यह साल भारत ही नहीं बल्कि इस पूरे उपमहाद्वीप के इतिहास में एक अहम पड़ाव रखता है. यह एक नए राष्ट्र के बनने का साल है. यह इंदिरा गांधी के ‘दुर्गा’ बनने का साल है. यह हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच हुई जंग में भारत की निर्णायक जीत का साल है. यह दुनिया के मानचित्र पर भारत के पहली बार वैश्विक ताक़त बनने का भी साल है. यह साल है 1971 का और यह उसी साल की बात है.

आख़िर ऐसा क्या हुआ था कि जिन दो मुल्कों को आज़ाद हुए महज़ दो दशक ही हुए थे, वे 1971 में तीसरी बार फिर लड़ पड़े?

भारत और पकिस्तान में राजनीतिक हालात और चुनाव

यूं तो भारत में आम चुनाव 1972 में होने थे पर बैंकों के राष्ट्रीयकरण और पूर्व राजाओं और महाराजाओं को मिलने वाले प्रिवी पर्स बंद होने से मचे घमासान की वजह से इंदिरा गांधी ने इन्हें एक साल पहले ही करवा दिया. इंदिरा का ‘ग़रीबी हटाओ’ नारा सफल रहा. उनकी पार्टी को चुनाव में ज़बरदस्त जीत हासिल हुई.

उधर, उस साल पाकिस्तान में पहला आम चुनाव हुआ था. ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी शेख़ मुजीबुर्रहमान की नेशनल अवामी लीग आमने-सामने थीं. रामचंद्र गुहा ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि भुट्टो का नारा था ‘रोटी कपड़ा और मकान’. दूसरी तरफ, शेख़ मुजीबुर्रहमान बंगाली मुसलमानों की अस्मिता के साथ-साथ उन्हें स्वायत्तता दिलवाने और बांग्ला भाषा को बचाने के मुद्दे पर लड़ रहे थे.

उस वक़्त पाकिस्तान के दो हिस्से - पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान - भारत को घेरे हुए थे. पश्चिमी पाकिस्तान पंजाबी भाषी मुस्लिम बहुल इलाक़ा था. पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली मुसलमान बहुसंख्यक थे. दोनों इलाकों में भाषा, तौर तरीके और रहन-सहन में ज़मीन आसमान का अंतर था. गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों ने पूर्वी पाकिस्तान को प्राकृतिक संसाधनों से लबरेज़ कर रखा था. पश्चिमी पाकिस्तान इनका भरपूर दोहन कर रहा था. सरल भाषा में कहें तो कमाई पूर्व से हो रही थी, ऐश पश्चिम काट रहा था.

खैर, वापस चुनाव पर लौटते हैं. राष्ट्रपति याहया खान की उम्मीदों के उलट नेशनल अवामी लीग को बहुमत मिल गया और इससे वहां के राजनैतिक समीकरण बदल गए. मुजीबुर्रहमान को प्रधानंत्री बनते देखना न तो भुट्टो को पसंद था और न ही याहया खान को, लिहाज़ा, दोनों ने मिलकर संसद भंग कर दी और मुजीबुर्रहमान को पश्चिम पकिस्तान में नज़रबंद कर दिया गया.

बंगाल का कसाई और ऑपरेशन सर्चलाइट

मुजीबुर्रहमान के नज़रबंद होते ही पूर्व में दंगे भड़क गए. तब, लेफ्टिनेंट जनरल टिक्का खान को वहां का गवर्नर और जनरल ऑफिसर कमांडिंग बनाकर भेजा गया. टिक्का खान ने ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू कर दिया इसके तहत अवामी लीग के राजनेताओं की धरपकड़ शुरू गयी और साथ में शुरू हुआ बंगालियों का क़त्लेआम. इस क़त्लेआम ने टिक्का खान को ‘बंगाल के कसाई’ के नाम से कुख्यात कर दिया.

पाकिस्तान के भूतपूर्व राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष परवेज़ मुशर्रफ़ अपनी जीवनी ‘इन द लाइन ऑफ़ फायर’ में पाकिस्तान में हुए आम चुनाव के बाद बदले हुए हालात को कुछ यूं बयान करते हैं, ‘भुट्टो ने पश्चिमी पाकिस्तान से नेशनल असेंबली के लिए चुने हुए सदस्यों को खुले आम धमकी दी कि अगर वे ढाका जाते हैं तो एक तरफ़ा टिकट लेकर जाएं. अगरचे वापस आये, उनकी टांगें तोड़ दी जायेंगी. वहीं शेख़ मुजीबुर्रहमान ने भी पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों से संपर्क नहीं साधा, और, न ही भुट्टो की चालों का कोई तोड़ निकाला.’ मुशर्रफ़ के मुताबिक़ हिंदुस्तान ने इसका बख़ूबी फ़ायदा उठाया.

