भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा से इस बातचीत के लिए पहले से वक्त लिया गया था, लेकिन तय समय पर भी वे टीवी स्टूडियो के भीतर ही थे. डिबेट यहां खत्म हो चुकी थी. ब्रेक के बाद विज्ञापन आने लगे थे, लेकिन संबित पात्रा बोले जा रहे थे, ‘आप जिन्ना के समर्थक हैं...आप राष्ट्रद्रोही हैं...’ एंकर याचना के स्वर में कह रहा था, ‘संबित जी, शो खत्म हो चुका है...’ हालांकि इस याचना का भाजपा प्रवक्ता पर फर्क नहीं पड़ा. इस पर उनका कहना था, ‘नहीं ये गलत है... मुझे अपनी बात पूरी करने दीजिए...’ खैर, चैनल के लोगों ने हाथ-पैर जोड़कर संबित को स्टूडियो से विदा किया. स्टूडियो से निकलते ही हमने उन्हें लपक लिया. औपचारिक अभिवादन से बात शुरू हुई.

संबित जी, टीवी की बहस में आप इतना आक्रामक क्यों रहते हैं? मतलब इतना चीखना-चिल्लाना क्यों?

सबसे पहले तो मैं बहुत विनम्रता से आपके अच्छे शब्दों के लिए धन्यवाद कहना चाहूंगा. इसके बाद मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि जिसे आप चीखना-चिल्लाना कहते हैं, उसी में बहस की सार्थकता है. देखिये, वैसे तो विपक्ष के पास कोई कहने लायक बात है नहीं. लेकिन कभी-कभी कोई विपक्षी प्रवक्ता कोई ऐसी तर्कपूर्ण बात कह देता है कि सिर्फ कुतर्क का सहारा लेकर उसे नहीं हराया जा सकता. ऐसे में मैं कुतर्क के साथ चीखने-चिल्लाने का भी सहारा लेता हूं. भले ही कोई इसे गलत कहे, लेकिन मैं राष्ट्रहित के लिए कितना भी गाल बजा सकता हूं और अपने गले को लाउडस्पीकर बना सकता हूं. (आवाज ऊंची होती जाती है)

आराम से संबित जी...

माफी चाहूंगा. मुझे लगा कि मैं स्टूडियो में हूं और लाइव डिबेट में मेरी बोलने की बारी आ गई.

आप सर्जन हैं, फिर राजनीति में कैसे आ गए?

देखिये हम एकात्म मानववाद को मानने वाले लोग हैं. देश एनेस्थीसिया में ऑपरेशन टेबल पर पड़ा हो और मैं किसी एक मानव की सर्जरी में लगा रहूं, ये तो राष्ट्रद्रोह है. ये कांग्रेस कर सकती है, हम नहीं. वैसे राजनीति में भी मैं बतौर सर्जन सक्रिय हूं. रोज रात को प्राइम टाइम में अपनी वॉयस थेरेपी से एंकरों, विपक्ष के प्रवक्ताओं और टीवी देखने वाली जनता के दिमाग की सर्जरी करता हूं. दिल्ली से पचास-पचास कोस दूर तक लोग कहते हैं कि बेटा वॉल्यूम कम कर ले नहीं तो संबित टीवी से बाहर आ जायेगा.

आपने कहा था कि 2014 में जनता ने कांग्रेस के खिलाफ महाभियोग शुरू किया था, कर्नाटक में वो पूरा हो जाएगा. इस टिप्पणी से आप क्या सच बयान करना चाह रहे हैं?

देखिये प्रवक्ता ऐसा होना चाहिए कि हर झूठ-सच को ऐसे आत्मविश्वास के साथ बोले कि बेहया का फूल भी मुरझा जाए. बीजेपी कार्यकर्ता आधारित पार्टी है. हमारा हर कार्यकर्ता बतोलेबाजी के संस्कार में माहिर है. कांग्रेस इतनी पुरानी पार्टी है, एक से एक घाघ नेता हैं, लेकिन टीवी पर गलेबाज़ी के मामले में वो हमारे सामने कहीं नहीं टिक पाते. जनता भी अब सब समझने लगी है.

आपके मुताबिक भाजपा जवाब देने में पीछे नहीं रहती, लेकिन पिछले चार सालों के दौरान प्रधानमंत्री जरूरी सवालों पर चुप्पी साधते रहे हैं. जहां पीएम को बोलना चाहिए वहां प्रवक्ता बोलते हैं. जहां प्रवक्ता को बोलना चाहिए वहां पीएम! ऐसा क्यों?

