हमारा समय, किसी भी पहले के समय से अधिक झूठ से भरा-आक्रान्त समय है. राजनीति, धर्म और मीडिया सभी पूरी बेशर्मी से झूठ परोस रहे हैं. सुबह-सवेरे, दिनदहाड़े, देर रात हम झूठ देख-सुन रहे हैं. इस क़दर कि कई बार लगता है कि हमें झूठ रास आने लगा है. झूठ के विरुद्ध सोचने या कुछ करने के लिए जो बन्धन और मर्यादायें हमें उकसाते थे, वे शिथिल हो रहे हैं. झूठ का प्रतिरोध करने की हमारी पारंपरिक शक्ति मानो क्षीण पड़ रही है.

यह कह-सोच कर कुछ राहत या दिलासा मिलता रहता है कि झूठ ज़्यादा देर तक चल नहीं सकता. पर जिस आत्मविश्वास से, जिस गति से झूठ को व्यापक समर्थन मिल रहा है, उससे यह नहीं लगता कि वह जल्द हमारे सार्वजनिक संसार के बाहर या भीतर कमज़ोर पड़ जाएगा. कम से कम इस समय झूठ दिग्विजय की आभा से जगमगा रहा है और उसके डगमगाने की उम्मीद निराधार लगती है.

झूठ की इस संस्कृति में क्या सत्यान्वेषी (सच्ची) कलायें कुछ कर पा रही हैं? यह सवाल स्वाभाविक है. हाल ही में एक संगीत समारोह में मैंने यह कहने की हिमाक़त की कि संगीत और कलाओं में झूठ का व्यापार इतना व्यापक और अपराजेय नहीं हो पाया है. झूठ की चमक-दमक और चकाचौंध संगीत में स्वर की सच्चाई की जगह को हटा-मिटा नहीं पाई है. इन दिनों कई बार जब हम संगीत सुनते हैं तो लगता है कि हमने झूठों की बारात को बाहर ठेल दिया है. हम स्वर की सच्चाई के सामने हैं. संगीत में झूठे स्वरों से काम नहीं चल सकता. मक्कार से मक्कार संगीतकार को भी स्वर की सच्चाई की तलाश होती है, लेकिन यह राजनेता, धर्मनेता और मीडिया के बारे में नहीं कहा जा सकता. स्वर की सच्चाई आसानी से नहीं सधती. उस पर पहुंचने के लिए अभ्यास चाहिए. अभ्यास तो हत्या करने, बलात्कार करने, नफ़रत करने के लिए भी चाहिए पर वह अभ्यास सच्चाई से दूर जाने, उसे दबाने-दबोचने का अभ्यास होता है. संगीत और कला का अभ्यास सच्चाई के नज़दीक पहुंचने का अभ्यास होता हैै.

स्वर की सच्चाई सिर्फ़ माध्यम की सच्चाई नहीं होती. वह कोई दार्शनिक या अवधारणात्मक सच्चाई भी नहीं होती. स्वर की सच्चाई में ‘क्या’ और ‘कैसे’ का भेद मिट जाता है. अगर स्वर सच्चा है तो उसमें होने वाले विराट का स्पन्दन भी सच्चा होगा. स्वर की सच्चाई संगीतकार और रसिक दोनों को सच्चा बनाती है. यह समावेशी सच्चाई है, जिसमें जो भी शामिल है सच्चाई का हिस्सा हो जाता है. इतने सारे झूठों से घिरे रहकर भी हम स्वर की सच्चाई के माध्यम से सच्चे हो जाते हैं. यह चमत्कार है. यह चमत्कार होता रहता है और झूठों का आतंक उसके होने को रोक नहीं पाता. एक अभागे समय में यह सौभाग्य होने के बराबर है.

