स्वीडन की साहित्यिक नोबेल पुरस्कार अकादमी 18 उम्रदराज़ लोगों की एक बहुत ही सम्मानित मंडली है. 1901 से वही हर साल अक्टूबर में साहित्य जगत के किसी एक, या कभी-कभी एक से अधिक नोबेल पुरस्कार विजेता का चयन करती है. पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी इसकी सदस्य होती हैं. हर सदस्य को उसके नाम के बदले उसके बैठने की कुर्सी के नंबर से जाना जाता है.

1786 में स्थापित इस अकादमी के नियम सदियों पुराने हैं. हर सदस्य इसका आजीवन सदस्य होता है. न तो कोई अपनी सदस्यता त्याग सकता है और न ही किसी की सदस्यता छीनी जा सकती है. अकादमी से नाराज कोई सदस्य अधिक से अधिक यही कर सकता है कि उसकी बैठकों में भाग लेना बंद कर दे. तब भी उसके जीते-जी उसकी खाली कुर्सी किसी और को नहीं दी जा सकती. 18 में से कम से कम 12 सदस्यों की उपस्थिति के बिना कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लिया जा सकता.

18 में से आठ गए

इस समय की स्थिति यह है कि अकादमी के भीतर छिड़ गये घमासान के कारण उसके कुल 18 में से आठ सदस्यों ने एकपक्षीय ढंग से उसके कार्यकलापों से नाता तोड़ लिया है. केवल 10 सक्रिय सदस्य शेष रह गये हैं. यहां तक कि औपचारिक तौर पर ‘स्थायी सचिव’ कहलाने वाली अकादमी की सर्वप्रमुख सारा दानियुस ने भी तौबा कर ली है और अपना पद छोड़ दिया है. जो सदस्य बचे हैं उनके बीच भी काफ़ी खटपट है.

सक्रिय सदस्यों की संख्या लगभग आधी हो जाने ने साहित्य की नोबेल पुरस्कार अकादमी को बिल्कुल पंगु बना दिया है. वह इस साल नोबेल पुरस्कार की घोषणा कर सकने के ही नहीं, कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय ले सकने में असमर्थ हो गयी है. उसकी कार्यप्रणाली के आधारभूत नियम जब बने थे, तब नोबेल पुरस्कारों की परंपरा का जन्म ही नहीं हुआ था. इस परंपरा की नींव पड़ी थी, अपने समय में स्वीडन के एक बहुत बड़े उद्योगपति और डायनामाइट के आविष्कारक रहे अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के अनुसार, दिसंबर 1896 में उनकी मृत्यु के छह महीने बाद.

स्वीडन के राजा की बेचैनी

लेकिन नोबेल पुरस्कार पहली बार 1901 में बांटे जा सके. साहित्य अकादमी तब से लेकर 2017 तक 110 बार 114 साहित्यकारों को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी है. अंतिम बार द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1940 से 1943 तक साहित्य के नोबेल पुरस्कार नहीं दिये जा सके थे. यह शायद पहली बार है कि अकादमी के पास इतने भी सक्रिय सदस्य नहीं बचे हैं कि वह वर्ष के नोबल पुस्कार विजेता का चयन कर सके.

स्वीडन के राजा कार्ल 16वें गुस्ताफ़ साहित्य अकादमी के संरक्षक हैं. दो मई को भारी स्वर में उन्होंने कहा, ‘अकादमी में हाल ही में हो रही घटनाओं को मैं बड़ी बेचैनी के साथ देखता रहा हूं. इन घटनाओं के कारण अपने सबसे महत्वपूर्ण दायित्वों को निभाने की अकादमी की क्षमता चिंताजनक ढंग से ख़तरे में पड़ गयी है.’ स्वीडन नरेश ने संकेत दिया कि अकादमी की कार्यक्षमता को बहाल करने के विचार से वे उसकी संविदा (स्टैट्यूट) में ऐसे संशोधन करने के पक्ष में हैं, जिनसे अकादमी के सदस्यों को त्यागपत्र देने और अकादमी को उनकी जगह भरने का अधिकार मिल जाये.

