निर्देशक : मेघना गुलजार

लेखक : हरिंदर सिक्का, भवानी अय्यर, मेघना गुलजार

कलाकार : आलिया भट्ट, विकी कौशल, जयदीप अहलावत, रजित कपूर, सोनी राजदान, अमृता खानवलकर

रेटिंग : 4/5

रवींद्र कौशिक को काफी लोग जानते हैं. रॉ का यह हिंदुस्तानी जासूस किंवदंतियों का हिस्सा बन चुका है. रवींद्र ने बेनाम मौत मरने से पहले लंबा अरसा पाकिस्तान में रहकर वहां की आर्मी की जासूसी की थी और अहम जानकारियां सरहद पार से हिंदुस्तान भेजी थीं. कहते हैं कि उसने खुद को इस कदर पाकिस्तानी बना लिया था कि वहीं की लड़की से अपनी नकली पहचान के साथ शादी भी की और पिता भी बना, लेकिन अपना राज किसी के सामने नहीं खोला.

‘राजी’, रवींद्र कौशिक जैसे ही एक और मुखबिर की सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म है, बस फर्क इतना है कि इसका नायक एक नाजुक-सी लड़की सहमत है. हमारे यहां रवींद्र कौशिक जैसे ‘मर्द’ मुखबिरों से प्रभावित होकर या तो सलमान खान कृत ‘एक था टाइगर’ जैसी विशुद्ध एक्शन फिल्में बनाने का रिवाज है, या फिर अगर मूड अच्छा हुआ तो थोड़ा यथार्थवादी होकर ‘डी-डे’ जैसी थोड़ी-बहुत दर्शनीय एक्शन फिल्म बना लेने का. लेकिन पराए मुल्क में रह रहे इन मुखबिरों के जीवन को पास जाकर टटोलने का वक्त किसी के पास नहीं. मेघना गुलजार की ‘राजी’ सबसे अच्छा यही काम करती है कि देश के लिए सब कुछ कुर्बान करने को तैयार 20 साल की लड़की के पराए मुल्क पाकिस्तान में रहकर पनपे कई सारे अंतर्द्वदों को बखूबी उभारती है.

शादी बाद सहमत (आलिया भट्ट) के सरहद पार पनपे रिश्ते, खुद को सहज करने की लाख कोशिशें, जासूसी करने के लिए पहचान के लोगों को रास्ते से हटाने पर उपजा अपराध बोध. उस बोध को दबाकर लगातार खुद को बचाने के लिए किए जाने वाले साहसिक कार्य और इस बीच देश के प्रति सर्वोच्च निष्ठा, जो कि उसे रवींद्र कौशिक जैसा अंत देती है या बिलकुल अलग – या फिर थोड़ा सा ही अलग – ये आपको ‘राजी’ देखकर पता चलेगा.

पक्की बात है कि बिना राष्ट्रभक्ति का ढिंढोरा पीटे जितनी संवेदनशील ‘राजी’ है, उसके वैसा हो पाने की प्रमुख वजह एक महिला निर्देशक का महिला-प्रधान कहानी को देखने का नजरिया है. साफ है कि मेघना गुलजार ने हरिंदर सिक्का की अचंभित कर देने वाली कहानी ‘कॉलिंग सहमत’ को एक थ्रिलर के रूप में देखने से साफ इंकार किया होगा. उसे एक मानवीय ड्रामा के तौर पर देखा होगा, कि इन परिस्थितियों में फंसने पर 20 साल की वो नाजुक लड़की कैसे पड़ोसी मुल्क जाकर लड़ेगी जिसने अभी कॉलेज तक पूरा नहीं किया, दुनिया नहीं देखी, और मां-बाप के सिवाय किसी रिश्ते को नहीं समझा.

इसीलिए, ‘राजी’ थोड़ी धीमी है. उस तरह की फिल्म है जो थियेटर में कुछ जल्दी ही बेचैन हो जाने वाली आत्माओं से शांत व्यवहार की उम्मीद रखती है, और चाहती है कि आप उसकी नायिका की मुश्किल जिंदगी को धीरे-धीरे अपने अंदर सोखें. सोएं नहीं, और मोबाइल में खोएं तो बिलकुल नहीं. क्योंकि दूसरे नम्बर की आदत आजकल थियेटरों के अंदर महामारी बनती जा रही है.

जासूसी थ्रिलर फिल्मों की तरह ‘राजी’ का टेम्पलेट जाना-पहचाना है और आपको एक हद तक पता होता है कि फिल्म कहां जाएगी और कहां से कहां मुड़ेगी. लेकिन यह सब इतना सधा हुआ है कि फिल्म के सीधे-सीधे कहानी कहने की अदा (लीनियर नैरेटिव), बिना तूफान मेल बने कहानी को आगे बढ़ाने की नीयत, बेहद तंग क्लोज-अप शॉट नहीं लेकर लंबे-लंबे प्यारे शॉट्स में अपनी बात कहना, और मुसीबतों के बीच भी पुरानी क्लासिक फिल्मों की तरह रूमानी लम्हे क्रिएट कर पाना आपको उसके मोहपाश में बांध देता है.

