पिछले हफ्ते नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 से संबंधित संयुक्त संसदीय समिति ने उत्तर-पूर्वी राज्यों का दौरा किया था. तब इन सभी राज्यों में कई जगह इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन यहां भी सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन असम में हुए और इसके बाद से यह राज्य कई स्तरों पर बंटा हुआ दिख रहा है.

नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 में प्रावधान है कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले अल्पसंख्यक समुदाय – हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई – के लोगों को अवैध नागरिक नहीं माना जाएगा. भारत का वर्तमान नागरिकता कानून भारतीय नागरिकता चाहने वाले व्यक्ति के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता या फिर उसे कोई रियायत नहीं देता. इस कानून की यह वो बुनियादी खासियत है जिसमें नए विधेयक के जरिए बदलाव किया जाना प्रस्तावित है. असम में भले ही इस विधेयक के खिलाफ सबसे ज्यादा आक्रोश दिख रहा हो, लेकिन इस बदलाव के नतीजे सिर्फ इस राज्य तक ही सीमित नहीं रहने वाले. इसका असर पड़ोसी देशों तक भी जाएगा.

इस विधेयक से असम की आबादी में विभाजनकारी पुराने मतभेद भी दोबारा उभरने की आशंका पैदा हो गई है. यह तय है कि असम में नागरिकता के दावे को लेकर पहले से चल रही बहस को बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिमों को नागरिकता देने का प्रस्ताव और तीखा ही करेगा.

यहां 1970 के दशक से असम आंदोलन शुरू हुआ है और इसका मकसद रहा है राज्य से बाहरी लोगों को निकालना. इस आंदोलन के तहत नागरिकता की बहस एक धर्मनिरपेक्ष स्वरूप में आगे बढ़ी. यह बहस मूलनिवासी बनाम बाहरी या असमिया बनाम अन्य के आसपास घूमती रही है. लेकिन हाल के सालों में हिंदूवादी संगठनों के उभार के बाद इस बहस पर एक धार्मिक रंग चढ़ गया, जिसमें बाहरी की पहचान बांग्लादेश मूल के मुसलमानों तक सीमित हो गई.

नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 से जुड़ी एक विडंबना यह भी है कि इसकी वजह से राज्य में ब्रह्मपुत्र और बराक घाटी के बीच रही पुरानी खाई फिर गहराती दिख रही है. और अब यह विभाजन क्षेत्रीय ही नहीं, भाषाई भी हो चला है. बराक घाटी के हिंदुओं में एक बड़ी आबादी बांग्लादेश से आए विस्थापितों की है और इन बांग्लाभाषियों ने इस विधेयक का समर्थन किया है. जबकि ब्रह्मपुत्र घाटी के लोगों (मूल असमिया) को लगता है कि यह विधेयक क्षेत्र के जातीय अनुपात को बदलने का जरिया है और इस आधार पर ये इसके विरोध में हैं.

ये हालात 1980 के दशक की याद दिला रहे हैं जब राज्य की राजनीति में नागरिकता के मुद्दे पर भारी ध्रुवीकरण देखा गया था और इसके चलते सिर्फ ‘बाहरियों’ के ही नहीं असम के लोग एक दूसरे के खिलाफ भी हो गए थे. फिर यहां हिंसा का जो दौर शुरू हुआ उसका नतीजा राज्य के विकास पर भी पड़ा और सालों तक असम सामाजिक-आर्थिक पैमानों पर पिछड़ा ही बना रहा. उत्तर-पूर्व का यह राज्य अब दोबारा उस हिंसक चक्र में फंसने का जोखिम नहीं उठा सकता.

भारत में नागरिकता कानून के प्रावधान इस बुनियाद से निकले हैं कि यह एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र है. भारत ने संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्षता को अपनाकर दो देश की अवधारणा – हिंदू भारत और मुसलमान पाकिस्तान – को भी खारिज किया है. वहीं बांग्लादेश के जन्म ने भी इस विचार को धराशायी कर दिया था कि धर्म किसी देश की कौम को गढ़ सकता है. लेकिन नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 में भारत को सभी हिंदुओं की मातृभूमि माना गया है, जो हमारे गणतंत्र की संवैधानिक बुनियाद के खिलाफ है. उम्मीद की जाए कि संयुक्त संसदीय समिति इस तरफ ध्यान देगी और विधेयक के संबंधित प्रस्ताव को रद्द करेगी. (स्रोत)