साख ख़ाक में मिली

स्वीडन की सम्मानित साहित्य अकादमी को इस अपमानजनक स्थिति में पहुंचाया है हमारे समय की सबसे बड़ी विश्वव्यापी बीमारी यौन दुराचार और भ्रष्टाचार ने. भारत ही नहीं, संसार के लगभग सभी देश नीचे से लेकर ऊपर तक यौनदुराचार और भ्रष्टाचार से घिरे हुए हैं, चाहे इसे कोई स्वीकार करे या नहीं. जहां तक स्वीडिश अकादमी का प्रश्न है, उसकी साख को ख़ाक में एक ऐसे व्यक्ति ने मिलाया है, जिसकी पत्नी अब तक अकादमी की सदस्य थी और उस व्यक्ति के काले कारनामों पर पर्दा डाल रही थी.

स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम के सांस्कृतिक जीवन में जो कोई अपने आप को कुछ समझता है, वह 71 वर्षीय जौं-क्लूद अर्नौ को भी जानता है. फ्रांसीसी मूल के अर्नौ की जान-पहचान और पहुंच बहुत दूर-दूर तक रही है. उसका ‘कल्चरल फ़ोरम’ साहित्यिक संध्याएं और महोत्सव आयोजित करता रहा है. नोबेल पुरस्कार अकादमी से उसे अनुदान इत्यादि मिलते रहे हैं. अकादमी की कुर्सी नंबर 18, यानी लेखिका और कवियत्री कतरीना फ्रोस्तेन्सोन, जौं-क्लूद अर्नौ की पत्नी हैं. शायद इसलिए उसने सोचा होगा, ‘जब सजनी भयी कोतवाल, तो फिर डर काहे का!’

यौन दुराचार के गंभीर आरोप

नवंबर 2017 में स्वीडन की 18 महिलाओं ने अर्नो पर अपने साथ यौनदुराचार के गंभीर आरोप लगाये. आरोप पहले भी लगते थे, पर कभी कुछ हुआ नहीं. दुराचारों का क्रम 1996 से चल रहा था. इस बार अधिकतर महिलाओं का कहना था कि उनका यौन शोषण अर्नो के ‘कल्चरल फ़ोरम’ वाले परिसर में या फिर स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम और पेरिस में स्थित ऐसे फ्लैटों में हुआ जिन्हें साहित्य अकादमी ने ही अर्नो को उपलब्ध कराया था. स्वीडन के एक प्रमुख दैनिक के साथ बातचीत में एक पीड़िता ने कहा कि स्टॉकहोम के एक पॉश मुहल्ले में उसके साथ बलात्कार किया गया. इस पीड़िता का कहना था, ‘सभी जानते हैं और सभी हमेशा इसे जानते थे कि वह जवान औरतों को अपना निशाना बनाता है.’

स्वीडन की राजकुमारी को भी नहीं बख्शा

स्वीडिश मीडिया में इन्हीं दिनों ऐसी रिपोर्टें भी चर्चा में रही हैं कि अर्नो ने तो एक बार राजगद्दी की उत्तराधिकारी युवराज्ञी विक्टोरिया के नितंब पर भी हाथ फिराया और उसका कुछ नहीं बिगड़ा! उसने सात बार साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेताओं के नाम औपचारिक घोषणा से पहले ही लीक कर दिये और उसका कोई बाल बांका नहीं हुआ! नोबेल पुरस्कार देने वाले विद्वानों की अकादमी अपनी ख्याति के नशे में अपने ही दिये तले का अंधेरा दो दशकों से न तो देख रही थी और न देखना चाहती थी,

जौं-क्लूद अर्नौ पर लगाये गये 18 महिलाओं के सामूहिक आरोप से उठे तूफ़ान से निपटने के लिए अकादमी ने, 23 नवंबर 2017 को, पहली बार एक ‘संकटमोचन’ बैठक बुलाई थी. बैठक के बाद घोषणा की गई कि जौं-क्लूद अर्नौ के साथ सारे संबंध तोड़े जा रहे है. यह भी कहा गया कि यह जानने के लिए एक जांच अकादमी के भीतर भी होगी कि उसके द्वारा दिये जाने वाले पुरस्कारों, अनुदानों और छात्रवृत्त्तियों पर भी इस व्यक्ति का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव तो नहीं रहा है. अकादमी की ओर से हर साल 50 छात्रवृत्तियां आदि भी दी जाती हैं.

