उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया प्रदूषण रिपोर्ट एक बड़ी चेतावनी के तौर पर आई है. विश्व के सबसे ज्यादा प्रदूषित 20 शहरों में उत्तर प्रदेश के कानपुर का पहले स्थान पर होना और दुनिया में सबसे प्रदूषित 10 शहरों में से उत्तर प्रदेश के चार शहरों का शामिल होना किसी भी रूप में सिर्फ शर्मिंदगी की वजह ही बन सकता है. हालांकि यह रिपोर्ट 2016 तक के आंकड़े के आधार पर ही बनी है लेकिन, उसके बाद भी हालात ऐसे नहीं हुए हैं कि इस रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश की नुमाइंदगी में कोई खास सकारात्मक परिवर्तन आ गया हो. और यह रिपोर्ट भी सिर्फ वायु प्रदूषण के बारे में है. इसमें जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और भूमि प्रदूषण जैसे अन्य प्रदूषणों का उल्लेख नहीं है, वरना उत्तर प्रदेश की स्थिति कहीं अधिक भयावह दिखाई देती.

उत्तर प्रदेश में बढ़ते प्रदूषण के कई कारण हैं. लेकिन सबसे बड़ा कारण यह है कि उत्तर प्रदेश में प्रदूषण से निपटने के लिए सक्षम सरकारी ढांचा ही मौजूद नहीं है. निगरानी और जागरूकता के लिए सार्थक ढांचे के अभाव में प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रयास ही नहीं हो पा रहे हैं. राजधानी लखनऊ के उदाहरण से ही इस बात को समझा जा सकता है. लखनऊ में प्रदूषण मापने के लिए कुल चार जगहों पर ही व्यवस्था है. जिला प्रशासन और प्रदूषण निगरानी से जुड़ी संस्थाएं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से बार-बार अनुरोध कर चुके हैं कि इन केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि लखनऊ में प्रदूषण की सही गणना की जा सके. लेकिन राजधानी होने के बावजूद इस दिशा में कुछ भी नहीं हो सका है.

हर मोर्चे पर बुरा हाल

लखनऊ की शान और जान की कही जाने वाली गोमती को प्रदूषण मुक्त करने की 2000 करोड़ रुपए से ज्यादा की योजनाओं के बावजूद इस नदी का प्रदूषण लगातार बढ़ ही रहा है. शहर के करीब 40 नाले अब भी पूरे शहर की गंदगी लगातार गोमती में उड़ेल रहे हैं. राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मार्च 2018 की रिपोर्ट में कहा गया है कि लखनऊ में प्रवेश करते समय गोमती नदी में पानी में घुली ऑक्सीजन छह मिलीग्राम प्रति लीटर के सुरक्षित स्तर की तुलना में 4.8 होती है. लखनऊ से आगे बढ़ते ही शहर की गंदगी के कारण यह आंकड़ा 2.6 मिलीग्राम प्रति लीटर रह जाता है. इसी तरह कोलीफार्म (एक तरह का बैक्टीरिया) की मात्रा 10 एमपीएन प्रति 100 मिली लीटर के सुरक्षित स्तर की तुलना में लखनऊ में 4900 और लखनऊ से निकलते ही एक लाख चालीस हजार एमपीएन प्रति 100 मिली लीटर हो जाती है.

शहर में ध्वनि प्रदूषण की स्थिति भी कुछ ऐसा ही बयान करती है. भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान यानी आईआईटीआर की नवंबर 2017 में एक रिपोर्ट आई थी. इसके मुताबिक लखनऊ के रिहायशी इलाकों में शहर में शोर का स्तर दिन के 55 डेसिबल के सुरक्षित स्तर की तुलना में 64 से 74.9 डेसिबल और रात के सुरक्षित स्तर 4.5 डेसिबल की तुलना में 61 से 70.5 डेसिबल तक पाया गया था. इसी तरह व्यवसायिक क्षेत्रों में शोर का स्तर दिन के 65 डेसिबल के सुरक्षित स्तर की तुलना में 71 से 76.6 डेसिबल तक पाया गया था. यानी शहर में ध्वनि प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है लेकिन इसके नियंत्रण का भी कोई ठोस उपाय अब तक शुरू नहीं हो सका है.

ध्वनि प्रदूषण के मामले में राज्य सरकार की सक्रियता का खुलासा इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के सामने भी हुआ है. धर्मस्थलों से लाउडस्पीकर हटाने के मामले में उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव, गृह अरविंद कुमार ने चार मई को व्यक्तिगत हलफनामा देकर लाउडस्पीकर हटाने में असमर्थता जताई है. उन्होंने कहा है, ‘जहां धार्मिक आयोजनों के दौरान भारी संख्या में लोग जमा हों, वहां लाउडस्पीकरों को पूरी तरह बैन करने में व्यावहारिक दिक्कतें हैं.’

सरकार के रुख के कारण ही हाईकोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण रोकने के उपायों के लिए तीन न्याय मित्रों की एक समिति बनाई थी. अदालत ने राज्य सरकार को इस समिति के सुझावों का अध्ययन करके अपना जवाब देने को कहा है जिसके बाद न्यायमित्र अपनी रिपोर्ट जारी करेंगे. 20 जुलाई को इस मामले की अगली सुनवाई होनी है.

