सोशल मीडिया पर पालतू कुत्तों की तरह-तरह की मोहक अदाएं और करतब देख कर किसी का भी दिल खुश हो जाता है लेकिन उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के गावों में आजकल लोग कुत्तों को देखते ही आतंक में डूब जाते हैं. कई गांवों में बच्चों ने स्कूल जाना ही छोड़ दिया है. बच्चों को अब कुत्ते दोस्त नहीं वरन एक डरावने सपने जैसे लगने लगे हैं. लोग खेतों में या आम के बागों में काम करने जाते समय लाठी डंडे लेकर जाना नहीं भूलते. कई इलाकों में तो ग्रामीणों ने कहीं भी अकेले जाना बंद कर दिया है.

कुत्तों का यह आतंक इसलिए इतना भयावह होता जा रहा है कि सीतापुर के खैराबाद ब्लाक में कुत्तों के हमलों में अब तक 13 इंसानों की जान जा चुकी है. एक मई का दिन इस इलाके के लिए एक डरावनी याद बन गया है क्योंकि इस एक अकेले दिन कुत्तों के हमलों की अलग-अलग घटनाओं में तीन बच्चों की मौत हुई थी और सात बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए थे. फरवरी से मार्च के बीच छह बच्चे कुत्तों का शिकार बने.

15 मार्च को खैराबाद के नेवादा गांव में 15 वर्षीय सानिया दिन में ग्यारह बजे के आसपास आम के बाग में शौच के लिए गई थी. तभी 10-15 कुत्तों के झुंड ने उस पर हमला कर दिया. बाग में दवा छिड़क रहे लोगों ने उसकी चीखें सुनकर कुत्तों को ईंट-पत्थर मार कर भगा दिया, मगर फिर भी सानिया को नहीं बचाया जा सका. खजुरिया गांव का साढ़े चार साल का सिद्धार्थ थोड़ा भाग्यशाली था. उसी दिन हुए कुत्तों के हमले में उसकी जान इसलिए मुश्किल से बच पाई क्योंकि गंभीर हालत में उसे तत्काल लखनऊ पहुंचा दिया गया था. लेकिन वह अब भी गहरे सदमे की हालत में है.

एक मई की घटना के मीडिया की सुर्खियों में आने के बाद कुत्तों के आतंक से परेशान ग्रामीणों की आवाज आला अफसरों तक पहुंची. इसके बाद कई महीनों से प्रशासन से कुत्तों का आतंक खत्म करने की ग्रामीणों की प्रार्थनाओं पर चर्चाएं शुरू हुईं. जिला प्रशासन के शुरूआती प्रयासों के बीच जब पांच मई को तालगांव इलाके में एक और बालक कुत्तों का शिकार बन गया तो उसी दिन सीतापुर जिले की प्रभारी मंत्री रीता बहुगुणा जोशी ने खैराबाद जाकर अफसरों को तलब किया. इसके बाद कुत्तों के आतंक को आपात स्थिति घोषित किया गया और बरेली, मथुरा और लखनऊ से विशेषज्ञों की टीमें बुलाकर आवारा कुत्तों की धरपकड़ शुरू हुई. पुलिस और वन विभाग की टीमें भी सक्रिय की गईं. इस दौरान ड्रोन और नाइट विजन कैमरे भी इस्तेमाल किये गये और इस समस्या को अनदेखा करने के लिए जिले के कई अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस देकर उनके खिलाफ न्यायिक कार्रवाई भी शुरू कर दी गई.

स्थिति की गंभीरता को महसूस करते हुए छह मई को मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने भी सीतापुर के जिलाधिकारी को कुत्तों के आतंक पर तत्काल रोक लगाने के निर्देश दिए. मुख्यमंत्री ने प्रभावित क्षेत्र के थानों, वन विभाग के कर्मियों, पशु चिकित्सा विभाग, नगर पंचायत और ग्राम प्रधानों के सहयोग से खूंखार कुत्तों पर काबू पाने के लिए उपाय करने के भी निर्देश दिए. इतने पर भी कुत्तों के आतंक में कभी नहीं आई और बच्चों पर उनके हमले कम नहीं हुए. जबकि इस बीच इलाके में दर्जनों कुत्ते मार डाले गए और 40 से ज्यादा पकड़े भी गए.

10 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने भी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार को फटकार लगाई और कुत्तों के आतंक को खत्म करने के लिए तत्काल कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए. अदालत ने घायलों और मारे गए बच्चों के परिजनों के लिए मुआवजे के बारे में भी पूछा और चार जुलाई को होने वाली अगली पेशी के दौरान इस पर पूरी रिपोर्ट भी तलब की है. अदालत की इस सख्ती के बाद राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं खैराबाद पहुंचे. वे घायलों से मिले, गुरूपुलिया नाम के उस गांव में भी गए, जहां 21 जनवरी को नौ वर्षीय रहीम और दो मई को 11 वर्षीय खालिद को कुत्तों ने मार डाला था. यहां मुख्यमंत्री ने घायलों के निःशुल्क इलाज, मृत और घायल बच्चों के लिए क्रमशः दो लाख और 25 हजार के मुआवजे के साथ कई गावों में खुले में शौच से मुक्ति के उपाय करने के आदेश भी दिए. हालांकि इसके बाद भी वहां उन्हें लोगों के इस सवाल का सामना करना पड़ा कि आज तक बीजेपी का कोई स्थानीय नेता पीड़ित लोगों के दुख बांटने उनके पास क्यों नहीं पहुंचा!

