यह मार्च-अप्रैल 2016 की बात है. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान के लिए राजनीतिक दल अपना पूरा ज़ोर लगा रहे थे. इस बीच 31 मार्च को राजधानी कोलकाता में एक दर्दनाक हादसा हुआ. गिरीश नगर पार्क के पास एक निर्माणाधीन पुल अचानक ढह गया. इस दुर्घटना में दो दर्जन से ज़्यादा लोग मारे गए थे और करीब 80 लोग घायल हुए थे. चुनाव के बीच इस तरह की घटना होना किसी भी सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक संकट बन जाता है.

उस चुनाव में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की भाजपा से सीधी टक्कर थी. दोनों तरफ़ से ज़बरदस्त प्रचार अभियान चलाया जा रहा था. इसी दौरान पुल गिरने का हादसा हो गया और भाजपा व उसके सबसे बड़े नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राज्य सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर हमला करने का एक और मौक़ा मिल गया. तब एक रैली में प्रधानमंत्री का कहना था कि यह हादसा एक ईश्वरीय संदेश है जिसके ज़रिये ईश्वर ने संकेत दिया है कि ममता बनर्जी पूरे बंगाल को ख़त्म कर देंगी.

उस वक़्त की मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ नरेंद्र मोदी का बयान था, ‘यह दैविक कृत्य इस मायने में है कि यह हादसा चुनाव के ऐन वक़्त पर हुआ है ताकि लोगों को यह पता चल सके कि उन पर किस तरह की सरकार शासन कर रही है. ईश्वर ने यह संदेश भेजा है कि आज यह पुल गिरा है, कल वे पूरे बंगाल को ख़त्म कर देंगी. आपके लिए ईश्वर का संदेश है कि बंगाल को बचाना है.’

यह भी एक विचित्र बात है कि पुल बना रही कंपनी आईवीआरसीएल ने भी इस घटना को दैवीय प्रकोप बताकर खुद को बचाने की कोशिश की थी. वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पूर्ववर्ती वामपंथी सरकार को घटना के लिए ज़िम्मेदार बताया था. उनका कहना था कि पुल बनाने का ठेका वामपंथी सरकार के कार्यकाल के दौरान दिया गया था.जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का कहना था कि पुल का जो भाग गिरा, वह वर्तमान सरकार के समय में बना है लिहाज़ा इसके लिए वर्तमान सरकार जिम्मेदार है.

एक दर्दनाक हादसे पर बंगाल की दो प्रमुख पार्टियों के बीच छींटाकशी को प्रधानमंत्री ने हाथों-हाथ लिया और ममता बनर्जी पर आरोप लगाया कि वे मौत की राजनीति कर रही हैं. उनका कहना था कि फ़्लाईओवर हादसे में मारे गए लोगों को कम से कम सम्मान तो देना चाहिए था, लेकिन ‘दीदी’ को मरते लोग नहीं सिर्फ़ कुर्सी दिखाई पड़ती है. इसके साथ प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा, ‘इतना बड़ा हादसा हुआ. ऐसे में अगर कोई भी वहां जाता तो वह कुछ लोगों को बचाने की कोशिश करता और बचाव अभियान में सहायता करता. लेकिन दीदी (ममता बनर्जी) ने क्या किया? उन्होंने सबसे पहले यही घोषणा की कि पुल निर्माण का ठेका उनकी सरकार ने नहीं, बल्कि वाम मोर्चे की सरकार ने दिया था.’

अब दो साल बाद कुछ ऐसे ही हालात भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी हो गए हैं. राजनीतिक आलोचक और विरोधी कह रहे हैं कि इसे इत्तिफ़ाक़ कहिए या ‘दैवीय संदेश’ कि बीते मंगलवार को जब भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक में नई सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ की राजनीति कर रही थी उसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक निर्माधीन पुल का हिस्सा गिर गया जिसमें 19 लोगों की मौत हो गई. इस पुल का निर्माण उत्तर प्रदेश सेतु निगम कर रहा था. मीडिया रिपोर्टों की मानें तो निर्माण के लिए जो सामग्री इस्तेमाल हो रही थी वह घटिया गुणवत्ता की थी.

इस हादसे को लेकर प्रधानमंत्री ने पहले ट्विटर पर दुख जताया और बाद में दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में पार्टी के लोगों को दिए अपने संबोधन में भी इस हादसे का ज़िक्र किया. इसके साथ ही उन्होंने कर्नाटक की जीत पर ख़ुशी भी जताई. इस पर लोग कई तरह के तंज़ कस रहे हैं. सोशल मीडिया के जरिए लोग पूछ रहे हैं कि अब प्रधानमंत्री इस हादसे को भ्रष्टाचार या लापरवाही का नतीजा बताएंगे या ईश्वर का संकेत. यह सवाल भी किया जा रहा है कि जो अधिकारी निर्माण के निरीक्षण के लिए जाते थे क्या उन्हें काम की लापरवाही दिखाई नहीं दी.

फिलहाल इस हादसे पर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जल्द से जल्द से जांच रिपोर्ट मांगी है. उन्होंने पीड़ितों के लिए मुआवज़े का ऐलान भी किया है. इसके साथ प्रदेश सरकार ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज करवाया है. लेकिन विपक्ष कह रहा है कि इस मामले में केवल अधिकारियों को लपेटे में लेने से बात नहीं बनेगी. वह मांग कर रहा है कि संबंधित नेताओं और मंत्रियों पर भी कार्रवाई की जानी चाहिए. समाजवादी पार्टी (सपा) नेता अनिल यादव ने कहा है कि प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी पुल गिरने से पहले घटनास्थल का पांच बार दौरा किया था. वहीं, मुख्यमंत्री योगी ने तीन बार काम का निरीक्षण किया था. सवाल करते हुए अनिल यादव का कहना है कि राज्य सरकार के इन दोनों मुखियाओं ने वहां क्या देखा, इस आधार पर इनकी भी जवाबदेही बनती है.

उधर, इन सबके बीच भाजपा कर्नाटक में सरकार बनाने के जुगाड़ में भी लगी हुई है. पार्टी राज्य में सबसे ज़्यादा सीटें (104) जीती है, लेकिन बहुमत के लिए उसे नौ और विधायकों के समर्थन की ज़रूरत पड़ेगी. इसके लिए कोशिशें भी शुरू हो चुकी हैं. कांग्रेस और जेडीएस ने आरोप लगाया है कि भाजपा ने उनके विधायकों को अपने पाले में करने के लिए 100 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया है.

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में इतने बड़े हादसे के बाद भी भाजपा का कर्नाटक में सरकार गठन के लिए किया जा रहा जोड़-जुगाड़ राजनीतिक जानकारों की समझ में आता है. आखिरकार चुनाव सरकार बनाने या बनाए रखने के लिए ही लड़ा जाता है. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने लोगों को बोलने का मौक़ा तो दे ही दिया है. वे कोलकाता पुल हादसे का ज़िक्र करते हुए कह रहे हैं कि अब प्रधानमंत्री क्या कर रहे हैं. क्या उनका ध्यान अपने संसदीय क्षेत्र में हुए इतने बड़े हादसे के बजाय कर्नाटक की सत्ता पर नहीं है?