चार साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब अपना पहला मंत्रिमंडल गठन किया था तो सबसे ज्यादा चर्चा स्मृति ईरानी की थी. अनुभव और उम्र के हिसाब से काफी जूनियर स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास जैसा दमदार मंत्रालय मिला था. इससे अंदाजा मिलता था कि मोदी सरकार में उनकी अहमियत क्या है.

लेकिन चार साल से भी कम वक्त में उन्हीं स्मृति ईरानी का पद और कद लगातार घटा है. पहले उनसे मानव संसाधन मंत्रालय वापस लेकर उन्हें कपड़ा मंत्रालय दिया गया. बाद में उन्हें इसके साथ सूचना और प्रसारण मंत्रालय की कमान दी गई और सोमवार को उनसे यह मंत्रालय वापस ले लिया गया.

आखिर स्मृति ईरानी से इतना महत्वपूर्ण मंत्रालय वापस क्यों ले लिया गया? जो खबरें भाजपा मुख्यालय से लेकर शास्त्री भवन और प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों से मिलती हैं उन्हें जानने-समझने के बाद इसकी पांच वजहें समझ में आती हैं.

घटता भरोसा

सुनी-सुनाई है कि प्रधानमंत्री मोदी का अब स्मृति ईरानी पर भरोसा बहुत कम बचा है. इसके कई कारण हैं. पिछले चार साल में ऐसे कई मौके आए जब प्रधानमंत्री कार्यालय को महसूस हुआ कि स्मृति ईरानी ने पूरी बात साफ-साफ नहीं बताई. चाहे उनके मानव संसाधन मंत्रालय संभालने के वक्त हुआ डिग्री विवाद हो या फिर सूचना प्रसारण मंत्री रहते हुए उनकी मीडिया पर नकेल कसने की कोशिश से जुड़ा विवाद.

प्रधानमंत्री कार्यालय की खबर रखने वाले एक सूत्र का कहना है, ‘मानव संसाधन मंत्री बनने से पहले स्मृति ने अपनी डिग्री के बारे में कभी खुलकर नहीं बताया. जब आरोप लगने लगे तब भी उन्होंने साफ बात नहीं बताई. सूचना और प्रसारण मंत्रालय चलाते वक्त भी जब मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिश हुई तब भी प्रधानमंत्री कार्यालय को पूरी बात नहीं बताई गई. बात यहां तक पहुंच गई कि प्रधानमंत्री कार्यालय से पत्रकारों को बताया गया कि ये फैसला प्रधानमंत्री का नहीं सूचना-प्रसारण मंत्री का था और प्रधानमंत्री के कहने पर इसे रोका गया’.

अमित शाह से दूरी

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की टीम में भी स्मृति ईरानी की जगह नहीं है. गुजरात चुनाव के वक्त जब गुजरात से राज्यसभा सांसद होने के बावजूद स्मृति ईरानी को ज्यादा महत्व नहीं मिला तब से ही खबरें उड़ रही थीं कि अमित शाह और स्मृति ईरानी की अनबन चल रही है. सुनी-सुनाई है कि गुजरात चुनाव के बाद स्मृति ने पार्टी से अपने रिश्ते सुधारने की पूरी कोशिश की. लेकिन उनको सफलता नहीं मिली.

भाजपा मुख्यालय में तैनात एक पदाधिकारी बताते हैं, ‘स्मृति ईरानी आज तक भाजपा के काम करने के तरीके समझ नहीं पाई हैं. अगर किसी महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता में उन्हें मुख्य वक्ता के तौर पर आमंत्रित किया जाता है तब भी वे चाहती हैं कि ये न्योता सीधे भाजपा अध्यक्ष की तरफ से आए. अगर पार्टी का मीडिया इंचार्ज उन्हें प्रेस कांफ्रेंस करने के लिए कहे तो वे समय नहीं निकाल पातीं. जबकि दूसरे कैबिनेट मंत्री ऐसा नहीं करते’. जानकारों के मुताबिक स्मृति ईरानी आज तक नहीं समझ पाईं कि अमित शाह की टीम किस अंदाज़ में काम करती है, इसलिए वे मुश्किल में फंस गई हैं.

संघ से भी दूर हुईं

2014 में मंत्रिमंडल गठन के वक्त स्मृति ईरानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बेहद करीब मानी जाती थी. संघ के कई नेता उन्हें आपसी बातचीत में बेहद प्रतिभावान मानते थे. जिस तरह स्मृति ने प्रचार के लिए मिले बहुत कम वक्त में भी अमेठी की सीट पर राहुल गांधी को कड़ी टक्कर दी थी उससे संघ बेहद प्रभावित था. लेकिन 2018 आते-आते संघ में भी स्मृति की पैरवी करने वाला कोई बड़ा पदाधिकारी नहीं बचा. संघ के जो लोग 2014 में स्मृति की तारीफ करते थे अब वे बात करने से बचते हैं.

