराने दिनों को याद कर लेख में दर्ज किया है कि जब जद्दन बाई गाती थीं तो राजा और नवाब उन्हें सोने-चांदी से तौलते थे लेकिन रात ढल जाने के बाद वे वापस अपने उस आशिक के पास चली आती थीं जिनके साथ वे आखिर तक रहीं. नरगिस के पिता मोहन बाबू के पास. बिना ज्यादा जोर दिए मंटो यह भी फरमा गए कि जद्दन बाई ने ही नरगिस के जीवन के ज्यादातर फैसले लिए थे और बदले में नरगिस को सफलता की ऊंचाईयों तक पहुंचने, एक मशहूर अदाकारा बनने के लिए अपना बहुत सारा बचपन और जवानी की बहुत सारी आजादी खोनी पड़ी थी. नरगिस पर मंटो की कलम का लिखा वह मौलिक उर्दू लेख आप देवनागरी लिपि में रेख्ता पर पढ़ सकते हैं.

आखिर में मल्लिका-ए-तरन्नुम नूर जहां की बात, जिन्हें मंटो गायकी में लता मंगेशकर से श्रेष्ठ और केएल सहगल के समकक्ष महान मानते थे, और जिन्होंने मंटो के घर जाकर बहुत मनाने के बाद भी सिर्फ फैज का ‘आज की रात साज-ए-दर्द न छेड़’ गाया था. लेकिन इतना बेहतरीन कि सालों बाद उनपर बेहद लंबा कॉलम लिखते हुए भी शहद-सी उस आवाज को मंटो अपने कानों में महसूस कर पा रहे थे. पाकिस्तान जाने से पहले बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में नूर जहां के ढेरों चाहने वाले थे और इन सबका जिक्र सिलसिलेवार करते वक्त मंटो ने फिल्म इंडस्ट्री के अंदर पसरी गंद को पन्नों पर पसार दिया था. वह लेख शायद उनका सबसे बेरहम फिल्मी कॉलम भी है जिसे यहां संक्षिप्त में भी लिख पाने का साहस लिखने वाले में नहीं है. आप किताब खरीदने की जहमत उठाएं तो बेहतर.