कर्नाटक विधानसभा के चुनाव परिणाम आने से पहले तक अधिकांश लोग यह मानकर चल रहे थे कि भले ही कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिले लेकिन वही राज्य में सबसे बड़ी पार्टी रहने वाली है. कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बारे में कहा जा रहा था कि जिस तरह से पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू नहीं चलने दिया, वैसा ही कुछ वे भी कर्नाटक में कर सकते हैं.

लेकिन जब नतीजे आए तो भारतीय जनता पार्टी यहां पर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. नतीजों ने साफ कर दिया कि नरेंद्र मोदी का जादू भाजपा को बहुमत तक भले न पहुंचा पाया हो लेकिन उसे सबसे बड़ी पार्टी जरूरी बना दिया है. इस चुनाव में कर्नाटक की जनता ने किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया है. सीटों की संख्या के मामले में कांग्रेस दूसरे स्थान पर है तो जनता दल सेक्युलर तीसरे स्थान पर. अगर कांग्रेस और जेडीएस की सीटों को जोड़ दें तो बहुमत उनके पास है. भाजपा को सरकार बनाने से रोकने के लिए कांग्रेस ने अपने से आधी सीटों वाली जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया है. उधर भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार येदियुरप्पा भी अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं.

कर्नाटक चुनावों को राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा था. माना जा रहा था कि इन चुनावों में जो होगा उसके आधार पर देश की राजनीति के कई समीकरण बन और बिगड़ सकते हैं. अब जबकि इस चुनाव के परिणाम आ गए हैं तो ऐसे कुछ समीकरणों में आने वाले बदलावों के समझने की कोशिश की जा सकती है.

भाजपा और नरेंद्र मोदी मजबूत स्थिति में

कर्नाटक के नतीजों से यह स्पष्ट हो गया कि अभी की परिस्थिति में भाजपा पूरे देश में एक मजबूत ताकत है और किसी भी पार्टी के लिए अकेले उसका मुकाबला करना आसान नहीं है. प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में जब कांग्रेस सरकार बनाने के करीब पहुंचने से चूक गई तो कहा गया कि उसके पास कोई स्थानीय नेतृत्व नहीं था. ऐसे में यह माना जा रहा था कि सिद्धारमैया जैसे प्रभावी क्षत्रप के होते हुए कर्नाटक में उसकी स्थिति अच्छी रहेगी. लेकिन सिद्धारमैया न तो भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनने से रोक पाए और न ही अपनी कुर्सी ही बचा पाए.

इससे अगले कुछ महीनों में होने वाले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा के पक्ष में माहौल बनेगा और उसके कार्यकर्ताओं में भी उत्साह का संचार होगा. इन चुनावों में भी अच्छा प्रदर्शन होने पर भाजपा कह सकती है कि जब विधानसभा चुनावों में जनता नरेंद्र मोदी का इतना साथ दे रही है तो लोकसभा चुनाव तो सीधे नरेंद्र मोदी ही लड़ रहे हैं.

राष्ट्रीय महागठबंधन की कोशिश

कर्नाटक में चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस और जेडीएस एक साथ आने को तैयार हुए. अगर ये दोनों पार्टियां एक साथ मिलकर चुनाव लड़तीं तो दोनों पार्टियों के वोट प्रतिशत को देखते हुए कहा जा सकता है कि भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाता. इसका मतलब यह कि आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा जिस स्थिति में है, उसमें उसे रोकने के लिए अलग-अलग हितों और विचारधाराओं वाले दलों को भी साथ आना होगा. इसका एक उदाहरण बिहार का भी है जहां नीतीश कुमार और लालू यादव ने साथ मिलकर भाजपा को बुरी तरह हरा दिया था. और दूसरा उत्तर प्रदेश का जहां हाल ही में हुए उपचुनावों में सपा औऱ बसपा जैसे चिर-विरोधियों ने मिलकर भाजपा को उसके गढ़ों में ही हरा दिया था.

अगर जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी कांग्रेस के सहयोग से मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हो जाते हैं तो कर्नाटक से सबक लेकर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी महागठबंधन बनाने की कोशिश जोर पकड़ सकती है. यह कोशिश कई अंतर्विरोधों से भरी हुई है लेकिन कर्नाटक के परिणाम इनसे पार पाने में विभिन्न दलों की मदद कर सकते हैं.

कांग्रेस के व्यवहार में बदलाव की संभावना

कर्नाटक के चुनाव परिणामों का राष्ट्रीय राजनीति पर एक असर यह भी है कि पूरे देश में यह संदेश जाएगा कि राहुल गांधी और कांग्रेस अभी भाजपा और नरेंद्र मोदी का विकल्प बनने की स्थिति में नहीं हैं. लोगों को यह भी लग सकता है कि सिद्धारमैया जैसा मजबूत स्थानीय नेता होने के बावजूद अगर कर्नाटक ने इन पर यकीन नहीं किया गया तो फिर दूसरे राज्यों के लोग कांग्रेस और राहुल गांधी पर कैसे विश्वास कर पाएंगे!

ऐसे में एक परिस्थिति यह हो सकती है जहां जो दल भाजपा को रोकने की स्थिति में लगे वहां कांग्रेस खुद को थोड़ा पीछे रखकर भाजपा और नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोकने की कोशिश कर सकती है. कर्नाटक में अपने से आधे विधायकों वाले जेडीएस को मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव देकर कांग्रेस अपनी उस छवि को तोड़ने की भी कोशिश करती दिख रही है जिसके बारे में माना जाता है कि वह छोटे दलों पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश करती है. जाहिर है कि अगर कांग्रेस का यही रुख बरकरार रहता है तो उसके सहयोगी दलों के संबंध उसके साथ और सहज होंगे.

कुछ छोटे दलों में असमंजस की स्थिति

अलग-अलग राज्यों के छोटे और क्षेत्रीय दल कर्नाटक के चुनावी नतीजों पर टकटकी लगाए बैठे थे. इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा हैं तो कुछ कांग्रेस के साथ हैं. वहीं कुछ दल ऐसे भी हैं जो अभी न कांग्रेस के साथ हैं और न भाजपा के. इन सभी में कर्नाटक के नतीजों को लेकर संशय का माहौल था. लेकिन जो नतीजे आए हैं, उससे इन दलों का असमंजस और बढ़ गया है. अब उन्हें भाजपा मजबूत तो दिखती है लेकिन विपक्ष अगर एकजुट हो तो उसे हराना संभव भी लगता है. लेकिन यह एकजुटता फिलहाल तो दिख नहीं रही है. अगर भाजपा के अपने सहयोगियों के साथ संबंधों की बात करें तो वे उतने सहज नहीं हैं. उधर जेडीएस को कर्नाटक का नेतृत्व देकर कांग्रेस ने उन्हें एक सकारात्मक संदेश भी दिया है. ऐसे में इन दलों के लिए कोई निर्णय लेना अभी भी आसान नहीं हो पाया है और शायद इसके लिए उन्हें आने वाले तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों का इंतजार होगा.