ऊपर से फिल्म के पास जासूसी करने के तरीके भी दिलचस्प हैं और कहीं भी शोर उत्पन्न करने की महत्वाकांक्षा नहीं है. हमारी फिल्मों में जो मानवीयता गायब रहती है, वो ‘राजी’ में कूट-कूटकर भरी है और जब सहमत के जासूस होने का पता भी पाकिस्तानियों को चलता है तो स्क्रीन पर दहशत पैदा कर देने वाला बैकग्राउंड स्कोर नहीं बजता, बल्कि दो लोग बड़ी संजीदगी से आगे होने वाले नुकसानों पर बात करते हैं (यह कोई स्पॉइलर नहीं है मियां, हर जासूसी फिल्म में हीरो या हीरोइन के जासूस होने का पता कभी न कभी चलता ही है!).

‘राजी’ जासूसी फिल्मों से जुड़े बॉलीवुड क्लीशों से भी खुद को बेहद दूर रखती है. इतनी कि हैरत होती है निर्देशक और लेखक की समझ पर. देशभक्ति पर बनी होने के बावजूद फिल्म का अंत तक क्लीशे से दूर है और आपको सवालों के घेरे में छोड़ जाता है – बनिस्बत कि आप सवाल करने के आदी हों. वहीं, अपराध बोध वाली घटना के बाद लंबे वक्त तक फिल्म धीमी गति से आगे बढ़ती है, और आप सोचते हैं यार कुछ ज्यादा ही नहीं खींच दिया. लेकिन तभी फिल्म परवाज लेना शुरू करती है और तेजी से अचंभित करने वाले घटनाक्रमों को सामने लाती है. और आपको पता चलता है कि सुघड़ तरीके का बिल्ड-अप क्या चीज होती है.

फिल्म के सारे ही कलाकार उच्च का अभिनय करते हैं. विकी कौशल सहमत के शांत पति की भूमिका में अपनी सहजता से प्रभावित करते हैं तो बड़े दिनों बाद शिशिर शर्मा को कायदे के रोल में देखना प्रसन्न कर देता है. सहमत के बाबा के रोल में रजित कपूर पिताओं वाला इतना प्यार और चिंताएं भर देते हैं कि जब ‘बाबा मैं तेरी मल्लिका’ नामक विदाई गीत आता है तो गले में कुछ रुकावट महसूस होती है. जयदीप अहलावत आलिया के रॉ ट्रेनर की भूमिका अदा करते हैं, और इतने बेमिसाल अंदाज में कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से सवाल करने का मन करता है कि उसे ऐसे कुशल कलाकारों से आखिर किस बात की अदावत है. क्यों वो जयदीप जैसे कलाकारों को अच्छे रोल नहीं देती? जिन आलिया भट्ट को देती है, वो कभी निराश नहीं करतीं!

‘राजी’ में शुरू-शुरू में लगता है कि अति मासूम लड़की के रोल में आलिया लड़खड़ा रही हैं लेकिन धीरे-धीरे समझ आता है कि वे किरदार को नफासत से अंडरप्ले कर रही हैं. हर हाव-भाव पर गजब का नियंत्रण रख रही हैं और बहुत कम करके बहुत ज्यादा प्रभाव पैदा करने की कोशिश में कामयाब हो रही हैं. कत्ल करने के अपराध बोध के बाद का उनका अभिनय तो अद्भुत की क्षेणी में आता है. यकीनन, ‘राजी’ आलिया के सर्वश्रेष्ठ और ‘हाईवे’ की तरह सबसे परिपक्व कामों में से एक है.

‘राजी’ को गुलजार साहब की अदृश्य उपस्थिति के लिए भी याद किया जाना चाहिए. गाने तो उन्होंने लिखे ही हैं, लेकिन मेघना गुलजार के लिखे संवादों में उनका प्रभाव आसानी से पकड़ में आता है. स्क्रिप्ट में कई जगह मौजूद रूमानी लम्हे साफ तौर पर उनकी देन हैं और फिर फिल्म की जो पॉलिटिक्स है, वो साफ-साफ गुलजार साहब की विचारधारा है – कि दोनों तरफ की सियासत कितना भी हमें लड़ने-झगड़ने और मरने-मारने पर मजबूर करे, आखिर में हम सभी एक ही मिट्टी की पैदाइश हैं, एक जैसे ही लोग हैं, बस मुल्कों के नाम अलग हैं.

उन्हीं की इस समझ के चलते ‘राजी’ को आधा स्टार ज्यादा! इसे जरूर देखें, क्योंकि तभी आप बेहतर समझ पाएंगे कि बेहद खूबसूरत गीत ‘ऐ वतन’ में इकबाल की चंद पंक्तियों का उपयोग कर गुलजार साहब ने कैसे इसे दोनों ही मुल्कों का गीत बना दिया है.