दवाइयां, बीमारी पर असर तो करती ही हैं, पर ऐसी कोई भी दवा आज तक नहीं बनी जो बीमारी पर तो पूरा असर करे, लेकिन उसका कोई दूसरा असर न हो! दूसरे असर होते ही हैं, किसी में कम, किसी में ज्यादा. किसी में मामूली तो किसी में जानलेवा तक. कई बार आप ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, अस्थमा, मिर्गी या ऐसी ही अन्य किसी बीमारी के लिए महीनों या सालों से कुछ दवाइयां ले रहे होते हैं और इनका कोई साइड इफेक्ट (दुष्प्रभाव) धीरे-धीरे आपके शरीर पर ऐसा असर दिखाता है जिसे आप एक नई बीमारी मान लेते हैं. कई बार तो डॉक्टर भी इसे नई बीमारी मानकर फालतू की दवाइयां शुरू कर सकता है जबकि इसका सही इलाज वह दवा बंद करना होता है. यहां मैं कुछ कथाएं सुनाता हूं जिससे आपको यह बात और स्पष्ट होगी.

पहली कथा -

मेरे मामा जी की उम्र 70 वर्ष है. हार्ट अटैक के बाद आठ साल पहले उनकी बाईपास सर्जरी हुई थी. तब से इलाज जारी है. जब भी गांव से उनका इधर आना होता है, मुझे तबीयत का हालचाल जरूर देते हैं. इस बार आए तो बताने लगे, ‘एक दिन सुबह-सुबह घूमने गया तो दिल की धड़कन बहुत तेज हो गई. आधे घंटे तक दिल धक-धक करता रहा.’

इस दिक्कत के हिसाब से मामा जी की जांच में कुछ भी नया नहीं निकला. दवाएं वे वही पुरानी खा रहे थे जिनका ऐसा कोई साइड इफेक्ट नहीं होता. तो उनकी इस नई दिक्कत का कोई क्लू नहीं मिल रहा था. धड़कन रोज़ तेज हो जाती. दिल 180-200 तक की स्पीड पकड़ लेता. मुझे लगा कि हृदयगति के दोष के लिए कहीं बड़े सेंटर में भेजकर जांच कराऊं क्या? पर ऐसी नौबत नहीं आई. उनकी समस्या की जड़ निकली आंखों में डालने वाली एक दवा! वे ग्लॉकोमा के लिए इस दवा की चंद बूंदें हर दिन आंखों में डाला करते थे. इसी दवा के साइड इफेक्ट की लिस्ट में दिल में ‘एरिदिमिया’ यानी धड़कन का बढ़ना लिखा था. जब उनकी यह दवा बंद की तो यह ‘बीमारी’ भी ठीक हो गई.

तो? तो यह कि आंखों में डालने वाली, चमड़ी पर लगाने वाली, कोरे पानी में मिलाकर भाप के तौर पर लेने वाली दवाइयां, सभी शरीर में इतनी मात्रा में तो प्रवेश करती ही हैं कि साइड इफेक्ट पैदा कर सकें. अमूमन लोगों को लगता है कि आंख की दवा या किसी मलहम के बारे में डॉक्टर को क्या बताना! लेकिन ऐसा न करें, कभी तबीयत खराब हो तो डॉक्टर को इन दवाइयों के बारे में भी जरूर बताएं.

दूसरी कथा -

भोपाल के एक सफल वकील. करीब साठ साल के. उनका कोई परिचित उन्हें लेकर मेरे पास आया. बड़े निराश. बताने लगे कि वकालत छोड़कर घर पर आराम कर रहा हूं. बड़ी कमजोरी सी हो गई है. पांव में सूजन है, चक्कर आते हैं और एक बार तो अंधेरा सा लगा और गिर पड़ा. शहर के एक मशहूर डॉक्टर ने कह दिया है कि आपको ‘एडवांस कार्डियक फेल्योर’ है, दिल का पंप काम नहीं कर रहा, सो जित्ता आराम करें, बेहतर. सोचा कि आपको भी दिखा दें कि कितने दिन और जीने वाला हूं?...

