खुदरा महंगाई के घटने का सिलसिला तीन महीनों के बाद अप्रैल में आखिरकार थम गया है. केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) द्वारा सोमवार को घोषित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल में खुदरा महंगाई दर 4.58 फीसदी हो गई है. मार्च में यह 4.28 फीसदी थी. उधर वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने सोमवार को ही बताया कि अप्रैल में थोक महंगाई दर भी बढ़ गई है. अप्रैल में यह मार्च के 2.47 फीसदी की तुलना में बढ़कर 3.18 फीसदी तक पहुंच गई है.

पिछले महीने खाद्य वस्तुओं की खुदरा महंगाई दर (सीएफपीआई) में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई है. मार्च 2018 के 2.81 फीसदी की तुलना में पिछले महीने यह घटकर महज 2.80 फीसदी रह गई. इसके बावजूद खुदरा महंगाई बढ़ी है तो इसका मुख्य कारण सेवाओं का महंगा होना है. महंगा होने वाले इन घटकों में स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन और संचार के साधन, मनोरंजन, आवासीय सुविधा और घरेलू सामान और सेवाएं प्रमुख हैं. इसके अलावा पिछले साल अप्रैल में खुदरा महंगाई दर तीन फीसदी से भी कम थी जिससे ताजा आंकड़ों पर पड़ने वाला ‘आधार प्रभाव’ अब प्रतिकूल हो गया है. पिछले वित्त वर्ष की पहली छमाही में औसत महंगाई दर काफी कम थी. जानकारों के अनुसार इसके चलते भी अगले पांच-छह महीने तक खुदरा महंगाई दर के ज्यादा रहने की आशंका है.

खुदरा महंगाई में इस ताजा उछाल और थोक महंगाई दर के बढ़कर चार महीने के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचने से केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक दोनों की मुसीबतें एक बार फिर बढ़ने की आशंका है. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक लोकसभा चुनाव के ठीक पहले खुदरा महंगाई दर के ज्यादा होने पर मोदी सरकार को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है. दूसरी ओर यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या तीन हफ्ते बाद जून के पहले हफ्ते में होने वाली मौद्रिक नीति समिति की बैठक में ब्याज दरें स्थिर रहती हैं या इन्हें बढ़ाया जाता है. वैसे ज्यादातर अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि अगली बैठक में इनके बढ़ने के आसार कम ही हैं. उनके अनुसार ब्याज दरों में अगस्त में बढ़ोतरी होने की संभावना ज्यादा है.

जानकारों के अनुसार गर्मी और बरसात के दिनों में खाने-पीने के सामान अमूमन महंगे हो जाते हैं. इससे अगली छमाही तक खुदरा महंगाई के बढ़ते रहने का अनुमान है. आशंका जताई जा रही है कि अगले छह महीनों के दौरान यह आरबीआई के मध्यकालिक लक्ष्य की उच्चतम सीमा (छह फीसदी) को पार भी कर सकती है. ऐसा होना निश्चित तौर पर आरबीआई और केंद्र सरकार दोनों के लिए चिंता का बड़ा विषय होगा.

खाद्य पदार्थों के महंगा होने की आशंका के अलावा और भी कई कारण हैं जिससे सितंबर-अक्टूबर तक खुदरा महंगाई दर के नरम होने की संभावना न के बराबर है. इन पर नजर डालते हैं:

कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग

कच्चे तेल की कीमत ​बीते कई महीनों से रोजाना ही नए रिकॉर्ड बना रही है. ईरान से अमेरिका की परमाणु संधि खत्म किए जाने के बाद और ओपेक देशों द्वारा इसके उत्पादन में की गई कटौती के चलते इन दिनों यह 77 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है. कई जानकार तो दावा कर रहे हैं कि आने वाले वक्त में यह 100 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा भी हो सकती है. केंद्र सरकार और आरबीआई के लिए ऐसी खबरें काफी परेशान करने वाली हैं. इसलिए भी कि इस साल की आर्थिक समीक्षा में खुद केंद्र सरकार ने कहा है कि कच्चे तेल के दाम 10 डॉलर बढ़ने से महंगाई में 0.3 फीसदी तक का इजाफा होता है. वहीं कई जानकारों के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल होनी चाहिए. इस तरह केवल कच्चे तेल की महंगी कीमत के चलते खुदरा महंगाई पर करीब एक फीसदी का बोझ पड़ने की आशंका है.

डॉलर की तुलना में रुपये का कमजोर होना

इन दिनों अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मजबूत होने से रुपया भी लगातार कमजोर हो रहा है. अभी यह एक डॉलर की तुलना में 67.33 रुपये से ज्यादा है लेकिन कई लोग इसके 70 रुपये तक पहुंचने की आशंका भी जता रहे हैं. इससे देश में आयातित होने वाले कई उत्पाद और महंगे हो सकते हैं.

फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि

मोदी सरकार ने फैसला लिया है कि मौजूदा खरीफ सीजन से फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत के 110 फीसदी के बजाय 150 फीसदी होगा. सरकार के इस फैसले से वित्त वर्ष 2018-19 की दूसरी छमाही में फसलों के दाम एक तिहाई से भी ज्यादा बढ़ने की संभावना है. बल्कि माना जा रहा है कि अभी से ही इसका असर दिखना शुरू हो गया है.

सरकारी खर्च में बढ़ोतरी का फैसला

केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 में पहले के तय लक्ष्य से 0.3 फीसदी ज्यादा यानी 3.3 फीसदी राजकोषीय घाटा (वह राशि जो सरकार के आय से ज्यादा खर्च होती है) रखने का लक्ष्य तय किया है. अगले साल लोकसभा चुनाव होने के चलते राज्यों में भी ऐसा होने की संभावना है. उधर एक जुलाई, 2017 से सातवें वेतन आयोग के तहत लंबित आवासीय और अन्य भत्ते देने के केंद्र सरकार के फैसले का अगस्त तक असर रहने की संभावना है. इन दोनों वजहों से मौजूदा वित्त वर्ष में सरकार की ओर से होने वाला खर्च पहले से ज्यादा रहने का अनुमान है और इसके चलते बाजार में मांग और महंगाई दोनों के बढ़ने की संभावना है.

निम्न आधार प्रभाव

खुदरा महंगाई के आकलन में आधार प्रभाव यानी बेस इफेक्ट की बड़ी भूमिका होती है. 2017 की पहली छमाही में खुदरा महंगाई दर केवल 2.89 फीसदी रही थी. जून महीने में तो यह घटकर अपने पांच साल के न्यूनतम स्तर - 1.54 फीसदी - तक पहुंच गई थी. हालांकि दूसरी छमाही में कच्चे तेल के महंगा होने से यह बढ़ते हुए 3.8 फीसदी तक चली गई थी. इसलिए पहले से माना जा रहा था कि मौजूदा वित्त वर्ष के पहले महीने यानी अप्रैल से ही खुदरा महंगाई के आंकड़ों में वृद्धि होगी और ऐसा हुआ भी. वैसे दूसरी छमाही में इसका प्रभाव कम होने से खुदरा महंगाई के आंकड़ों में नरमी आने की संभावना है.