कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 2019 के आम चुनाव के बारे में बड़ा बयान दिया. बीते मंगलवार को एक कार्यक्रम के दौरान जब राहुल से अनौपचारिक अंदाज़ में पूछा गया कि वे प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो राहुल ने कहा, क्यों नहीं? उन्होंने दावा किया कि अगले आम चुनाव में न भाजपा को बहुमत मिलेगा और न ही नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनेंगे.

देश के ज्यादातर अखबार और समाचार चैनल्स जब भी देश का मिजाज बताने वाले ओपिनियन पोल बताते या दिखाते हैं तो कांग्रेस को भाजपा से कोसों दूर दर्शाया जाता है. ऐसे सर्वे में प्रधानमंत्री की पसंद के तौर पर राहुल गांधी नरेंद्र मोदी के सामने कहीं नहीं टिकते. सवाल उठता है कि ऐसे में राहुल गांधी को अपने प्रधानमंत्री बनने की संभावना कैसे दिखती है.

कांग्रेस के विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि पिछले कुछ महीनों में राहुल गांधी की टीम ने एक ऐसा फॉर्मूला तैयार कर लिया है जिसके आधार पर दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष 2019 में प्रधानमंत्री बन सकते हैं. इस टीम में काम करने वाले एक नेता बताते हैं, ‘राहुल को प्रधानमंत्री बनाने का फॉर्मूला हवा-हवाई नहीं है. हर राज्य की सीटें जोड़कर इसे तैयार किया गया है. राहुल भी जानते हैं उन्हें 2019 में 272 सीटें नहीं मिलेगी. इसलिए कांग्रेस ने 150 से 180 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस कितनी सीटें जीते इससे ज्यादा अहम यह है कि वह भाजपा को कितनी सीटों पर समेटती है.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘कांग्रेस का अपना अंदरूनी आकलन है कि अगर भाजपा को 180 से 200 सीटों के बीच रोक लिया जाए तो 2019 में मोदी सरकार नहीं बनेगी. सरकार बनाने के लिए बाकी की 72 सीटें भी मोदी-अमित शाह नहीं जोड़ पाएंगे. लेकिन अगर राहुल गांधी अपने दम पर 150 सीटें भी ला पाए तो कांग्रेस बाकी की 122 सीटें जुटा सकती है’.

जानकारों के मुताबिक राहुल गांधी का मिशन 2019 शुरू हो चुका है. पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस अध्यक्ष ने एकदम नए तरीके की टीम जुटाई है. बताया जाता है कि इस टीम के लोगों को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस में हुए चुनावी प्रयोगों से सीखने को कहा गया था. इसके बाद भारत के एक-एक राज्य में सीटों का हिसाब जोड़ा गया. आखिर में राहुल की टीम इस नतीजे पर पहुंची कि उत्तर प्रदेश में मोदी के रथ को अखिलेश यादव और मायावती मिलकर रोकेंगे. कांग्रेस और अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल इस मोदी रोको रथ का तीसरा और चौथा पहिया बनेगी. उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से कांग्रेस को कितनी सीटें मिलती है, यह मकसद नहीं है. लक्ष्य है विरोधी वोट को एक साथ इकट्ठा करना और फिर उत्तर प्रदेश में भाजपा को ज्यादा से ज्यादा सीटों पर हराना.

उदाहरण के तौर पर बाकायदा आंकड़ा पेश किया गया. अंदरखाने की खबर रखने वालों के मुताबिक राहुल गांधी को बताया गया कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा और उसे सहयोगी अपना दल को 43 फीसदी वोट मिले और 73 सीटें. उधर, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का वोट जोड़ दें तो इन तीन विरोधी पार्टियों को 50 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन उन्हें सीटें मिलीं सिर्फ सात. जानकारों के मुताबिक यही बात समझने के बाद राहुल गांधी ने हाल में ऐलान किया था कि अगर वे उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, मायावती और अजित सिंह से हाथ मिला लें तो भाजपा को उत्तर प्रदेश में बुरी तरह हरा सकते हैं. इस आंकड़े के दम पर कांग्रेस की कोर टीम को लगता है अगर उत्तर प्रदेश में गठबंधन मजबूत बन गया तो मोदी 282 से सीधे 225 सीटों पर आ सकते हैं.

बाकी के पांच ऐसे राज्य हैं जहां राहुल गांधी को खुद मेहनत करनी होगी. जानकारों के मुताबिक इसलिए ही उन्होंने कहा था कि वे मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और गुजरात में ताकत लगाएंगे. राजस्थान में पिछले चुनाव में भाजपा को करीब 54 फीसदी वोट मिले थे और उसे 25 में से 25 सीटों पर कामयाबी मिली. अब अशोक गहलोत ने ही राहुल को भरोसा दिया है कि हालात एकदम उल्टे होंगे और 25 में से 15 सीटें तो कांग्रेस कम से कम जीतेगी ही.

उधर, मध्य प्रदेश में भाजपा को 54 फीसदी वोट मिले थे और कांग्रेस को 35 फीसदी. लेकिन राज्य की 29 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने 27 सीटें जीतीं और कांग्रेस सिर्फ दो सीट जीत पाई. अब नए अध्यक्ष कमलनाथ ने पार्टी नेतृत्व को वादा किया है कि कम से कम आधी सीटें तो जरूर मिलेंगी. गुजरात में भाजपा को 60 फीसदी और कांग्रेस को 33 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन गुजरात की सभी 26 सीटों पर कांग्रेस हार गई थी. गुजरात विधानसभा चुनाव के आंकड़े देखने के बाद राहुल की टीम को उम्मीद है कि यहां भी मुकाबला कांटे का होगा और कांग्रेस की झोली खाली नहीं रहेगी.

कर्नाटक चुनाव के ठीक बाद राहुल गांधी अब उन राज्यों का दौरा करेंगे जहां कांग्रेस और भाजपा की आमने-सामने टक्कर होगी. उधर, कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता उन राज्यों के नेताओं से संपर्क में हैं जहां भाजपा की टक्कर कांग्रेस से नहीं दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों से है. इसी कोशिश में जुटे कांग्रेस एक नेता बताते हैं, ‘देश में बिल्कुल वैसा ही प्रयोग होगा जैसा अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त भाजपा ने एनडीए बनाकर किया था. कांग्रेस को हराने के लिए भाजपा ने 22 अलग-अलग पार्टियों से गठबंधन किया था. जिस राज्य में जो नेता कांग्रेस को हरा सकता था उसे भाजपा ने समर्थन दिया था.’

बताया जा रहा है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस भी उसी प्रयोग को दोहराने वाली है. कांग्रेस के ये नेता कहते हैं, ‘राहुल गांधी समझ चुके हैं कि वे मोदी को अकेले नहीं रोक सकते. वे यह भी जानते हैं कि भाजपा अब अकेली पड़ती जा रही है. इसलिए राहुल ने हाथ बढ़ाने और हाथ मिलाने का फैसला किया है. साथ ही साथ वे अपना हाथ भी मजबूत करना चाहते हैं.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘कांग्रेस जानती है अगर अकेले दम पर राहुल को 150 सीटें मिल गईं तो बाकी किसी भी पार्टी का नेता प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब नहीं देखेगा. आपसी बातचीत में राहुल गांधी ने अपनी टीम से एक दिन कहा था कि वो ऐसी सरकार के मुखिया बनना चाहते हैं जिसमें अखिलेश यादव भी कैबिनेट मंत्री हों और मायावती भी’.