लेखक-निर्देशक : हर्ष छाया

कलाकार : मनोज पाहवा, विनय पाठक, सीमा पाहवा, अलका अमीन, सना कपूर, मयूर मोरे

रेटिंग : 2.5/5

आसमान से टपकने और खजूर पर अटकने वाली कहावत बड़ी पुरानी है. जिस कहानी को कहने के लिए इस कहावत को बतौर शीर्षक इस्तेमाल किया गया है, उसे देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि इससे बेहतर शायद ही इसका कोई और इस्तेमाल हो सकता था. इतना ही नहीं, यह फिल्म अटकने के साथ-साथ उससे राइम करने वाली कई क्रियाओं को भी होते दिखाती है, जैसे (रिश्तेदारों का) टपकना, (भेजे का) सटकना, ( किसी ख्याल को) झटकना वगैरह-वगैरह. ‘खजूर पे अटके’ ये सबकुछ कैसे करती है, यह बताने वाली नहीं बल्कि देखने वाली बात है. हालांति यह दिखाते हुए फिल्म कई बार मजा बांधती है तो एकाध बार आपको उबासियां लेने पर भी मजबूर कर सकती है.

खजूर पे अटके एक पारिवारिक कॉमेडी ड्रामा है. इसमें हर वह चीज देखने को मिलती है जो एक भारतीय मध्यवर्गीय परिवार की जिंदगी का जरूरी और अलग न किया जा सकने वाला हिस्सा होती है. फिल्म में महंगे और सस्ते की खिट-खिट से शुरू हुई कहानी, जलन और दिखावे की ठक-ठक को बर्दाश्त करती हुई, पढ़ाई और शादी की चिंताओं का बोझा उठाए एक खतरनाक मोड़ से गुजरती है. खतरनाक मोड़ यानी मुश्किल वक्त, जिससे हर मिडिल क्लास फैमिली डरती है और इसीलिए हर पल इससे निपटने की तैयारी में बजट और बचत में तमाम जुगतें भिड़ाती रहती है. यह सब करते हुए फिल्म वो कॉमिक मजा देती है जिसे ‘टंग-इन-चीक’ (गंभीर हास्य) कहकर परिभाषित किया जाता है.

फिल्म की कहानी तीन भाइयों वाले एक परिवार की है. इनमें से एक भाई किन्हीं कारणों से अस्पताल पहुंच गया है और वेंटिलेटर की नलियों से लटका कभी जिंदगी की तरफ तो कभी मौत की तरफ झूल रहा है. इस मरीज का हाल जानने के बहाने फिल्म इंदौर-भोपाल जैसे शहरों से परिवार वालों यानी किरदारों को समेटकर लाती है और उन्हें मुंबई में मिला देती है. इनके आनन-फानन आ मिलने के पीछे की अपनी कहानियां हैं जिसके बारे में फिल्म आपको धीरे-धीरे बताती है. इसके बाद फिल्म कभी अपने छोटे स्वार्थों को पूरा करने तो कभी मोटे मतलबों को साधने की लगातार कोशिश करने वाले परिवार के सदस्यों को पोल खोलती रहती है. हालांकि यहां पर एकता का दिखावा करने वाले परिवार के अंदर-बाहर का सच दिखाने की कोशिश करते हुए फिल्म उतनी चतुर नहीं हो पाती और यहीं पर पहली बार मनोरंजन की डोर जरा ढीली पड़ती है.

‘चाचा जी बीमार हैं और तुम...’ फिल्म का पहला हिस्सा तो बस इसी एक लाइन और इसके भावार्थ के सहारे बहुत मजे से कट जाता है. इस दौरान मौकापरस्त पत्नियां अपने-अपने काम साधती और घर से पांव बाहर धरने को तरसने वाले बच्चे मुंबई शहर की मौज लेते दिखाई देते हैं. दूसरे हिस्से में इन किरदारों के ऐसा करने की वजह को जरा विस्तार से दिखाने के चक्कर में फिल्म जरा सुस्त हो जाती है. मरने वाले की प्रॉपर्टी से जुड़ा एक राज, जिसके बारे में फिल्म आखिर तक ढेर सारा सस्पेंस बनाकर रखती है, जब खुलता है तो बंद मुट्टी लाख की... वाली फीलिंग आने लगती है. इसके अलावा, वास्तविकता के एकदम बगल में ठहरकर बनाई गई इस फिल्म का आदर्शवादी अंत भी, हो सकता है आपको उतना रास न आए.

मनोज पाहवा और सीमा पाहवा की जोड़ी सबसे ज्यादा समय स्क्रीन पर नजर आती है और पहले हिस्से में जमकर हंसाती है. सीमा पाहवा का किरदार बहुत हद तक ‘बरेली की बर्फी’ की ‘मम्मी’ का एक्सटेंशन लगता है पर यहां भी वे बहुत मजेदार, विश्वसनीय और दर्शनीय हैं. इनके अलावा विनय पाठक और सना कपूर सबसे ज्यादा ध्यान खींचते हैं. पाठक के किरदार की खासियत, उसका लाउड होना है और ऐसा होने के बावजूद वे जरा सी भी ओवरएक्टिंग करते नहीं दिखे हैं. वहीं ‘शानदार’ में आलिया भट्ट की बड़ी बहन का किरदार बखूबी निभाने वाली सना कपूर की यह दूसरी फिल्म है. इस बार भी उन्होंने कमाल कहा जा सकने वाला काम किया है.

फिल्मों और टीवी पर बतौर अभिनेता अच्छा खासा नाम-दाम बटोरने वाले हर्ष छाया ने इस फिल्म का लेखन और निर्देशन किया है. इसके साथ ही, फिल्म में उन्होंने एक गाना भी गाया है और एक दृश्य में ही सही, अभिनय भी कर लिया है. अभिनय को छोड़ दें तो यह कई तरह से उनकी डेब्यू फिल्म है और कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह पूरी तरह से हर्ष छाया की फिल्म है. इसमें लगभग बराबर मात्रा में खूबियां-खामियां हैं, सो यह कहा जा सकता है कि इसे देखकर पछताना नहीं होगा और ना देखकर कुछ गंवाना नहीं होगा. कुल मिलाकर मामला आपकी फुर्सत पर छोड़ा जा सकता है.