ध्वनि प्रदूषण की जांच के लिए जो डेसिबल मीटर खरीदे जाने थे वे इसलिए नहीं खरीदे जा सके क्योंकि वित्त विभाग इसके लिए पांच करोड़ देने के लिए सहमत नहीं हो रहा. इसी तरह वायु प्रदूषण की विश्व स्वास्थ्य संगठन की जिस रिपोर्ट पर सरकार की प्रशासनिक मशीनरी यह कह कर सवाल उठा रही है कि यह रिपोर्ट 2016 की है और अब स्थितियां बदल गई हैं, उसी रिपोर्ट की पुष्टि आईआईटीआर की नवंबर 2017 की रिपोर्ट कर रही है. इसमें बताया गया है कि लखनऊ की हवा में अक्टूबर-नवंबर 2017 में भी पीएम 2.5 (महीन कण) का स्तर 169.3 से लेकर 212.3 तक रहा था. उधर, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट ने दो मई 2018 को लखनऊ में पीएम 2.5 का स्तर 103 बताया था. यानी सुरक्षित माने जाने वाले 25 से चार गुना अधिक.

बीते दिसंबर के आखिरी सप्ताह में लखनऊ में वायु प्रदूषण का स्तर 488 तक पहुंच गया था और जनवरी 2018 के पहले पखवाड़े में यह लगातार 400 से ऊपर बना रहा था. उस समय योगी सरकार ने वायु प्रदूषण को रोकने के लिए अनेक आदेश जारी किए थे, लेकिन रात गई बात गई. अब स्थिति यह है कि प्रदूषण की निगरानी करने वाले उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अधिकारिक वेबसाइट यूपीपीसीबीडाॅटकाॅम में मार्च 2016 के बाद प्रदूषण का मासिक डेटा ही डाला नहीं गया है.

जल प्रदूषण के मामले में भी हालात ठीक नहीं हैं. ‘नमामि गंगे’ के सारे तमाशे के बावजूद राज्य में गढ़मुक्तेश्वर से लेकर गाजीपुर तक जिन सात स्थानों पर गंगा जल की गुणवत्ता की जांच की जाती है उन सभी में मार्च 2018 में गंगाजल मानव स्वास्थ्य लिए असुरक्षित पाया गया. वरुणा, काली, सई, हिंडन, गोमती, यमुना, सरयू, घाघरा, राप्ती और बेतवा जैसी नदियां भी इसी तरह प्रदूषित पाई गई हैं. मगर नदियों के इस प्रदूषण को रोकने के लिए राज्य सरकार के पास अब तक न कोई ठोस योजना थी और न ही कोई कार्यक्रम.

सरकार अब गंभीर हो रही है

लेकिन लगता है कि अब योगी सरकार प्रदूषण नियंत्रण के मामले में गंभीर हो रही है. इसलिए अब राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूरे ढांचे को सुधारने और विस्तार देने की योजना बनाई है. अभी तक राज्य में लखनऊ में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के लखनऊ स्थित मुख्यालय के अलावा सिर्फ 28 जिलों में इसके कार्यालय थे. प्रदूषण की जांच के लिए न तो पर्याप्त कर्मचारी थे और न ही प्रयोगशालाएं. मगर अब राज्य के सभी 75 जिलों में प्रदूषण नियंत्रण कार्यालय खोले जाएंगे. सात प्रमुख कमिश्नरी मुख्यालयों में जोनल आफिस बनेंगे. जिलों में सहायक अभियंता स्तर के अधिकारी तैनात किए जाएंगे और जोनल आॅफिस में मुख्य अभियन्ता स्तर के अधिकारी. इन अधिकारियों पर अपने जिले में प्रदूषण नियंत्रण के सारे उपाय करने और योजनाएं लागू कराने की जिम्मेदारी होगी.

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में अब ई-वेस्ट, बायो मेडिकल वेस्ट, सॉलिड वेस्ट, प्लास्टिक वेस्ट, हैजार्डस वेस्ट, कंस्ट्रक्शन वेस्ट आदि के प्रबंधन के लिए अलग अलग विंग बनाई जाएंगी. बोर्ड में रिसर्च एंड डेवलेपमेंट शाखा के साथ आईआईटी और आईआईएम जैसी संस्थाओं के साथ मिल कर एक इंक्यूबेशन हब भी बनाया जाएगा जो प्रदूषण नियंत्रण के लिए शोध कार्य करवाएगा. बोर्ड के कायाकल्प के इस प्रस्ताव में अभी मौजूद 817 कर्मचारियों की संख्या भी 2500 से अधिक किए जाने की बात कही गई है.

माना जा रहा है कि इसके बाद प्रदूषण नियंत्रण के मोर्चे पर हालात बदल सकते हैं. राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव आशीष तिवारी कहते हैं, ‘हर जिले में बोर्ड का आॅफिस खुल जाने से बोर्ड की कार्यक्षमता बहुत सुधर जाएगी और जनपद स्तर पर बेहतर निगरानी सम्भव हो सकेगी. इससे उद्योगों के प्रदूषण को भी नियंत्रित करने में सुविधा होगी.’

लेकिन सिर्फ कर्मचारी बढ़ा देने और दफ्तर खोल देने भर से प्रदूषण की समया का निराकरण होना सम्भव नहीं है. जब तक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सिर्फ वसूली और कमाई वाला विभाग बना रहेगा, जब तक बोर्ड की कार्य संस्कृति नहीं बदलेगी, जब तक रिश्वत के बूते पर एनओसी बनते रहेंगे और जब तक पुलिस, जिला प्रशासन, परिवहन विभाग, खनन विभाग, पर्यावरण विभाग और वन विभाग आदि में प्रदूषण नियंत्रण के लिए बेहतर तालमेल नहीं होगा, तब तक उत्तर प्रदेश में बढ़ते प्रदूषण संकट की रोकथाम मुश्किल है.