कांग्रेस के सारे अनुमानों के उलट भाजपा कर्नाटक की सबसे बड़ी पार्टी बन गई. लेकिन पूर्वानुमान उसके भी ध्वस्त हुए हैं. उसके नेता कर्नाटक की 130 सीटें जीतने की बात कर रहे थे लेकिन आखिरी जानकारी मिलने तक उसे केवल 104 सीटें ही मिल पाईं. यानी कि सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत उसके पास नहीं है. उधर कांग्रेस भी राज्य का पिछले 35 साल का इतिहास बदल नहीं पाई. कर्नाटक में 1978 का चुनाव आख़िरी था जब कांग्रेस ने ही अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल कर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी. हालांकि जैसी स्थितियां बन गई हैं उसमें 78 सीटें मिलने के बाद अब भी वह कर्नाटक की सरकार का हिस्सा बनी रह सकती है. कांग्रेस ने अपनी सरकार न बन पाने की स्थिति देखते ही जेडीएस के नेतृत्व वाली सरकार को बिना शर्त समर्थन देने का प्रस्ताव रख दिया जिसे उसने स्वीकार भी कर लिया है.

अब जब कांग्रेस और जेडीएस की मिली-जुली सरकार बनना लगभग तय है तो यह एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में जेडीएस की राज्य में दूसरी सरकार होगी और जेडीएस की भागीदारी वाली तीसरी. इससे पहले साल 2004 के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद कांग्रेस ने धरम सिंह के नेतृत्व में जेडीएस के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाई थी. लेकिन जल्द ही जेडीएस सरकार से बाहर हो गई.

उस वक़्त भाजपा ने मौके का फ़ायदा उठाया. उसने एचडी देवेगौड़ा की पार्टी को समर्थन देकर बारी-बारी से सरकार चलाने का फॉर्मूला तैयार किया. इसके मुताबिक पहले देवेगौड़ा के पुत्र एचडी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने. यह साल 2006 की बात थी. जब 2007 में भाजपा की ओर से बीएस येद्दियुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने की बारी आए तो कुमारस्वामी पीछे हट गए. नतीज़ा? वह जो किसी ने इससे पहले तक सोचा भी नहीं था. भाजपा ने पहली बार 2008 के चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ दक्षिण के किसी राज्य में सरकार बनाई. हालांकि इस बार ऐसा नहीं होने जा रहा है लेकिन फिर भी यह एक हकीकत है कि भाजपा ज्यादातर आकलनों को धता बताकर राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनने में सफल रही हैं. ऐसे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर वे कौन से कारण रहे जिनके दम पर भाजपा ने सरकार न बना पाने के बाद भी इतनी बड़ी क़ामयाबी हासिल की?

इसके ज़वाब में तीन प्रमुख कारण नज़र आते हैं. पहला- भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति, दूसरा - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और तीसरा- निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के कुछ जोख़िम भरे फ़ैसले. एक-एक कर इन कारणों की यथासंभव विस्तार से पड़ताल करते हैं.

अमित शाह की रणनीति

बहुत पुरानी नहीं पिछले साल सितंबर-अक्टूबर की बात है. उस वक़्त अमित शाह तीन दिन के कर्नाटक दौरे पर गए थे. उस वक़्त पार्टी की राज्य इकाई अपने ही नेताओं के अंदरूनी झगड़ों में उलझी हुई थी. उसी वक़्त अमित शाह यह ताड़ गए थे कि पूरी तरह स्थानीय नेताओं के भरोसे कर्नाटक की लड़ाई नहीं जीती जा सकती. उस समय उन्होंने कोर कमेटी की बैठक में बड़े नेताओं को साफ़ हिदायत भी दी थी कि आज की तारीख़ में आप 80 सीटें भी नहीं जीत पाएंगे. साथ में यह भी कि नतीज़े दीजिए या रास्ता छोड़िए. लेकिन बात जब ज़्यादा बनी नहीं तो चुनाव का समय नज़दीक आते-आते अमित शाह ने कर्नाटक की पूरी कमान अपने हाथ में ले ली.