भाजपा उस तरीके में विश्वास नहीं करती जो कांग्रेस पिछले 70 सालों से देश पर थोपे हुए थी कि बोलने का हक बस एक परिवार के पास रहे. भाजपा में प्रधानमंत्री और कार्यकर्ता सभी बराबर हैं. यहां हर किसी को बोलने का हक़ है, भले ही वो कितना भी अनाप-शनाप बोले, अंट-शंट बोले. प्रधानमंत्री जी चुनावी सभा में इतिहास का कोई जरूरी मुद्दा उठा रहे होते हैं या किसी को टंग-ट्विस्टर का चैलेंज दे रहे होते हैं तो महत्वपूर्ण मसले पर हम बोल देते हैं. प्रवक्ता के कहने वाली किसी बात से अगर कुछ वोट आने वाले होते हैं तो चुनावी सभा में पीएम साहब बोल देते हैं. यही लोकतंत्र की खूबसूरती है.

आपने एक टीवी बहस में कहा था कि सरकार पीएनबी घोटाले वाले नीरव मोदी को विदेश से वापस लाएगी. लेकिन अभी तक तो आप लोग विजय माल्या को ही वापस नहीं ला पाए हैं.

पहले आप यह समझिए कि ठीक से तो हम अभी तक नरेंद्र मोदी जी को भी विदेश से वापस नहीं ला पाए हैं. विदेश से आते हैं और वे चुनाव प्रचार कर फिर विदेश चले जाते हैं. कुल मिलाकर देश के प्रधानमंत्री तक को जब विदेश से वापस लाना इतना मुश्किल है तो फिर बाकी लोगों की तो बात ही छोड़ दीजिए. वैसे भी हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष जी पहले कह ही कह चुके हैं कि राजनीति में जुमलों का इस्तेमाल होता है. जहां तक टीवी बहस में मेरी टिप्पणी की बात है तो उस दौरान पार्टी हित और देश हित में ही मैंने कुछ कहा होगा. इसका मतलब ये तो नहीं है कि मैं विदेश जाऊं और नीरव को अपनी जेब में डालकर ले आऊं! आप यह भी समझिए कि बात का बतंगड़ बनाने का हक सिर्फ नेता को है. जनता को बात और बतंगड़ में फर्क समझना चाहिए.

बोलने में आप नरेंद्र मोदी जी जितने ही माहिर हैं, फिर आप उनके बजाय अरुण जेटली को अपना राजनीतिक गुरु क्यों बताते हैं?

मोदी जी को मैं पहले ही पिता तुल्य कह चुका हूं तो फिर उन्हें गुरु कैसे कह सकता हूं. और वैसे भी भाजपा एक पद, एक व्यक्ति के सिद्धांत पर काम करती है.

आप ओएनजीसी में एक निदेशक बन गए हैं, लेकिन इस सेक्टर में तो आपका कोई अनुभव भी नहीं है.

वाणी में है दम तो कुछ नहीं है कम. मैं वाणी का इस्तेमाल करते समय न तेल देखता हूं, न तेल की धार देखता हूं. ऑयल सेक्टर के लिए इससे बड़ी योग्यता क्या हो सकती है! वैसे भी जब नौ मन तेल हमारे पास है तो ओएनजीसी में राधा क्या कांग्रेस की नाचेगी! पिछले 70 साल से कांग्रेस पद रेवड़ियों की तरह बांट रही है. वहीं हमारी सरकार प्रसाद की तरह पद बांटने लगी तो तथाकथित सेकुलर और वामपंथियों के पेट में दर्द हो रहा है.

वैसे आपको सबसे ज्यादा किस मुद्दे पर बहस करना पसंद है.

देखिये, सफल प्रवक्ता कभी मुद्दा आधारित बहस नहीं करता. मुद्दा तो एक चक्रव्यूह होता है, जिसमें उसे फंसाने की कोशिश होती है. मैं मुद्दे में जाता ही नही. अक्सर, एंकर मुझसे कहते हैं - संबित जी आप मुद्दे से भटक गए हैं. मैं कहता हूं - मैं वहीं पर आ रहा हूं. दरअसल मैं जब ये कहता हूं तो मैं मुद्दे से और दूर निकल जाता हूं. मुझे शांत कराना ही वहां सबसे बड़ा मुद्दा बन जाता है.

एक आखिरी सवाल....

देखिये मुझे एक लाइव डिबेट में जाना है. मुद्दा है भारतीय राजनीति में जिन्ना का जिन्न. उसे मुद्दे से भटकाना है. शुक्रिया.