तैत्तिरीय उपनिषद् में जब गुरु अपने शिष्य से कहता है - ‘अतिथिदेवो भव’ तो उससे पहले वह माता, पिता और आचार्य को देवों की श्रेणी में रख चुका होता है. इसी क्रम में वह अतिथि के भी देवतुल्य होने की शिक्षा देता है. उपनिषदों से पहले वेदों में भी हमारे पूर्वजों ने यह गान किया था - ‘गृहे वसतु नो अतिथिः’(अथर्ववेद), यानी हमारे घर में अतिथि निवास करे. आज से लगभग बारह सौ साल पहले रचा गया ग्रंथ ‘हितोपदेश’ कहता है - ‘पूजनीयो यथायोग्यं सर्वदेवमयोऽतिथिः’. यानी जितनी क्षमता हो, वह सब लगाकर अपने अतिथि की सेवा-सत्कार करो.

दुनिया के इस हिस्से में किसी समय इतना उदार और उदात्त चिंतन हुआ, यह सोचकर आज हम सबको बहुत अच्छा लगता है. लेकिन आज की वास्तविकता से तुलना करने पर मन उदास हो जाता है. आज शहरी मध्यवर्ग के गृहस्थों से लेकर नौकरशाहों और राजनेताओं तक के पास साधन-संपन्नता भले ही बढ़ गई हो, और अतिथियों के प्रति खर्च और दिखावे का शिष्टाचार भले ही दिखाई देता हो, लेकिन उस भावनात्मक उदारता का मानो लोप ही हो गया है.

ग्रामीण भारत के सामान्य-जनों में साधनहीनता के बावजूद उस आतिथ्य-भाव की झलक आज भी देखने को मिल जाती है. अतिथि कैसे भी हों, वे आज भी दिखावापूर्ण स्वागत-सत्कार से अधिक महत्व प्रेम-भाव को देते हैं. इसी प्रेम-भाव की बात सूरदास ने की थी जब कृष्ण के मामले में उन्होंने गाया था - ‘दुर्योधन के मेवा त्याग्यो, साग विदुर घर खाई, सबसे ऊंची प्रेम सगाई.’ और संत कबीर ने कहा था - ‘साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि.’

अतिथियों के मामले में जो बात गृहस्थों पर लागू होती है, वही बात राष्ट्रों के मामले में भी लागू होती है. लेकिन बदले दौर में आतिथ्य को जबसे कूटनीति से जोड़ दिया गया, तबसे इसमें वह बात नहीं रही. पहले अतिथियों के राजकीय सत्कार में जिस तरह की भावना रहती थी, वह अब प्रोटोकॉल की भेंट चढ़कर केवल शिष्टाचार भर की बात रह जाती है. हाल में भारत का राष्ट्रपति भवन तक अपने ही देश के कलाकारों के प्रति इसे लेकर चर्चा में रह चुका है. लेकिन यहां हमारा उद्देश्य वैश्विक स्तर पर एक देश से दूसरे देशों में लोगों की आवाजाही पर चिंतन करना है.

आप्रवासियों से लेकर शरणार्थियों तक की समस्याओं से जूझ रही आज की हमारी दुनिया का संकट वास्तव में आतिथ्य का संकट ही है. वैश्विकता के चोगे में संकीर्णता हमारे समय की खास पहचान है. आने वाली पीढ़ियां इसे हमारे समय के सबसे बड़े अंतर्विरोध के रूप में देखेंगी.

आज फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की सुपुत्री और स्वनामधन्य शख़्सियत मोनीज़ा हाशमी को लेकर जब बात भारत-पाकिस्तान की चली है, तो आतिथ्य-सत्कार के मामले में विनोबा की पूर्वी पाकिस्तान में हुई पदयात्रा उल्लेखनीय है. अगस्त 1962 में विनोबा की पदयात्रा असम में चल रही थी और उनका अगला घोषित पड़ाव पश्चिम बंगाल था. लेकिन विनोबा ने कहा कि यदि पाकिस्तान सरकार इजाजत दे, तो वे पूर्वी पाकिस्तान होते हुए ही पश्चिम बंगाल में प्रवेश करना चाहेंगे. पाकिस्तान में उस समय अयूब खान की सैनिक सरकार थी, लेकिन उसने विनोबा को उस पदयात्रा की अनुमति दे दी.

