कर्नाटक में जोड़-तोड़ से सरकार बनाने पर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के बीच मतभेद होने की ख़बर सामने आ रही है. सूत्रों के मुताबिक आरएसएस के कई पदाधिकारियों का मानना है कि जनता दल-सेकुलर (जद-एस) और कांग्रेस के गठबंधन को अगर सरकार बनाने का मौका दिया जाता तो यह स्थिति भाजपा के लिए ज़्यादा बेहतर होती. संघ का मानना है कि जद-एस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार साल-छह महीने से ज़्यादा नहीं चलने वाली. ऐसे में काफ़ी संभावना बनती कि कर्नाटक में 2019 के लोक सभा के साथ विधानसभा चुनाव की स्थिति भी बन जाती. तब भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलने का मौका भी ज़्यादा होता.

सूत्रों के हवाले से द एशियन एज़ में प्रकाशित ख़बर की मानें तो आरएसएस के इस दलील से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह राजी नहीं थे. इसलिए उन्होंने केंद्रीय प्रकाश जावड़ेकर को ख़ास तौर पर यह जिम्मा सौंपा कि वे जाकर येद्दियुरप्पा सरकार के लिए बहुमत का बंदोबस्त करें. बताया जाता है कि शाह के कहने पर ही जावड़ेकर ने जद-एस के प्रमुख एचडी देवेगौड़ा से मिलने की कोशिश की. लेकिन उनकी यह कोशिश सफल नहीं हुई. इसके बाद उन्होंने देवेगौड़ा के पुत्र एचडी कुमारस्वामी से एक होटल में मुलाकात की.

सूत्र बताते हैं कि इस मुलाकात के दौरान जावड़ेकर ने कुमारस्वामी को भाजपा से गठबंधन करने के दूरगामी फ़ायदों के बारे में बताया. उन्हें केंद्र में मंत्री और उनके भाई एचडी रेवन्ना को येद्दियुरप्पा सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाने की पेशकश भी की. उन्हें यह भी समझाने की कोशिश की कि जद-एस के परंपरागत मैसुरु क्षेत्र में ख़ास तौर पर कांग्रेस के साथ गठबंधन की स्थिति में उसे नुकसान होगा. लेकिन कुमारस्वामी ने उन्हें बताया कि इस बारे में सभी फैसले उनके पिता एचडी देवेगौड़ा कर रहे हैं. उनसे ही बात करें.

इसके बाद अब जैसी कि द टाइम्स ऑफ इंडिया ने ख़बर दी है, भाजपा फिलहाल जद-एस और कांग्रेस के लिंगायत विधायकों से ख़ास तौर पर आस लगाए हुए है. दोनों पार्टियों में इस तरह के क़रीब एक दर्जन विधायक बताए जाते हैं. उन्हें यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि येद्दियुरप्पा इस समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं. उन्हें समर्थन देने से समाज में उनकी तरफ़ से भी एक सकारात्मक संदेश जाएगा. क्योंकि लिंगायत समुदाय ने भी कांग्रेस के साथ जाने बजाय येद्दियुरप्पा को समर्थन देना ज़्यादा बेहतर समझा है.