लखनऊ की जान कही जाने वाली गोमती नदी इन दिनों फिर से हरी-भरी हो गई है. लेकिन यह बदलाव पर्यावरण विशेषज्ञों की चिताएं बढ़ा रहा है. गोमती की सतह के चप्पे-चप्पे पर उग आई जलकुंभी के कारण नदी का यह हाल हुआ है. पिछले कुछ समय से गोमती के हरे रंग से ढक जाने का सिलसिला तेज हो गया है.

पर्यावरण के जानकार गोमती की सतह पर उगी जलकुंभी को नदी के जीवन के लिए घातक मानते हैं क्योंकि सतह पर इस खरपतवार बिछ जाने से सूर्य की किरणें नीचे पानी तक नहीं पहुंच पातीं और इस वजह से जलीय जीवन बुरी तरह प्रभावित होता है. जलकुंभी के कारण में पानी में घुली आक्सीजन में भी कमी आने लगती है और इन सबका मिला जुला असर ये होता है कि पानी सड़ने लगता है यानी नदी मरने लगती है.

लखनऊ में गोमती की ऐसी बदहाली लखनऊ के लोगों को हैरान भी करती है और आक्रोशित भी. ऐसा नहीं है कि गोमती की सफाई के लिए सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं. अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने से गोमती को अविरल और स्वच्छ बनाने की कोशिशें होती रही हैं. गोमती एक्शन प्लान के दो चरणों में खूब रकम भी खर्च हुई. सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बना कर सीवर को गोमती नदी में गिरने से रोकने के लिए भी काम शुरू हुए. करोड़ों की ड्रेजिंग मशीनें मंगाकर गोमती के अंदर से तलछट, रेत और गाद बाहर निकाली गई. लेकिन जो गंदगी निकाल कर किनारों पर जमा की गई थी वह बरसात आते ही फिर नदी में समाहित हो गई. अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ में अपने अंतिम चुनावी भाषण में अपनी ही राज्य सरकार को गोमती की सफाई में गैर जिम्मेदाराना रवैय्ये के लिए सार्वजनिक रूप से लताड़ा भी था, लेकिन गोमती उसके बाद भी साफ नहीं हो सकी.

उधर, अखिलेश यादव सरकार ने लखनऊ शहर के भीतर गोमती को साफ करने के लिए लगभग 1500 करोड़ की अति महत्वाकांक्षी योजना ‘गोमती रिवर फ्रंट’ के नाम से शुरू की थी. लेकिन यह भी गोमती का उद्धार करने के बजाय नेताओं, अधिकारियों और दलालों के ही घर भर गई. इसके बाद आई भाजपा सरकार ने रिवर फ्रंट योजना के भ्रष्टाचार पर हमला शुरू किया. योगी आदित्यनाथ ने शपथ लेने के बाद 27 मार्च 2017 को अपने मंत्रियों के साथ गोमती रिवर फ्रंट का निरीक्षण किया और प्रारंभिक जानकारी में भ्रष्टाचार के पुख्ता संकेत मिलने पर नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना की अध्यक्षता में चार सदस्यीय जांच समिति के गठन के आदेश दिए. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 1435 करोड़ के प्रोजेक्ट की 95 फीसद धनराशि का भुगतान होने के बावजूद वास्तविकता में 60 फीसदी काम ही पूरा हुआ है.

इसी बीच राज्य सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश आलोक कुमार सिंह को भी मामले की जांच का काम सौंप दिया. 16 मई 2017 को इस समिति की जांच रिपोर्ट में भी रिवर फ्रंट योजना में बड़ा भ्रष्टाचार पाया गया. इस रिपोर्ट के आधार पर 19 जून 2017 को लखनऊ पुलिस ने गोमतीनगर थाने में रिवर फ्रंट मामले में पहली एफआईआर दर्ज की.