निरखती नज़र

गुजराती चित्रकार-कवि ग़ुलाम मोहम्मद शेख़ ने अपने कला-निबंधों के लिए ‘निरखती नज़र’ पद का इस्तेमाल किया है. उसका इस्तेमाल साहित्य में भी किया जा सकता है. हमारी नज़र जब निरखती है तो उस पर अपने समय और समाज के अलावा निजी रुचि और संस्कार के कई दबाव पड़ते हैं. आज जब हम भक्तिकाल के कवियों को पढ़ते हैं तो उनके समकालीनों जैसी आस्था में हमारी साझेदारी नहीं होती. हम आस्था से अधिक संशय से बिंधे लोग हैं. हम कविता में भक्ति नहीं सच्चाई खोजते हैं. हमें मानवीय स्थिति के बारे में कुछ रोशनी की तलाश है बजाय किसी पवित्रता के निर्मल आलोक के. सौभाग्य यह है कि भक्ति काव्य में सच्चाई और मानवीय स्थिति, तत्कालीन यथार्थ पर्याप्त है. आस्था और पवित्रता से परे भक्त कवियों की जगह और गौरव इसे नए ढंग से निरखती नज़र में भी बने रहते हैं बल्कि नए अर्थों में सत्यापित होते हैं.

यह निरखना यह देख पाता है कि तुलसीदास रामभक्त कवि तो हैं पर उनका अकाल और ग़रीबी का, विपन्नता का वर्णन बहुत मार्मिक है. इस वर्णन में तुलसीदास संभवत विश्व स्तर पर बेजोड़ ठहरेंगे. तुलसीदास में हिन्दी भाषा का अपार वैभव भर प्रगट नहीं होता. उनमें इस अंचल की मर्मान्तक सच्चाई भी अपने विद्रूप और मर्म में ज़ाहिर होती है. इस निरखने से यह पता चलता है कि सूरदास सिर्फ़ वात्सल्य और प्रेम के कवि भर नहीं हैं. उनके यहां उत्तर भारत के किसान-जीवन का भी अद्भुत बखान है. यह निरखना हमें यह भी बता सकता है कि जयशंकर प्रसाद अपने समय के एक ऐसे कवि-नाटककार थे, जिनके यहां प्रेमचंद की तरह सच्चाई सिर्फ़ वर्तमान भर नहीं थी, उसका अतीत भी था. उनके बराबर किसी हिंदी लेखक में पूर्व-पश्चिम के चिंतन की समझ नहीं थी. वे अपनी कविता को सभ्यता-आलोचक बना पाए थे क्योंकि वे एक विचारक कवि थे.

एक दूसरे स्तर पर इस निरखने का अर्थ अतीत की कृतियों को वर्तमान के आलोक में नई प्रासंगिकता देना है. पर इस नज़र को सतर्क और आत्मालोचक होने की भी सख़्त ज़रूरत होती है. वह कहीं अपने उत्साह में अतीत की कृतियों का मनमाना पुनर्पाठ कर उनकी स्वायत्तता का उल्लंघन या अतिक्रमण तो नहीं कर रही है? इस नज़र को पुरानी कृतियों को अपने अनुकूल और पालतू बनाने की, उन्हें अपने अनुरूप स्वायत्त करने की चेष्टा से मुक्त रहना चाहिए. यह निरखने को निश्चय ही समस्यामूलक बनाएगा. निरखना, हर हाल में एक बारीक काम है जिसे कृति की अपनी बारीकियों से निपटे बिना प्रामाणिक नहीं माना जा सकता. नज़र को निरखने का हक़ है पर यह ज़िम्मेदारी बल्कि जवाबदारी भी उसकी है कि वह निरखने को यानी अपने को भी निरखे. जो अपने को ही निरख न पाए और दूसरों को ही निरखती रहे वह नज़र क्या.