क्या भारत ने इसका फ़ायदा उठाया था

बांग्लादेश में मचे क़त्लेआम से करोड़ों बंगालियों ने पश्चिम बंगाल यानी भारत की तरफ पलायन शुरू कर दिया. इससे वहां और आसपास के राज्यों में हड़कंप मच गया.. हिंदुस्तान ने भी बड़ा दिल रखते हुए उनके लिए अस्थायी शरणार्थी कैंपों का निर्माण करवाया. पर यह समस्या का हल नहीं था.

रामचंद्र गुहा भी अपनी किताब में इस मसले पर रॉ की भूमिका की बात करते हैं. वे लिखते हैं कि पाकिस्तान में चुनाव होने के बाद रॉ ने पकिस्तानी सेना की बढ़ती हुई ताक़त को आगाह करने के सिलसिले में सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी थी. रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि वहां के संवैधानिक हालात को देखते हुए पाकिस्तानी सेना के जनरल देश को भारत के साथ युद्ध करने के लिए उकसा सकते हैं.

रामचंद्र गुहा आगे लिखते हैं कि इसी दौरान रूस में भारत के राजदूत, दुर्गा प्रसाद धर ने विदेश सचिव, पीएन हक्सर को रूस से पत्र लिखा. इसमें कहा गया था कि भारत को पकिस्तान के ख़िलाफ़ ‘प्रोपेगैंडा वॉर’ में जीत मिलती हुई नज़र आ रही है और इसका सबसे बड़ा कारण है, पीड़ित बंगाली शरणार्थियों की सहायता. कुछ विश्लेषकों ने धर को यह भी समझाया कि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ किसी बड़ी और प्रचंड कार्रवाई से बेहतर होगा कि पूर्वी पाकिस्तान को ऐसे गड्ढे में बदल दिया जाए जो पाकिस्तान के संसाधनों को ख़त्म कर दे और इसके लिए एक या दो हफ़्ते की रणनीति के बजाय एक या दो साल की प्लानिंग की जाए.

भारत की रणनीतिक और कूटनीतिक चालें

29 अप्रैल को एक बेहद अहम बैठक हुई थी जिसने शायद इस पूरे क़िस्से का रुख ही मोड़ दिया था. इस बैठक में इंदिरा गांधी ने सेनाध्यक्ष सैम मानेकशा को बुलाकर पूर्वी पाकिस्तान पर चढ़ाई करने का हुक्म सुनाया जिसे मानेकशा ने सिरे से यह कहकर खारिज कर दिया कि अभी सही वक़्त और हालात नहीं हैं. उनका कहना था कि मानसून आने वाला है और चीन और अमेरिका का रूख़ भी साफ़ नहीं है. इसके अलावा सेना भी कमज़ोर और बिखरी हुई है. मानेकशा ने मोहलत मांगी. इंदिरा समझदार थीं. वे मान गईं.

इस दौरान कूटनीति का सहारा लिया जाने लगा. बताया जाता है कि एक तरफ़ भारतीय सीमा में स्थित कैंपों में गुरिल्ला संगठन मुक्ति बाहिनी के लड़ाकों को ट्रेनिंग दी जाने लगी और दूसरी तरफ़ रूस और अन्य देशों से संपर्क तेज़ किए गए.

पाकिस्तान भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा. अप्रैल 1971 में चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने याहया खान को चिट्ठी लिखी. इसमें कहा गया था कि भारत पाकिस्तान के टुकड़े करने की साज़िश कर रहा है. चाऊ एन लाई ने याहया खान को भरोसा दिलाया कि अगर जंग हुई तो वे पाकिस्तान के साथ हैं.

अपने सबसे विश्वस्त सलाहकार पीएन हक्सर के कहने पर इंदिरा गांधी ने मंत्रिमंडल के वरिष्ठ मंत्रियों को यूरोप के देशों में अपने पक्ष में हवा बांधने का ज़िम्मा दिया. ख़ुद वे अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के सुरक्षा सलाहकार डॉ. हेनरी किसिंजर से बांग्लादेशियों के मुद्दे को लेकर बड़े ही चतुराई भरे तरीके से मिलीं.