इसके बाद उन्होंने वह सब किया जिसके लिए वे जाने जाते हैं. येद्दियुरप्पा को उन्होंने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया. राज्य में लिंगायत समुदाय भाजपा का परंपरागत मतदाता है. येद्दियुरप्पा इस समुदाय से आने वाले भाजपा के इक़लौते लोकप्रिय चेहरा हैं. लिहाज़ा उन्हें 75 साल (इससे ज़्यादा उम्र के नेता राज्य-केंद्र में मंत्री आदि पदों पर नहीं रहेंगे) के अघोषित नियम से छूट भी दी गई. साथ में जोर देकर लोगों को बताया गया कि 75 साल से ज़्यादा उम्र का होने के बाद भी येद्दियुरप्पा ही पांच साल तक सरकार चलाएंगे. लेकिन इस सबके बावज़ूद शाह ने कभी भी येद्दियुरप्पा की लगाम अपने हाथ से छूटने नहीं दी.

मिसाल के तौर पर येद्दियुरप्पा अपने पुत्र बीवाई विजयेंद्र को वरुणा सीट से चुनाव लड़ाना चाहते थे. बल्कि विजयेंद्र ने नामांकन दाख़िल करने की तैयारी भी शुरू कर दी थी. लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया और दिलचस्प बात यह रही कि इसकी घोषणा भी येद्दियुरप्पा से ही कराई गई. इसी तरह येद्दियुरप्पा अपनी ख़ास सांसद शोभा कारंदलाजे के लिए यशवंतपुर से टिकट चाहते थे लेकिन पार्टी ने उन्हें भी टिकट नहीं दिया. उनकी जगह लोकप्रिय कन्नड़ अभिनेता जग्गेश को टिकट दिया गया. केएस ईश्वरप्पा कर्नाटक भाजपा में येद्दियुरप्पा के प्रतिद्वंद्वी हैं. इसीलिए येद्दियुरप्पा चाहते थे कि ईश्वरप्पा को शिवमोगा से टिकट न दिया जाए क्योंकि नज़दीकी शिकारीपुरा सीट से उन्हें ख़ुद चुनाव लड़ना था. लेकिन यहां भी पार्टी ने येद्दियुरप्पा की नहीं सुनी. ईश्वरप्पा को शिवमोगा से ही चुनाव लड़ाया गया.

बेल्लारी जी जनार्दन रेड्‌डी लगभग 16,500 करोड़ रुपए के खनन घोटाले के आराेपित हैं. शाह ने इसके बाद भी रेड्डी परिवार के रसूख का पूरा फ़ायदा उठाया. उन्होंने रेड्‌डी परिवार के आठ सदस्यों को टिकट दिया. हालंकि उन्होंने पूरे चुनाव के दौरान जी जनार्दन रेड्‌डी से दूरी बनाकर रखी. उन्होंने न उनके साथ कहीं मंच साझा किया और न ही सीधे तौर पर उन्हें अपने परिवार के सदस्यों का प्रचार ही करने दिया. यानी पार्टी का टिकट देते वक़्त यह नहीं देखा गया कि नेता दाग़दार हैं या दूसरी पार्टियों से आयातित. बस एक ही मापदंड रखा गया, ‘जीत की संभावना.’

कांग्रेस को हराने के लिए सीट-दर-सीट रणनीति बनाई गई. जहां ज़रूरत पड़ी वहां जेडीएस से गोपनीय समझौता भी किया गया. इसके तहत जहां जेडीएस जीत सकती थी वहां भाजपा ने कमजोर उम्मीदवार उतारे. वहीं जिन जगहों पर भाजपा को जेडीएस की मदद की ज़रूरत थी वहां पर कमारस्वामी की पार्टी ने उसकी मदद की. उदाहरण के लिए चामुंडेश्वरी सीट जहां मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को हराने के लिए भाजपा-और जेडीएस ने हाथ मिलाया था. यानी शाह ने वह सब किया जो वे पार्टी को जिताने के लिए अन्य राज्यों में भी करते रहे हैं.