मैंने यह सब सुनकर उनके पुराने रिकॉर्ड देखे. उनकी लंबी हिस्ट्री पूछी. इस सबके बाद मैंने उन्हें कह दिया कि आपको तो कोई बीमारी ही नहीं है और आप काफी लंबी उम्र जीने वाले हैं. दरअसल उनकी मुसीबत की वजह ब्लड प्रेशर की एक गोली केल्सीगार्ड रिटार्ड थी. यह दवा कुछ लोगों के पांव में सूजन पैदा कर सकती है. ज्यादा सूजन हो तो दवा बंद करनी पड़ती है. इस केस में मरीज ने दवाई का यह पर्चा डॉक्टर को नहीं दिखाया था या डॉक्टर ने ये सरसरीतौर पर देखा और ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

और फिर डॉक्टर ने वकील साब के पैरों की सूजन, उम्र, ब्लड प्रेशर, और कुछ ईसीजी रिपोर्ट देखकर हार्ट फेल्योर की दवाइयां शुरू कर दीं. तब इस अच्छे-भले आदमी के साथ बुरा यह हुआ कि हार्ट फेल्योर की दवाओं का भी साइड इफेक्ट इसके ऊपर दिखने लगा था. यानी कोढ़ में खाज कह लें. चक्कर, कमजोरी, भूख खत्म. मैंने सारी दवाइयां बंद कीं. केल्सीगार्ड रिटार्ड भी. कुछ ही समय में वे बिलकुल ठीक हो गए.

तीसरी कथा –

कोई बीसेक साल का लड़का था. कई सालों से मिर्गी का इलाज लेते-लेते जब थक गया तो उसने हरिद्वार-ऋषिकेश के सबसे मशहूर डॉक्टर की तथाकथित आयुर्वेदिक पुड़िया खानी शुरू की. चमत्कार यह कि मिर्गी के दौरे कम हो गए. फिर? मेरे पास कैसे आया? हुआ यूं कि अब मिर्गी तो कंट्रोल में है साहब पर चलने में एकदम बैलेंस नहीं बनता. यहां का पांव, वहां पड़ता है और लड़का गिर जाता है. हजारों रुपये के सीटी स्कैन, एमआरआई और न जाने क्या-क्या करा चुका है.

रिकॉर्ड, हिस्ट्री और मरीज की जांच के बाद मैंने उसके मां-बाप से दो बातें कहीं. एक, यह डायलेंटिन सोडियम नामक मिर्गी की दवाई का साइड इफेक्ट है... ‘लेकिन हम तो आयुर्वेदिक…’ मां-बाप ने सफाई दी. मैंने उन्हें दूसरी बात बताई कि उस पुड़िया में किसी नीम-हकीम ने आयुर्वेदिक दवा के नाम पर डायलेंटिन ही पीसकर ओवरडोज में दे रखी है. मेरी बात सही भी निकली. पुड़िया बंद करने के एक माह बाद लड़का एकदम ठीक से चलने लगा.

याद रखें कि नीम-हकीम टाइप के आयुर्वेद विशेषज्ञ ज्यादातर ऐलोपैथिक दवाई की मनमानी खुराक को ही पीसकर पुड़िया पकड़ाते रहते हैं. तो कभी बीमार हों और ऐसी पुड़िया खाते हों तो इस बारे में भी डॉक्टर को जरूर बताएं.

इन तीनों कथाओं की शिक्षा :

किस्से तो और भी बताए-सुनाए जा सकते हैं, पर शिक्षा सबकी एक ही है. जब भी किसी नई तकलीफ के लिए डॉक्टर के पास जाएं तो उसे उन दवाओं के बारे में अवश्य बता दें जो आप किसी और कारण से ले रहे हैं. डॉक्टर द्वारा पूछने की प्रतीक्षा न करें. स्वयं बता दें, क्योंकि आजकल डॉक्टरों को भी ज्यादा से ज्यादा मरीज देखने के बीच कभी यह जानने की फुर्सत नहीं होती.