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर अपनी जीवनी ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में लिखते हैं कि इंदिरा ने मानेकशा को वर्दी में अपने दफ़्तर बुलाया और इंतज़ार करने को कहा. अमेरिका पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान को एक साथ देखना चाहता था. इंदिरा ने किसिंजर को सिर्फ इतना भर ही कहा कि कैसे भी करके बंगालियों का हिंदुस्तान में पलायन रुकवाया जाए और चलते-चलते उनकी मुलाकात मानेकशा से करवाई. यह इशारा था कि अगर कुछ जल्द नहीं किया गया तो भारत आर-पार की लड़ाई से भी पीछे नहीं हटेगा.

राष्ट्रपति निक्सन के दिल में याहया खान की एक साफ़ दिल इंसान की छवि और सहानभूति थी. वे क़तई नहीं चाहते थे कि बंगालियों पर हो रही ज़्यादतियों की वजह से भारत पाकिस्तान के टुकड़े कर दे. इसके लिए उन्होंने पाकिस्तान के साथ रहने का वायदा भी किया. यह भारत के लिए दिक्कत थी. इंदिरा ने अब रूस का दामन थाम लिया और दोनों देशों के बीच संधि हो गयी.

इंदिरा ने रूस के अलावा कई देशों के दौरे किए. वे जहां भी गईं, उन्होंने सिर्फ एक बात पर ही ज़ोर दिया और वह यह कि पूर्वी पाकिस्तान में कोई गृह युद्ध नहीं चल रहा है बल्कि बंगालियों का अपनी सरकार चुनने के लिए नरसंहार किया जा रहा है.

जब इंदिरा गांधी रिचर्ड निक्सन से मिलीं तो अमेरिकी राष्ट्रपति ने उन्हें साफ चेतावनी दी कि भारत को जंग की भारी क़ीमत चुकानी पड़ जायेगी. इशारा साफ़ था, पर इंदिरा ने भी कह दिया कि जंग की बात पाकिस्तान कर रहा है, वे नहीं. रूस का भरोसा काम आ रहा था. सुदर्शन फ़ाकिर का शेर है, ‘क़त्ल की जब उसने दी धमकी मुझे, तो कह दिया मैंने भी देखा जाएगा.’

जंग के कुछ महीने

अक्टूबर 1971 आते-आते पूर्वी सीमा पर हालात बहुत बिगड़ गए. मुक्ति बाहिनी पाकिस्तानी सेना और रज़ाकारों से भिड़ गयी. भारतीय सेना बंगालियों की पीठ पर हाथ रखे हुए थी. मानेकशा ने बीते कुछ महीनों में सेना की ताक़त में इज़ाफ़ा कर लिया था.

तीन दिसंबर 1971. जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ. पाकिस्तान ने वेस्टर्न सेक्टर यानी भारत से लगती हुई पश्चिमी सीमा पर हमला बोल दिया. अब जंग दोतरफ़ा हो गयी. भारत तैयार था. पाकिस्तान का समुद्री रास्ता रोक लिया गया. चूंकि सर्दियां थीं, इसलिए हिमालय की तरफ़ से पाकिस्तान को चीनी सहायता नहीं मिल पायी. छह दिसंबर को भारत ने बांग्लादेश को नए देश का दर्ज़ा दे दिया. 16 दिसंबर को पकिस्तान के 90,000 सैनिकों ने ढाका में समर्पण कर दिया. इस संभावित हार से कुछ दिन पहले तिलमिलाए अमेरिका ने हिंद महासागर में स्थित अपने सातवें जहाज़ी बेड़े को भारत की तरफ़ कूच करने का आदेश दे दिया था. पर बीच में रूस ने भारत से दोस्ती निभाते हुए उससे कह दिया कि वह इस मामले दूर रहे.

जंग के बाद

पाकिस्तान की यह करारी हार थी. बांग्लादेश का उदय हो गया था. इस जीत ने भारत के भीतर ज़बरदस्त जूनून भर दिया था. 1965 की जीत कुछ मायनों में निर्णायक नहीं कही जाती. लेकिन 1971 की जीत संपूर्ण जीत थी. सैम मानेकशा की लोकप्रियता चरम पर पहुंच गयी. हर तरफ़ इंदिरा गांधी की चर्चा थी. लोग उन्हें दुर्गा का अवतार मानने लगे थे.

मुशर्रफ़ ने अपनी किताब में लिखा है, ‘मैं उस दिन रोया था.’