प्रारम्भिक जांच में यह पाया गया कि योजना को बिना डीपीआर यानी डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार किए ही शुरू कर दिया गया था. परियोजना के सेंटेज चार्ज के रूप में कुल खर्च का 6.87 फीसद हिस्सा ई-पेमेंट या ट्रेजरी चालान के जरिए सरकार के खजाने में जमा किया जाना था. लेकिन जांच में पता चला कि लगभग 100 करोड़ की यह रकम जमा की ही नहीं गई. टेंडर प्रक्रिया में जरा भी पारदर्शिता नहीं बरती गई. बाजार मूल्य से कई गुना महंगी दरों पर सामान खरीदा गया. जो सामग्री देश में कम मूल्य पर आसानी से उपलब्ध थी उसे महंगी दरों पर यूरोप से मंगाया गया. जांच में यह भी पाया गया कि पूरी परियोजना में गोमती के पर्यावरण और सफाई पर जरा भी ध्यान नहीं दिया गया.

खन्ना समिति ने तो मामले की सीबीआई जांच की भी सिफारिश की थी. 17 जुलाई 2017 से योगी सरकार ने मामले की जांच सीबीआई से कराने की मंजूरी दे दी. एक दिसंबर 2017 को सीबीआई ने गोमतीनगर थाने में रिवर फ्रंट घोटाले की एफआईआर दर्ज करवाई. जांच एजेंसी ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा एक और 13 के तहत सिंचाई विभाग के तीन मुख्य अभियंताओं, चार सुपरिटेंडेंट इंजीनियरों और एक एक्जिक्यूटिव इंजीनियर के खिलाफ मामला दर्ज किया.

वैसे इस प्रारंभिक जांच में अब तक तत्कालीन सरकार यानी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, सिंचाई मंत्री रहे शिवपाल यादव के अलावा अन्य मंत्रियों और जिम्मेदार अधिकारियों को आरोपित नहीं बनाया गया है. हालांकि शिवपाल यादव ने 30 मई 2017 को एक सार्वजनिक बयान में यह कह कर रिवर फ्रंट घोटाले से अपने हाथ झाड़ लिए थे कि वे जब तक मंत्री रहे रिवर फ्रंट योजना में कोई घपला नहीं हुआ. लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि राजनीतिक मिलीभगत के बिना इस तरह का घोटाला सम्भव नहीं है. राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक रंजन व प्रमुख सचिव सिंचाई दीपक सिंघल को भी विभागीय जांच के दायरे में पाये जाने के बाद भी जांच की आंच से बचा दिया गया. अब भी जांच जिस रफ्तार से चल रही है वह दिखाती है कि भ्रष्टाचार के इस बड़े मामले को किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाने में सरकार की कितनी दिलचस्पी है.

योगी सरकार गोमती रिवर फ्रंट के भ्रष्टाचार को लेकर कितनी गंभीर है यह तो जांच की रफ्तार से दिखता ही है लेकिन वह गोमती की सफाई के लिए कितनी गंभीर है यह बात लखनऊ में नदी में बिछी हुई जलकुंभी बता रही है. योगी आदित्यनाथ ने छह नवंबर 2017 को गोमती रिवर फ्रंट की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई थी. इस बैठक में योगी ने रिवर फ्रंट के बचे हुए कामों को पूरा करने के निर्देश देते हुए कहा था, ‘यह जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा है. इसे यूं ही बर्बाद नहीं होने देंगे. इसलिए रिवर फ्रंट योजना में बचे हुए काम जल्द पूरे कराए जाएं. लेकिन इसमें नया काम नहीं कराया जाएगा. सबसे जरूरी काम गोमती नदी की सफाई है. पहले इसमें जमी जलकुंभी को साफ कराया जाए.’

मुख्यमंत्री के इस निर्देश को अब छह महीने पूरे हो गए हैं, लेकिन न तो गोमती को जलकुंभी से मुक्ति मिली और न ही रिवर फ्रंट के बचे हुए काम एक इंच भी आगे बढ़े. सवा साल से अधिक समय से छूटे रहने के कारण पुराने कार्य का हाल पहले से भी काफी खराब हो चुका है. वैसे सरकार ने गोमती को साफ करने के लिए गोमती के उद्गम क्षेत्र से ही एक बड़ी योजना चलाने का भी दावा किया है. कई और मृतप्राय छोटी नदियों को पुनर्जीवित करने की भी एक योजना है. लेकिन जब लखनऊ में ही मुख्यमंत्री की ठीक नाक के नीचे गोमती में कुछ नहीं हो रहा तो फिर दूरदराज के इलाके में क्या होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है.