ग्वालियर के कृष्णराव पंंडित

मेरी उम्र 16 के क़रीब थी और उन दिनों में फिल्मी संगीत का दीवाना था. सहगल और लता के गाने गुनगुनाता था. शास्त्रीय संगीत का कोई इल्म न था, सुनने तक का नहीं. एक शाम, जब हस्ब-ए-मामूल (हमेशा की तरह) रमेशदत्त और मैं अपनी शाम की सैर पर थे तो सागर के कटरा बाज़ार में म्युनिसिपल हाईस्कूल के हाल में ग्वालियर के पण्डित कृष्णराव शंकर पंडित के पक्के गाने का कार्यक्रम हो रहा था. हम दोनों वहां 15 मिनट रुकने की सोचकर दाख़िल हुए. एक सुदर्शन गोरे-चिट्टे गायक भारी आवाज़ में गा रहे थे. हम बैठ गए और धीरे-धीरे उस गाने का असर हम पर तारी होना शुरू हुआ. उसने हमें एक तरह से घेरना शुरू किया. मैं सोचने लगा कि असली गाना तो यह है. ये साढ़े तीन मिनट का गाना क्या होता है इसके सामने? यह, मेरे जाने-चाहे बिना, रुचि-परिवर्तन की शाम थी. मेरा मन तब से शास्त्रीय संगीत में इस क़दर रमा कि फिर वापस कभी फिल्मी संगीत की ओर पिछले 60 सालों में गया ही नहीं!

भोपाल के उत्सव-73 में पंडित जी से परिचय हुआ. बाद में जब भी वे भोपाल आकाशवाणी में रिकॉर्डिंग के लिए आते तो पुराने भोपाल के किसी होटल में रुकते और कई बार तांगे से मुझसे मिलने आते. ग्वालियर घराने के अन्तर्गत पंडित परिवार अपनी विरासत को मज़बूती और सख़्ती से सम्हाले था. उसमें एक गायक उस्ताद निसार हुसैन ख़ां बरसों इस वेदशास्त्रप्रवीण ब्राह्मण परिवार में राजदरबार छोड़ देने के बाद रहे थे. अष्टांग गायकी के लिए विख्यात पंडित-सम्पदा में अद्भुत विपुलता थी: उसमें जयदेव की संस्कृत कविता से लेकर पंजाबी टप्पों की कई बंदिशें शामिल थीं.

कृष्णराव जी पर केन्द्रित एक प्रसंग हमने भारत भवन में 1986 में आयोजित किया था. जिसमें उनके कई शिष्य जैसे पंडित शरद्चन्द्र आरोलकर आदि भी शामिल हुए थे. उन पर एक पुस्तक भी संगीतकार नीला भागवत ने लिखी थी जिस पर परिवारीजन ने आपत्ति की थी. झगड़ा मुख्यतः इस बात को लेकर था कि उसमें इस गायकी को पुरुषप्रधान बताया गया था. सख़्त और पौरुषयुक्त. एक बार पंडित जी बीमार पड़े. उसी दौरान तब के मुख्यमंत्री ग्वालियर के पास कहीं जा रहे थे. मैंने उनसे आग्रह किया वे ग्वालियर होकर लौटें और पंडित जी को अस्पताल में देखते आएं. ज़िला प्रशासन को इससे परेशानी हुई. पर मुख्यमंत्री गए. वे अर्जुन सिंह थे. बाद में जब पंडित जी का देहावसान हुआ तो पहली बार मध्य प्रदेश में किसी कलाकार की अन्त्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ सम्पन्न हुई. फिर इसकी परिपाटी बन गई जिसका कुमार गन्धर्व और सैयद हैदर रज़ा के निधन के समय भी पालन किया गया.

अपने परिवार और घराने की परम्परा को बहुत सख़्ती और ज़िद से सम्हाले हुए और उस पर उचित अभिमान करनेवाले संगीतकार कम ही हुए हैं. उनके अलावा ग्वालियर घराने की दूसरी शाखा राजा भैया पूछवाले में भी ऐसी ही अटल निष्ठा थी. उनके बेटे और शिष्य बाला साहब पूछवाले की जन्मशती मनाई जा रही है. उन्हें, दुर्भाग्य से, मान्यता देर से मिली.