देश की राजधानी दिल्ली में 21 मई से पानी का संकट पैदा हो सकता है. दिल्ली को इसकी पानी की जरूरत के एक बड़े हिस्से की आपूर्ति करने वाला हरियाणा अब इससे मुकर रहा है. हालांकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा को 21 मई तक यथास्थिति बरकरार रखने का निर्देश दिया है. राज्य के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हरियाणा के सीएम मनोहरलाल खट्टर को एक चिट्ठी भी लिखी है. इसमें पानी न रोकने की अपील की गई है.

राष्ट्रीय राजधानी में हर साल गर्मी में पानी की किल्लत होती है, लेकिन इस साल यह समस्या और बढ़ गई है. जल संकट की इस समस्या पर राजनीति भी हो रही है और ऐसा लग रहा है कि राजनीतिक तौर पर इससे आम आदमी पार्टी (आप) को सबसे अधिक नुकसान हो सकता है.

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि जल संकट सबसे अधिक झुग्गी बस्तियों और अनाधिकृत काॅलोनियों में है. अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाने में इन काॅलोनियों में रहने वाले लोगों की अहम भूमिका बताई जाती है. 2015 के विधानसभा चुनावों में आप को मध्य वर्ग के युवाओं का भी समर्थन मिला था लेकिन पार्टी को 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटों पर जीत दिलाने में दिल्ली के निचले तबके के लोगों की सबसे प्रमुख भूमिका बताई जाती है.

अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के बाद शुरुआती दो साल में झुग्गियों में काफी काम हुए. मोहल्ला क्लीनिक खुले. बिजली के औपचारिक कनेक्शन दिए गए. 2016 और यहां तक कि 2017 तक भी झुग्गी में रहने वाले लोगों से बातचीत करने पर यह पता चलता था कि इन बस्तियों में अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता कम नहीं हुई है. लेकिन इस साल जिस तरह का जल संकट है, उसकी वजह से इन बस्तियों में केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को लेकर अविश्वास पैदा हुआ है.

दिल्ली के टोडापुर के पास एक झुग्गी में रहने वाली लिपिका घरों में खाना बनाकर जीवन यापन करती हैं. वे कहती हैं, ‘झुग्गी में पानी नहीं आ रहा. टैंकर से जो पानी आता था, उसमें भी अब कमी आई है.’ अपनी परेशानियों को साझा करते हुए वे आगे कहती हैं, ‘इस बार पानी की बहुत ज्यादा दिक्कत हो गई है. घर में नहाने का पानी नहीं है. मैं कपड़े लेकर आती हूं और जिन कोठियों में काम करती हूं, वहीं नहाती हूं. इतनी दिक्कत कभी नहीं हुई.’

इसके लिए आपको कौन जिम्मेदार लगता है, इस सवाल पर वे कहती हैं, ‘किसे कहें, सब तो एक ही तरह के हैं. केजरीवाल को हम सबने लोगों ने बहुत उम्मीद से वोट दिए थे. उन्होंने भी गरीब लोगों के लिए कुछ नहीं किया. दिल्ली में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कुछ कर सकते थे, लेकिन वे भी कुछ नहीं कर रहे. सब पार्टी एक जैसी ही हैं. किसी की भी सरकार हो, परेशान तो हम जैसे गरीब लोगों को ही होना है.’

दक्षिणी दिल्ली के रंगपुरी में रहने वाली चांदनी भी घरों में खाना बनाने और साफ-सफाई का काम करती हैं. वे कहती हैं, ‘इस बार गर्मी अभी उतनी ज्यादा बढ़ी नहीं है, लेकिन पानी की दिक्कत काफी ज्यादा हो गई है. जिस दिल्ली में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति सब रहते हैं, उस दिल्ली में पीने का पानी लाने के लिए हमें अपने घर से दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. उसमें भी कभी पानी मिलता है तो कभी नहीं.’

वे आगे जोड़ती हैं, ‘हमने दिल्ली में भाजपा की सरकार भी देखी और कांग्रेस की भी. इनसे तंग होकर हम लोगों ने केजरीवाल को वोट दिया था. लेकिन केजरीवाल भी भाजपा-कांग्रेस की तरह ही निकले. चुनाव के वक्त खुद हमारे इलाके में आए थे. कहा था सब ठीक कर देंगे. पानी तक तो दे नहीं पा रहे, क्या ठीक करेंगे हमारा?’

तो क्या आप लोग फिर से केजरीवाल को वोट देंगे, चांदनी कहती हैं, ‘क्या वोट देंगे? केजरीवाल को तो नहीं ही देंगे. लेकिन जिसे देंगे वो भी यही करेगा. सब एक ही हैं. केजरीवाल सरकार कुछ नहीं कर रही तो यहां का सांसद तो पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए तो कुछ कर सकता था. लेकिन वो भी कुछ नहीं कर रहा.’

दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं. दिल्ली के जल संकट पर वे यह कहकर बचाव कर रहे हैं कि दिल्ली को जितना पानी हरियाणा से मिलना था, उतना नहीं मिल पा रहा है और इस वजह से दिल्ली में पानी की दिक्कत है. आम आदमी पार्टी के दूसरे कुछ नेता तो यह भी कह रहे हैं कि भाजपा हर तरह से दिल्ली की केजरीवाल सरकार को तंग कर रही है और हरियाणा की भाजपा सरकार द्वारा दिल्ली को पानी नहीं दिया जाना भी इसी कड़ी का हिस्सा है. आप के नेता यह भी कह रहे हैं कि भाजपा की इस गंदी राजनीति की वजह से दिल्ली के लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

जल संकट का सामना कर रहे इलाके के लोगों से बातचीत से एक बात तो साफ हो रही है कि इस मसले पर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाने की वजह से केजरीवाल और उनकी सरकार से लोग खफा हैं. उनकी बातों से यह भी स्पष्ट होता है कि उन्हें किसी दूसरी पार्टी से भी खास उम्मीद नहीं है. लेकिन आम तौर पर भारतीय राजनीति में यह देखा गया है कि इस तरह से जनता अगर खफा होती है तो इसका सबसे अधिक नुकसान सत्ताधारी पार्टी को होता है और विपक्ष में जिसकी ताकत अधिक रहती है, उसे फायदा मिल जाता है.

इस स्थिति में यह कहा जा सकता है कि अगर लोगों का गुस्सा बरकरार रहा तो आम आदमी पार्टी को इसका खामियाजा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों और 2020 के विधानसभा चुनावों में भुगतना पड़ सकता है. आम आदमी पार्टी के लिए यह स्थिति चिंताजनक इसलिए भी है कि आम मध्यमवर्गीय इलाकों में पानी की उतनी कमी नहीं है जितना उसके कोर वोट बैंक वाले निम्नवर्गीय इलाकों में है. अगर ये लोग आप से दूर हटते हैं तो इसका फायदा निश्चित तौर पर भाजपा और कांग्रेस को होगा.