गुटबंदी और आपसी कलह

23 नवंबर वाली बैठक के बाद अकादमी के सभी सदस्य दो गुटों में बंट कर आपसी कलह में उलझते गये. एक गुट 18 नंबर की कुर्सी पर बैठने वाली अकादमी सदस्य और जौं-क्लूद अर्नौ की पत्नी कतरीना फ्रोस्तेन्सोन का पक्षधर हो गया और दूसरा गुट विरोध में अकादमी की मुखिया सारा दानियुस का समर्थन करने लगा. दानियुस अकादमी के लिए सुधारों की तलाश में थीं ताकि उसे भ्रष्टाचार की राह से हटाया जा सके. उन्होंने, दिसंबर 2017 में, वकीलों की एक फ़र्म को अकादमी-सदस्य 65 वर्षीय कतरीना फ्रोस्तेन्सोन और सांस्कृतिक फ़ोरम चलाने वाले 71 वर्षीय उनके पति जौं-क्लूद अर्नौ बारे में की जा रही शिकायतों की जांच करने का जिम्मा सौंपा. कुर्सी नंबर 18 की कतरीना 1982 से अकादमी की सदस्य हैं.

वकीलों की इस फ़र्म ने पिछले महीने पेश अपनी रिपोर्ट में जो कुछ लिखा है, उसे लेकर अकादमी की कम से कम दो बैठकें हो चुकी हैं, पर रिपोर्ट के विवरण सार्वजनिक नहीं हुए हैं. इतना ही पता चल पाया है कि वकीलों ने उसमें लिखी अपनी जानकारियां पुलिस को भी देने की सलाह दी है. लेकिन, अकादमी के सदस्यों के बीच हो गयी गुटबंदी के कारण उसकी बैठकों में ऐसा कोई निर्णय नहीं हो पाया.

पलायन का तांता

किसी निर्णय के बजाय अकादमी के सदस्यों द्वारा मानो पलायन का तांता-सा लग गया. दो सदस्य तो इस सारे बखेड़े से बहुत पहले ही अकादमी का साथ छोड़ चुके थे. लेकिन जब तक वे जीवित हैं, उनकी कुर्सी ख़ाली पड़ी रहेगी. इस समय, कुर्सी नंबर 15 की 84 साल की केर्स्टिन एकमान ने 1989 में अकादमी से मुंह फेर लिया था. उनका कहना था कि सलमान रुश्दी के विरुद्ध मौत के ईरानी फ़तवे के प्रति अकादमी का लचर रुख उन्हें स्वीकार नहीं है.

कुर्सी नंबर एक, 54 साल की लोत्ता लोतास, निजी कारणों से सितंबर 2016 से अकादमी से दूरी बनाये हुए हैं. अप्रैल और मई के शुरू में अकादमी के छह और सदस्यों ने अपनी कु्र्सियां ख़ाली कर दीं. तीन लोगों ने छह अप्रैल की एक बैठक के दिन ऐसा किया. वे 61 से 88 वर्ष तक की आयु के पुरुष हैं. अगले ही दिन 45 वर्ष की लेखिका सारा स्त्रिद्सबेर्ग ने भी उन्हीं का अनुसरण किया.

मतदान का परिणाम आशा के उलट

इन चारों के बारे में सुनने में आया है कि वकीलों की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए छह अप्रैल को हुई बैठक में उन्होंने कतरीना फ्रोस्तेन्सोन को अकादमी से निकाल बाहर करने का समर्थन किया था. अकादमी की अच्छी जानकारी रखने वाले स्वीडिश दैनिक ‘एक्सप्रेसन’ ने लिखा कि अकादमी में उस दिन इस सवाल पर हुए मतदान का परिणाम आशा के विपरीत 8:6 से कतरीना फ्रोस्तेन्सोन के पक्ष में गया. यह उनके निष्कासन की मांग करने वाले गुट की करारी हार थी. विरोधस्वरूप उनमें से चार ने अकादमी को छोड़ दने की घोषणा कर दी.