संघ के दिल्ली स्थित झंडेवालान कार्यालय पर करीबी नजर रखने वाले एक पत्रकार कहते हैं, ‘स्मृति ने पिछले चार साल में एक-एक कर सबको नाराज़ किया. इस वक्त भाजपा और संघ में अलग-अलग कैंप हैं. स्मृति इकलौती मंत्री हैं जो किसी भी कैंप में फिट नहीं हुईं. हालांकि ऐसा नहीं है कि उन्होंने कोशिश नहीं की, कोशिश करने के बावजूद वो किसी ना किसी कारणवश हर कैंप से दूर हो गई. आज की स्थिति ये है कि झंडेवालान हो या नागपुर कार्यालय, स्मृति ईरानी की संघ में किसी बड़े नेता ने सीधी बात नहीं हो पाती’.

राय-मशविरे में कम यकीन

कुछ महीने पहले तक स्मृति ईरानी के प्रशंसक रहे एक भाजपा नेता बताते हैं, ‘स्मृति ईरानी की सबसे बड़ी खासियत है कि वो जबरदस्त मेहनत करती हैं. अंग्रेजी, हिंदी दोनों ही भाषाओं में उनकी बढ़िया पकड़ है. एक-एक फाइल वो खुद पढ़ती हैं और सभी अफसरों पर कड़ी नजर रखती हैं. उन्हें अपने मंत्रालय की एक एक खबर रहती है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘लेकिन स्मृति ईरानी की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वो किसी पर भरोसा नहीं करतीं. इसलिए सलाह मशविरे के बजाय वे स्वविवेक से ही बड़े फैसले लेती हैं. अगर कोई अफसर उनकी बात न माने या एतराज जताए तो उसकी छुट्टी तय है. ये मूलत: स्वभाव और व्यवहार का मसला है जिसमें स्मृति ईरानी पिछड़ रही हैं’.

जब तक स्मृति सूचना मंत्री रहीं ये मंत्रालय भी विवादों में घिरा रहा. आखिर में जब फिल्मों के राष्ट्रीय पुरस्कार के बंटवारे के दिन भी समारोह बहिष्कार की खबरें आने लगीं तो राष्ट्रपति भवन तक ने नाराजगी जाहिर कर दी. राष्ट्रपति भवन की तरफ से सरकार को बताया गया कि बेवजह राष्ट्रपति का नाम विवाद में लाना अच्छी परंपरा नहीं है. भाजपा के एक सूत्र का कहना है, ‘प्रधानमंत्री कार्यालय ने जब अपने स्तर पर तहकीकात की तो राष्ट्रपति भवन की दलीलों और तथ्यों में दम निकला. उसी दिन तय हो गया था कि स्मृति ईरानी की एक और मंत्रालय से विदाई तय है.’

पांचवीं वजह

स्मृति ईरानी को सूचना प्रसारण मंत्री बनाने के पीछे मोदी सरकार की मंशा एकदम साफ थी. जानकारों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी साल में एक ऐसा सूचना मंत्री चाहते हैं जो टेलीविजन को समझता हो. जिसके अखबार और टेलीविजन चैनलों के संपादकों और मालिकों से अच्छे संबंध हों. सूचना प्रसारण मंत्री बनने से पहले स्मृति ईरानी इस कसौटी पर खरी उतरती थीं. लेकिन मंत्री बनने के बाद स्मृति ने कुछ ऐसा किया जिससे अखबार और टेलीविजन के पत्रकार नाराज होते चले गए.

न्यूज़ चैनल्स को सरकार ने दूरदर्शन के डीटीएच के जरिए गांवों में चैनल दिखाने की इजाजत दी है. सरकार को इसके बदले करोड़ों रुपए भी मिलते हैं. लेकिन स्मृति ने न्यूज़ चैनल्स को डीडी के प्लेटफॉर्म से हटाने का फैसला कर लिया और इसके आदेश भी जारी कर दिए. मामला अदालत में पहुंच गया और एक ही झटके में न्यूज़ चैनल्स और सरकार आमने-सामने आ गए. सुनी-सुनाई है कि प्रधानमंत्री इससे नाराज थे. स्मृति के जाने के बाद अब फिर से हालात सामान्य करने की कोशिश होगी.

भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘कभी कभी ऐसा भी होता है कि एक हाईप्रोफाइल मंत्रालय को लो प्रोफाइल नेता अच्छा चला लेता है. स्मृति ईरानी को अगर सीखना है तो निर्मला सीतारमण से सीखें, 2014 में निर्मला राज्य मंत्री थीं और अब वे देश की रक्षा मंत्री हैं’.