वाराणसी में मंगलवार को जो फ्लाइओवर ढहा है, उसका निर्माण इसी साल फरवरी में पूरा हुआ था. यह सीधे-सीधे इस बात का इशारा है कि या तो इस फ्लाइओवर में घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल किया गया था या फिर इससे बनाने में दूसरी किस्म की लापरवाहियां बरती गई थीं. यही वे बीमारियां जो दशकों से भारत की निर्माण परियोजनाओं को कमजोर करती आ रही हैं.

हमारे यहां ऐसी निर्माण परियोजनाएं जल्दबाजी में शुरू की जाती हैं, ऐसा खासकर चुनावों से पहले होता है. जल्दबाजी के चलते परियोजनाओं की पुख्ता प्लानिंग नहीं हो पाती और इंजीनियरिंग के जो जरूरी कायदे यहां लागू होने चाहिए, उनमें से कुछ की उपेक्षा भी कर दी जाती है.

कई परियोजनाएं भारी लेट-लतीफी का शिकार भी होती हैं जिसके चलते इनकी लागत बढ़ जाती है और फिर ठेकेदार इसे कम करने के चक्कर में निर्माण की गुणवत्ता से समझौते करते हैं. इस सबका नतीजा वही होता है जो वाराणसी में हुआ. इस हादसे में अब तक 17 लोगों की मौत हुई है. इससे पहले मार्च, 2016 में कोलकाता में एक फ्लाइओवर ढहा था जिसमें 27 लोग मारे गए थे.

निर्माण परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर होने वाला भ्रष्टाचार ही वह मूल वजह है जिसके चलते राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार ने भारत के आधारभूत ढांचे के विकास के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की हिमायत की थी.

कुल मिलाकर फिलहाल देश का निर्माण उद्योग सबसे पहले इन हालात के लिए जिम्मेदार दिखता है. अगर निर्माण परियोजनाओं के लिए निविदा बुलाने और उनके आवंटन की प्रक्रिया को ज्यादा से ज्यादा पारदर्शी बनाने की कोशिशें हो तो इससे बेहतरी की तरफ बढ़ने की एक शुरुआत हो सकती है. अभी तो हमारे यहां कई मामलों में उन कंपनियों या लोगों को ठेके मिल जाते हैं जो जरूरी अर्हता तक पूरी नहीं करते. ये फिर मुनाफा कमाने के लिए गलत ढंग से परियोजना आगे बढ़ाते हैं या फिर गुणवत्ता से समझौता करते हैं. इसीलिए जरूरी है कि जब वाराणसी जैसे हादसे हों तो ठेकेदार से लेकर अन्य विभागों तक इनकी जवाबदेही तय की जाए.

भारत में आधारभूत ढांचे की बहुत कमी है. आज जब कई जगह ऊंची-ऊंची इमारतें, पुल, अंडरपास और मेट्रो लाइनें बन रही हैं तब इनके टिकाऊपन के साथ-साथ इस पर भी ध्यान देना जरूरी है कि इनका उपयोग कितनों सालों तक सुरक्षित रहेगा. यह कोई दबी-छिपी बात नहीं है कि हर साल मॉनसून के दौरान शहरी इलाकों में कई सड़कें उखड़ जाती है. इसका सीधा मतलब है कि ठेकेदार इनके निर्माण में टिकाऊपन का कोई ख्याल नहीं रखते. इसीलिए जरूरी है कि समय-समय पर सभी बड़ी निर्माण परियोजनाओं की जांच होती रहे.

भारत में नेता-नौकरशाह-ठेकेदार का गठबंधन भी कोई दबी-छिपी बात नहीं है. वहीं जिस तरह जब-तब हमारे यहां पुल वगैरह गिरने की घटनाएं होती रहती हैं और लोगों की जानें जाती रहती हैं, उससे समझ आता है कि इस गठबंधन को तोड़ने के लिए आज तक कुछ नहीं किया जा सका है.

हर परियोजना को पूरा करने के लिए एक साफ-साफ समयावधि तय होनी चाहिए और इसमें निर्माण पूरा न हो पाए तो फिर ठेकेदारों पर सख्त जुर्माना लगना चाहिए. इसके साथ ही जो परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं, उनकी समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए ताकि उनमें जरूरत के लिहाज से बदलाव किए जा सकें. इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. पिछले साल मुंबई के एल्फिंस्टन स्टेशन पर इसलिए भगदड़ के हालात बने थे और लोगों को जान गंवानी पड़ी थी क्योंकि यहां बना फुटब्रिज यात्रियों की संख्या बढ़ने के अनुपात में बाद में चौड़ा नहीं किया गया था. अगर समय रहते ऐसा हो जाता तो वह हादसा रोका जा सकता था.

अगर हमारी निर्माण परियोजनाएं इन खामियों से जूझ रही हैं तो ऐसे में स्मार्ट सिटी जैसी परियोजनाओं की तो बात तक करने का कोई मतलब नहीं है. ढांचागत परियोजनाओं में सुधार के लिए राजनेताओं, शहरी योजनाकारों और ठेकेदारों, तीनों को बराबरी से इनकी जवाबदेही लेनी चाहिए. यही एक तरीका है जिससे भविष्य में हादसे रोके जा सकते हैं. (स्रोत)