जिन आठ लोगों ने कतरीना फ्रोस्तेन्सोन की सदस्यता बनी रहने का समर्थन किया था, उन्होंने ‘स्वेन्स्का दागब्लादेत’ नाम के अख़बार में 8 अप्रैल को अपने मतदान का कारण बताया. उन्होंने लिखा कि वकीलों की रिपोर्ट में ‘गुमनाम स्रोतों’ के आधार पर कतरीना फ्रोस्तेन्सोन पर ‘गोपनीयता लीक करने’ का आरोप लगाया गया है, इस कारण उन्हें ‘ग़ैर-अदालती सज़ा देने’ (यानी अकादमी से निष्कासित करने) का कोई पक्का क़ानूनी आधार नहीं बनता था.

पूरे इतिहास में केवल एक निष्कासन

इस स्पष्टीकरण में कहा गया है कि स्वीडिश साहित्य अकादमी के पूरे इतिहास में किसी सदस्य का निष्कासन केवल एक बार हुआ है– 1794 में. वह भी इसलिए कि गुस्ताफ़ माउरित्स आर्मफ़ेल्ट नाम के उस सदस्य को सरकार का तख्ता पलटने का षड़यंत्र रचने के आरोप में मौत की सज़ा सुनायी गयी थी. क्योंकि उसे मौत की अदालती सज़ा सुनायी गयी थी, इसलिए वह एक ऐसा पक्का क़ानूनी आधार था, जिसकी उपेक्षा नहीं हो सकती थी. इस स्पष्टीकरण का तात्पर्य यही था कि कुर्सी नंबर 18, कतरीना फ्रोस्तेन्सोन की सदस्यता रद्द नहीं की जा सकती, क्योंकि उन्हें किसी अदालत ने दोषी नहीं ठहराया है.

छह अप्रैल वाली तल्ख बैठक के करीब एक हफ्ते बाद यानी 12 अप्रैल को अकादमी की सर्वप्रमुख (स्थायी सचिव) 56 वर्षीय सारा दानियुस ने भी उससे विदा ले ली. पत्रकारों से उन्होंने कहा कि वे अकादमी-प्रमुख का अपना पद और अपनी सदस्यता वाली कुर्सी, दोनों छोड़ रही हैं. उन्होंने कहा, ‘अकादमी यही चाहती थी और मैं उसकी इच्छा का पालन कर रही हूं.’ अकादमी के एक सदस्य और भूतपूर्व प्रमुख होरास एन्गदाल उनसे इतना चिढ़ते हैं कि उन्होंने सारा दानियुस को अब तक का सबसे खराब स्थायी सचिव बताया.

पहली महिला प्रमुख का अशोभनीय अंत

सारा दानियुस 2015 में अकादमी की सर्वप्रमुख बनी थीं और वे उसके पूरे इतिहास में इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला थीं. बताया जाता है कि अकादमी की बैठकों में उनकी आलोचना हुई थी कि उन्होंने यौनदुराचार और भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने में बहुत ढिलाई से काम लिया. उसी दिन, यानी 12 अप्रैल को ही, इस सारे झमेले की जड़ कतरीना फ्रोस्तेन्सोन ने भी अकादमी में अपनी कुर्सी ख़ाली कर दी.

इस प्रकार, साहित्य का नोबेल पुरस्कार देने वाली स्वीडन की साहित्य अकादमी के आधा दर्जन सदस्य एक ही सप्ताह के भीतर अपनी-अपनी कुर्सियां खाली कर चुके हैं. दो कुर्सियां पहले से ही ख़ाली थीं. यानी ख़ाली कुर्सियों की कुल संख्या बढ़ कर आठ हो गयी और अकादमी के सदस्यों की कुल संख्या 18 से घटकर मात्र 10 रह गयी.