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता

अमित शाह की रणनीति का एक बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता काे भुनाने का भी रहता है. कर्नाटक में भी उन्होंने यही किया. शुरू में प्रधानमंत्री वहां सिर्फ़ 12-15 रैलियां ही करने वाले थे. लेकिन कई सीटों पर मुश्किल मुकाबले को देखते हुए यह संख्या बढ़ाकर 21 कर दी गई. मोदी ने भी हमेशा की तरह शाह की रणनीति को असफल नहीं होने दिया. रैलियां बढ़ाने की मांग की गई तो वे बिना झिझक इसके लिए राजी हो गए. जबकि 222 सीटों वाले कर्नाटक जैसे अपेक्षाकृत छोटे राज्य में 21 रैलियां करना उनके पद और प्रतिष्ठा के मुताबिक नहीं था. उन्होंने 403 सीटों वाले उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भी सिर्फ 24 रैलियां ही की थीं. लेकिन उन्होंने यह सब नहीं सोचा. बल्कि प्रचार के आख़िरी चरण तक ख़ुद को इसमें झोंके रखा.

प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने हर रैली में भ्रष्टाचार का मसला जोर-शोर से उठाया. जहां भी जाते ‘सिद्धारमैया को सीधा रुपैया’ बताने से नहीं चूकते. केंद्र सरकार की ओर से चलाई जाने वाली कल्याणकारी योजनाओं भी उन्होंने हर जगह खूब गिनाईं. और ‘नामदार-कामदार’ जैसे लोकप्रिय जुमले भी उछाले. जरूरत पड़ने पर उन्होंने दलित कार्ड खेला और हिंदू कार्ड भी. कहीं जेडीएस प्रमुख एचडी देवेगौड़ा की तारीफ़ की और उनसे अपनी भी करा ली. लेकिन जहां दूसरा मौका आया तो यह भी कह दिया कि लोग अपना वोट ख़राब न करें. जेडीएस सरकार नहीं बना पाएगी. कांग्रेस का 40 साल का साथ छोड़कर भाजपा में आए पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के चेहरे को भी उन्होंने जहां ज़रूरी लगा, इस्तेमाल किया. शायद इसीलिए एचडी देवेगौड़ा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक स्मार्ट राजनेता कह दिया.

सिद्धारमैया के जोख़िम भरे फ़ैसले

शाह और माेदी की रणनीति को कुछ मदद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के जोखिम भरे फ़ैसलों से भी मिली. फिर चाहे वह टीपू सुल्तान की जयंती मनाने का फ़ैसला हो या लिंगायतों को अलग धर्म के तौर पर मान्यता देने का. वे भाजपा के हिंदुत्व की काट के लिए अहिंद फॉर्मूला लेकर आए. कन्नड़ अस्मिता का, उनकी अलग पहचान का मसला भी उन्होंने जोर-शोर से उठाया. उन्होंने राज्य का अलग झंडा भी जारी किया. बेंगलुरू की नम्मा मेट्रो से हिंदी के साइन बाेर्ड तक हटवा दिए . उनकी जगह कन्नड़ में लिखे बोर्ड लगाए गए.

ये फ़ैसले जोख़िम भरे इसलिए थे क्योंकि इनसे ‘अलगाव और तुष्टिकरण’ जैसी राजनीतिक बुराइयों का संकेत भी मिलता है. ये मसले दोधारी तलवार की तरह थे जिसे घुमाते हुए सिद्धारमैया कृषि संकट, महादायी नदी और कावेरी नदी के पानी के बंटवारे जैसे अहम और राज्य की आबादी को गहराई से छूने वाले मसलों की अपेक्षाकृत अनदेखी कर रहे थे. इन मसलों के जरिए वे संभवत: अपने लाभ से ज़्यादा भाजपा को नुक़सान पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रहे थे. लेकिन अंत में नतीज़ा उनके लिए उलटा साबित हुआ.