5 सितंबर, 1962 को जब विनोबा सोनारहाट बॉर्डर पर पहुंचे तो सांकेतिक रूप से एक रस्सी की गांठ खोलकर डिप्टी-कमिश्नर याक़ूब अली खान ने पाकिस्तान में उनका स्वागत किया. हृदय की गांठ खोलने वाली इस पदयात्रा को विनोबा ने प्रेमयात्रा का नाम दिया था. 16 दिन की पाकिस्तान पदयात्रा में विनोबा को 175 बीघा जमीन दान में मिली, जो वहीं हाथोंहाथ हिंदू और मुसलमान बेजमीनों में बांट दी गई. 11 सितंबर, 1962 को विनोबा के सड़सठवें जन्मदिन पर पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर ने उन्हें तार द्वारा बधाई का संदेश भेजा. विनोबा की सभाओं में टैगोर के लिखे गीत-भजन सम्मिलित स्वर में गाए गए.

पाकिस्तान में विनोबा से जब किसी ने पूछा कि उन्हें वहां कैसा लग रहा है, तो उन्होंने कहा था - ‘कुछ भी अलग नहीं दीख रहा है. वही एक ही हवा, वही एक ही जमीन. एक ही मनुष्य, एक ही हृदय — कुछ भी तो अलग नहीं दीख रहा है. भारत के छोटे बच्चे और स्त्री-पुरुषों को देखकर जैसे मेरा हृदय प्रेम-प्रीति से भर जाता था, वैसे ही यहां भी आप लोगों को देखकर मेरा हृदय प्रेम और प्रीति से एकदम भर आया है. मैं तो सोचता हूं कि संपूर्ण संसार मेरा है, और मैं इस संसार का सेवक हूं. कहीं भी जाता हूं, ‘जय जगत्’ कहता हूं. यानी संसार एक है, और सभी एक ही हैं.’

विनोबा की सभाओं में शुरू-शुरू में लोगों ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए, लेकिन जब विनोबा ‘जय जगत्’ ही बोलते रहे, तो धीरे-धीरे वहां के लोग भी ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ छोड़कर ‘जय जगत्’ ही कहने लगे.

डॉ. राममनोहर लोहिया का एक लेख है - ‘भारत-माता और धरती-माता’. हालांकि लेख किसी अन्य संदर्भ में लिखा गया था. लेकिन इसमें कही गईं बातें आज की परिस्थितियों पर भी लागू होती हैं. लोहिया लिखते हैं – ‘एक जमाना था जब दुनिया के विभिन्न देशों में सैर करने के लिए प्रमाण-पत्र और प्रवेश-पत्र की जरूरत नहीं पड़ती थी. आज राष्ट्रीयता कम हो रही है या ज्यादा? एक दूसरे से भय घट रहा है या बढ़ रहा है? साथ-साथ वह सब रीति-रिवाज, रस्म, टोने-टोटके बढ़ रहे हैं, जिससे विशाल प्रेमिका पृथ्वी का निरादर होता है. न जाने किस तर्क से इस निरादर को स्वदेश-आदर में पलट दिया जाता है.’