असाधारण स्थिति

इस असाधारण स्थिति के कारण ही शेष बचे 10 सदस्यों को चार मई की अपनी बैठक में यह निर्णय लेना पड़ा कि 2018 में साहित्य का नोबेल पुस्कार नहीं दिया जा सकता. इसके बदले 2019 में साहित्य के दो नोबेल पुरस्कार दिये जायेंगे. 1901 में नोबेल पुरस्कारों की परंपरा शुरू होने के बाद से कुल सात बार साहित्य के नोबेल पुरस्कार नहीं दिये जा सके थेः 1914, 1918, 1935, 1940, 1941, 1942 और 1943 में. 1914 और 1918 में प्रथम विश्वयुद्ध चल रहा था. 1940 से 1943 के बीच द्वितीय विश्वयुद्ध अपने चरम पर था.

अब प्रश्न यह है कि स्वीडन की साहित्य अकादमी में निज़ी अहंकारों का जो घमासान चल रहा था वह अब थम जायेगा या अभी और चलेगा. यह भी कि कहीं उसका भावी अस्तित्व ही दांव पर तो नहीं है? जानकार मानते हैं कि अब तक के झगड़े की मुख्य जड़ कुर्सी नंबर 18 के चले जाने से घमासान तो थम जाना चाहिये, पर वे ऐसा नहीं मानते कि अकादमी का अस्तित्व दांव पर है. उसके संरक्षक स्वीडन के राजा ने भी कहा है कि स्वीडन की अंतरराष्ट्रीय ख्याति के लिए वह ‘इतनी ज़्यादा महत्वपूर्ण’ है कि उसके उद्धार का कोई न कोई रास्ता निकाल लिया जायेगा.

नियमों में बदलाव के प्रयास

अकादमी को विदा कहने से पहले उसकी अब तक की प्रमुख सारा दानियुस की राजा कार्ल 16वें गुस्ताफ़ से नियमों में संशोधन के बारे में बात हुई थी. इस समय नियम है कि कोई सदस्य अकादमी की बैठकों में आता है या नहीं, वह जब तक जीवित है, उसकी कुर्सी किसी नये व्यक्ति को नहीं दी जा सकती.

अकादमी अपना हर नया सदस्य अपनी पसंद से स्वयं मनोनीत करती है. मनोनयन के लिए अब तक के कम से कम 12 सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है. सारा दानियुस का सुझाव था कि यदि कोई सदस्य अपनी सदस्यता त्यागना चाहता है तो उसे ऐसा करने का अधिकार भी होना चाहिये. तब उसकी मृत्यु की ख़बर आने तक प्रतीक्षा करने के बदले उसकी जगह किसी नये सदस्य को मनोनीत करना और इस प्रकार महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए न्यूनतम उपस्थिति की अनिवार्यता (कोरम) वाली शर्त को पूरा करना आसान हो जायेगा.

जीवनपर्यंत निर्मल आचरण

चर्चा इस बात की भी चल रही है कि अकादमी को यह अधिकार भी होना चाहिये कि एक स्पष्ट बहुमत के साथ वह आपत्तिजनक व्यवहार वाले सदस्यों को बाहर का रास्ता भी दिखा सके. आजीवन सदस्यता अच्छी बात है, लेकिन वह इस बात की गारंटी नहीं हो सकती कि हर सदस्य का आचरण जीवनपर्यंत निर्मल बना रहेगा. अकादमी के वर्तमान सदस्यों के बीच जब भी इन सुझावों पर सहमति बन जायेगी, समझा जाता है कि तब स्वीडन के राजा भी उस पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा देंगे. जर्मनी के पेन क्लब ने बिना मांगे ही सुझाव दिया है कि स्वीडिश अकादमी को चाहिये कि वह वर्तमान संकट का लाभ उठा कर अपना संपूर्ण कायाकल्प कर डाले और अंतरराष्ट्रीय सहित्यकारों को भी अपनी पांत में शामिल करे.