अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग-उन के बीच होने वाली ऐतिहासिक बैठक की तारीख और जगह की घोषणा कर दी गई है. गुरुवार को इस बारे में डोनाल्ड ट्रंप ने एक ट्वीट किया. इसमें उन्होंने लिखा, ‘किम जोंग-उन के साथ मेरी प्रस्तावित बैठक 12 जून को सिंगापुर में होगी. हम दोनों की कोशिश होगी कि विश्व शांति के ​लिहाज से इस बैठक को खास बनाएं.’

डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग-उन के बीच जब से यह बैठक तय हुई है तभी से अनुमान लगाए जाने लगे थे कि यह बैठक आखिर कहां होगी. इस सवाल का जवाब अब साफ हो गया है. लेकिन एक सवाल यह भी है कि इस ऐतिहासिक बैठक के लिए आखिर सिंगापुर को ही क्यों चुना गया.

द इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि किम जोंग-उन और डोनाल्ड ट्रंप इस बैठक को किसी तटस्थ देश में करना चाहते थे. पर माना जा रहा था कि यूरोप के स्कैंडिनेवियन देशों (डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन) के अलावा किम जोंग-उन किसी अन्य देश जाने को तैयार नहीं होंगे. चीन ने इस बैठक को आयोजित करने में दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति तैयार नहीं हुए. एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों को सुरक्षा वजहों से नहीं चुना गया.

जापान और दक्षिण कोरिया को भी बैठक के संभावित स्थानों के तौर पर देखा गया था मगर बात नहीं बनी. इसके अलावा उत्तर और दक्षिण कोरिया के असैन्यीकृत क्षेत्र में बैठक करने के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने रुचि दिखाई थी. लेकिन इसका मतलब होता उत्तर कोरिया जाना जो अमेरिकी कूटनीतिकारों को नहीं भाया. मंगोलिया पर भी बात हुई, लेकिन यह ठीक चीन के बगल में था सो बात नहीं बनी. आखिरकार बैठक के लिए सिंगापुर को चुना गया. ऐसा होने की कुछ खास वजहें हैं.

सबसे बड़ी बात यह है कि सिंगापुर कोरियाई प्रायद्वीप से अलग है. व्यापारिक रिश्ते खत्म होने से पहले उत्तर कोरिया और सिंगापुर के बीच आपसी सहयोग का लंबा इतिहास रहा है. सिंगापुर उन ​चुनिंदा देशों में है जहां उत्तरी कोरिया का अपना दूतावास भी है. और उत्तरी कोरिया से सिंगापुर की नजदीकी की वजह से किम जोंग-उन इस देश तक जल्दी और आसानी से पहुंच सकते हैं.

उधर अमेरिका के लिहाज से देखें तो सिंगापुर, अमेरिका का पुराना सहयोगी रहा है. इस क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना के जंगी जहाज भी तैनात हैं. इसके अलावा आर्थिक रूप से समृद्ध दक्षिण-पूर्व एशिया के इस देश की गिनती सुरक्षित देशों के रूप में की जाती है. यही नहीं सिंगापुर को ऐसे सम्मेलन आयोजित कराने का पुराना अनुभव भी रहा है. साल 2015 में चीन और ताइवान के बीच ऐतिहासिक सम्मेलन की मेजबानी भी सिंगापुर ने ही की थी.