लोहिया ‘अतिथिदेवो भव’ की माला जपने वाले भारत को भी आईना दिखाते हुए आगे कहते हैं – ‘आशा की गई थी कि शायद आज़ाद हिन्दुस्तान नागरिकता की परिभाषा और कानून के संबंध में दुनिया को कोई नई दिशा दिखाए. लेकिन उसने भी गोरों की और यूरोप-अमेरिका की नकल की. शरीर को महत्व दिया. कहां जन्मे? कब जन्मे? अथवा कितने बरस उस भूमि पर रहे हो, जिसकी नागरिकता लेना चाहते हो? ये सब शरीर के लक्षण हैं. उनमें मन के अथवा आत्मा के कोई लक्षण नहीं. जो मनुष्य मन से किसी देश को और उसकी संस्कृति को अपना लेता है, वह वहां का नागरिक हुआ. इस सिद्धांत से बढ़कर और कौन-सा सिद्धांत हो सकता है? इसमें दिक्कतें अवश्य हैं. आज की संदेह और भय की अंतर्राष्ट्रीय हवा में उड़ने से इस सिद्धांत को कोई बली देश ही बचा सकता है.’

और आखिर में लोहिया कहते हैं – ‘मन में बहुत कूड़ा जमा हो चुका है. इसको बुहारना बड़ा कठिन प्रतीत होता है. जिनकी दृष्टि दूषित है, वे इसी लेख में हिंदुस्तानियत और मनुष्यता का अनमेल देख लेंगे, क्योंकि उनकी दृष्टि में अनमेल है. जहां हिंदुस्तानियत होनी चाहिए, वहां एक नकली-उदार, खंडित-मनुष्यता ला बिठाते हैं. और जहां मनुष्यता होनी चाहिए, वहां एक संकीर्ण, दमघोंटू हिंदुस्तानियत को आसन पर चढ़ा देते हैं. समझते हैं कि विश्व-मानव बन रहे हैं, बनते हैं खाली विश्व-यार. दुनिया भी खोते हैं और देश भी खोते हैं.’

अबसे करीब 13-14 वर्ष पहले इन पंक्तियों के लेखक ने भारत-पाकिस्तान के बीच मैत्री चाहने वाले लोगों के एक मंच ‘पाकिस्तान-इंडिया पीपुल्स फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी’ के साथ काम किया था. फरवरी 2005 में नई दिल्ली में इसका एक संयुक्त अधिवेशन हुआ था. इसमें 300 से अधिक पाकिस्तानी प्रतिनिधि-नागरिकों ने भाग लिया था. इनमें से आधे से अधिक तो युवा ही थे. पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों से आए ये प्रतिनिधि जब कार्यक्रम के सभा-स्थल ‘कॉन्स्टीट्यूशन क्लब’ पहुंचे, तो दोनों पक्षों की ओर से समवेत स्वर में लंबे समय तक एक नारा लगाया गया. नारा था - ‘जीवे जीवे हिंदुस्तान, जीवे जीवे पाकिस्तान.’

जब दोनों देशों के इन नागरिकों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ, तो दोनों ही पक्षों की कई भ्रामक धारणाएं टूटीं. वे धारणाएं जो दोनों ही देशों की सरकारें और ‘राष्ट्रवादी’ मीडिया लोगों के दिमाग में बिठाते रहते हैं. इसलिए राष्ट्रों के बीच टकरावों को समाप्त करने का सबसे अच्छा तरीका लोगों के बीच निर्बाध आपसी संपर्क और संवाद को अधिक से अधिक बढ़ाना ही है. और इसके लिए दोनों ही देशों के लोगों को अपने-अपने हुक्मरानों पर लोकतांत्रिक दबाव बनाना होगा कि वे दोनों ही मुल्कों के लोगों के बीच आपसी संपर्क को बढ़ाएं न कि कम हो जाने दें. लोगों के दिलों में शक और नफरत की जगह प्रेम की अलख जगाएं.

बात फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की चली, तो खुद फ़ैज़ के ही शब्दों में,

‘आइए हाथ उठाएं हम भी,

हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं,

हम जिन्हें सोज़-ए-मुहब्बत के सिवा,

कोई बुत, कोई ख़ुदा याद नहीं.’