सीतापुर में फैले कुत्तों के इस आतंक ने लोगों को 2001-2002 में पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश में फैले भेड़ियों के आतंक की याद दिला दी है. तब भेड़ियों ने 36 से ज्यादा बच्चों को अपना शिकार बनाया था और उस आतंक के दौरान फैली ‘मुंहनोचवा’, ‘किडनी गैंग’, ’मानुष’ जैसी तरह तरह की अफवाहों के कारण अलग-अलग इलाकों में 50 से ज्यादा अजनबियों, साधुओं, पागल व भिखारियों आदि को भीड़ की हिंसा का शिकार होना पड़ा था. सीतापुर के मामले में भी इस तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं कि यह काम भेड़ियों का भी हो सकता है. लेकिन वन्य जीव विशेषज्ञ इस अटकल को गलत ठहराते हैं.

सीतापुर के डीएफओ डा. अनिरूद्ध पांडे के अनुसार बच्चों पर जितने भी हमले हुए हैं वे सुबह या दोपहर में हुए हैं, जबकि भेड़िये या लकड़बग्घे सामान्यतः रात में ही शिकार पर निकलते हैं. अनेक स्थानों पर बच्चों को बचाने वालों और घायल बच्चों ने भी हमलावर जानवरों के कुत्ता होने की ही पुष्टि की है. पुलिस के अधिकारी भी यही मान रहे हैं.

लेकिन कुत्तों से प्यार करने वाले लोग अभी भी इस बात को मानने को तैयार नहीं. डाक्टर्स पेट्स क्रेश के निदेशक और एनिमल बोर्ड ऑफ इंडिया के मास्टर ट्रेनर डॉक्टर विवेक शर्मा सीतापुर में घटनास्थलों की पड़ताल करने के बाद कहते हैं कि ‘बच्चों पर हमलों करने का जो तरीका था वो स्ट्रीट डॉग्स का नहीं हो सकता.’ अब इस बात की भी चर्चा शुरू हो गई है कि क्या खैराबाद के हिंसक कुत्ते जंगली भेड़ियों या सियारों और आवारा कुत्तों की क्रॉस ब्रीड वाले हैं? इसके पक्ष में तर्क दिए जा रहे हैं कि समूह के तौर पर इस तरह अतिहिंसक हो जाना कुत्तों का स्वाभाविक गुण नहीं होता है. इस बारे में सही जानकारी पता करने के लिए बरेली के इंडियन वेट्रिनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी आईवीआरआई के वैज्ञानिकों ने खैराबाद में पकड़े गए कुत्तों के डीएनए सैम्पल लिए हैं और हमलावर कुत्तों में से किसी के पकड़े जाने पर उसका भी सैम्पल लेने की तैयारी की जा रही है ताकि उनकी प्रजाति के बारे में ठीक जानकारी पाई जा सके.

कुत्तों की इस हिंसक प्रवृत्ति का एक कारण स्लॉटर हाऊसों के बंद होने को भी माना जा रहा है. कहा जा रहा है कि ऐसा हो जाने की वजह से आवारा कुत्तों के लिए भोजन की उपलब्धता कम हो गई है और वे हमलावर हो गए हैं. हालांकि यह भी एक तथ्य है कि स्लॉटर हाउस लगभग एक वर्ष पूर्व बंद हो चुके हैं और कुत्तों का आतंक छह महीने से ज्यादा पुराना नहीं है.

लेकिन आवारा कुत्तों का हिंसक होना उत्तर प्रदेश में सिर्फ सीतापुर जिले तक ही सीमित नहीं है. लखनऊ की बक्शी का तालाब तहसील में 10-12 कुत्तों का झुंड पिछले एक महीने से लगातार पालतू पशुओं का शिकार कर रहा है. ग्रामवासियों ने प्रशासन को पत्र लिख कर इस आतंक को खत्म करने की मांग की है.

शहरों में आवारा कुत्तों की तादाद लगातार बढ़ने की एक वजह यह भी पशु क्रूरता निवारण कानूनों के चलते इन पर नियंत्रण करने की योजनाएं या तो बंद हो गई हैं या ठप पड़ी हैं. सिर्फ लखनऊ नगर निगम की सीमा में ही आवारा कुत्तों की संख्या 70 हजार से ज्यादा हो चुकी है. ऐसे में लखनऊ में भी कुत्तों की हिंसा के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं. हालांकि ऐसे मामले अब तक कुत्तों के झुंड द्वारा काटे जाने तक ही सीमित हैं, लेकिन यह समस्या लगातार बड़ी होती जा रही है. सीतापुर की घटनाओं के बाद राज्य सरकार ने आवारा कुत्तों का बंध्याकरण करने की योजना को फिर से शुरू करने का फैसला किया है. हालांकि इसके लिए पैसे का इंतजाम अभी नहीं हुआ है. माना जाता है कि एक कुत्ते की नसबंदी पर एक हजार रूपए से अधिक का खर्च होता है इसलिए सरकार को इसके लिए बड़े बजट का भी इंतजाम करना होगा.

योगी सरकार उत्तर प्रदेश के लोगों के हित में चाहे जो भी कर रही हो, मगर पहले गाय और अब आवारा कुत्ते उसके लिए नई समस्याएं पैदा करते जा रहे हैं. राज्य की पुलिस पहले ही कानून-व्यवस्था की खराब स्थिति से जूझ रही थी और अब आवारा कुत्तों की रोकथाम की भी नई जिम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई है. इसके अलावा सीतापुर में जो हो रहा है उसका खामियाजा कहीं अन्य जगहों के बेजुवान मित्र पशुओं को न भुगतना पड़े यह भी एक बड़ा सवाल है.