कर्नाटक में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया जारी है. इससे पहले चुनाव नतीजों के बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले बीएस येद्दियुरप्पा ने विश्वास मत का सामना किये बगैर ही शनिवार को इस्तीफा दे दिया था. इस तरह कर्नाटक में तीन दिन पुरानी भाजपा सरकार गिर गई थी. इसके बाद जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार एचडी कुमारस्वामी को सरकार बनाने का न्योता मिला है. वे 23 मई को शपथ लेंगे.

भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत न होने के बावजूद कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला ने पार्टी को सरकार बनाने का न्योता दिया था. इसके चलते ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषक इस पर एकराय हैं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा को रोकने के लिए अलग-अलग राज्यों के धुर विरोधियों को मतभेद भुलाकर एक होने की जरूरत है. यह बिल्कुल स्पष्ट तौर पर दिख रहा है कि भाजपा को चुनावों में प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का लाभ तो मिल ही रहा है, केंद्र सरकार की एजेंसियों और अनुकूल राज्यपालों के होने से भी पार्टी को राज्यों में सरकार बनाने में मदद मिल रही है.

2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की कामयाबी के बाद लगातार हुए विधानसभा चुनावों में इक्का-दुक्का अपवादों का छोड़ दें तो यह साफ है कि मौजूदा परिस्थिति में भाजपा एक बड़ी राजनीतिक ताकत है और पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों से उसका सामना नहीं किया जा सकता. तो ऐसे में अलग-अलग राज्यों के उन समीकरणों को समझना जरूरी है जिनके हकीकत बने बगैर अलग-अलग स्तरों पर चल रहा नरेंद्र मोदी और अमित शाह विजय रथ थमना मुश्किल लग रहा है.

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और लोकसभा में सबसे अधिक 80 सांसद भी इसी राज्य से आते हैं. 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को अपने सहयोगी अपना दल के साथ मिलकर यहां 73 सीटें हासिल हुई थीं. इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला. इन दोनों चुनावों में प्रदेश की धुर विरोधी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अलग-अलग चुनाव लड़े थे. लेकिन बाजी इस साल तब पलट गई जब गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव सपा-बसपा ने मिलकर लड़ा. प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य द्वारा खाली की गई इन दोनों सीटों पर भाजपा हार गई.

2014 से अभी तक के नतीजों से यह स्पष्ट हो गया है कि उत्तर प्रदेश में जब तक सभी पार्टियां अकेले लड़ेंगी तब तक भाजपा को रोक पाना मुश्किल है. लेकिन जैसे ही सपा-बसपा एक मंच पर आ रही हैं, भाजपा के लिए जीत पाना मुश्किल हो रहा है. वैसे सपा-बसपा में गठबंधन तो हो गया है लेकिन, भाजपा और दूसरे लोगों में भी इस बात को लेकर संशय है कि यह गठबंधन चल पाएगा या नहीं. बहुत लोग यह मान रहे हैं कि संसदीय चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर यह गठबंधन बिखर सकता है.

लेकिन दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जो इसमें कांग्रेस और अजित सिंह की राष्ट्रीय लोक दल को शामिल करके इसे महागठबंधन का रूप देने को लेकर आश्वस्त हैं. अगर यह समीकरण बनता है तो उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी और भाजपा की राह बेहद मुश्किल हो सकती है. बीते विधानसभा चुनाव के आंकड़े देखें तो भाजपा को करीब 40 फीसदी वोट मिला था. उधर, सपा, बसपा, कांग्रेस और अजित सिंह के आरएलडी को जोड़कर देखें तो यह आंकड़ा लगभग 52 फीसदी के करीब था.

पश्चिम बंगाल

2019 के चुनावों में भाजपा को जिन राज्यों से सीटों में बढ़ोतरी की उम्मीद है, उनमें पश्चिम बंगाल प्रमुख राज्य है. पश्चिम बंगाल में पार्टी का काम देख रहे नेताओं को लगता है यहां अगले चुनाव में भाजपा 15 से 20 सीटें जीत सकती है. लेकिन ये लोग अनौपचारिक बातचीत में खुद यह स्वीकार करते हैं कि अगर पश्चिम बंगाल में धुर विरोधी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच कोई तालमेल हो गया तो भाजपा के लिए काफी दिक्कत हो जाएगी. इन लोगों को यह भी मानना है कि अगर ऐसे किसी संभावित गठबंधन में कांग्रेस भी जुड़ जाए तो भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल में खाता खोलना मुश्किल हो जाएगा.

पश्चिम बंगाल में इन तीनों दलों का एक मंच पर औपचारिक तौर पर आना अभी की परिस्थिति में तो मुश्किल लग रहा है. लेकिन कर्नाटक के घटनाक्रम के बाद जो राजनीतिक परिस्थिति बन रही है, उसमें यह भाव दिनोंदिन और मजबूत होता दिख रहा है कि भाजपा सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. ऐसे में कांग्रेस की मध्यस्थता के साथ अगर तीनों दलों के बीच कोई तालमेल हो जाए तो भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

कर्नाटक

जब कर्नाटक विधानसभा चुनावों के नतीजों में एक बार यह लगा कि भाजपा स्पष्ट बहुमत की ओर है तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट करके यह कहा कि अगर कांग्रेस और जनता दल सेकुलर एक होकर चुनाव लड़ते तो नतीजे बिल्कुल अलग होते. इसके कुछ ही घंटे के अंदर दोनों दल सरकार बनाने के लिए एक हो गए. लेकिन दोनों के अलग-अलग चुनाव लड़ने से भाजपा कर्नाटक की सबसे बड़ी पार्टी बन गई और उसे राज्यपाल की मदद से सरकार बनाने का मौका मिल गया.

इस वजह से अभी से ही कांग्रेस और जेडीएस के मतों को जोड़कर अगले लोकसभा चुनावों की तस्वीर बनाई जा रही है और कहा जा रहा है कि अगर दोनों साथ चुनाव लड़े तो भाजपा को कर्नाटक में सिर्फ छह लोकसभा सीटें मिलेंगी. हालिया चुनावों में दोनों दलों को मिले वोट देखें तो उनका आंकड़ा 56 फीसदी बैठता है जबकि भाजपा को करीब 36 फीसदी वोट मिले हैं. इसका मतलब साफ है कि अगर कांग्रेस और जेडीएस के बीच यह तालमेल चलता है तो कर्नाटक में नरेंद्र मोदी और भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा.

बिहार

बिहार में वैसे तो अभी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नीतीश कुमार भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं लेकिन भाजपा के साथ उनके असहज संबंधों की खबरें अक्सर आती हैं. कुछ लोग तो यहां तक दावा कर रहे हैं कि कांग्रेस के कुछ नेता उन्हें भाजपा से दूर करके लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजेडी) के साथ लाने की कोशिश में जुटे हुए हैं. याद रहे कि 2015 में जब जेडीयू और आरजेडी ने मिलकर चुनाव लड़ा था तो इस गठबंधन को भारी बहुमत मिला था.

माना जा रहा है कि अगर जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस का महागठबंधन फिर से अस्तित्व में आ गया तो बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 32 से 34 सीटों पर इस महागठबंधन का कब्जा हो जाएगा. बिहार का राजनीतिक समीकरण कुछ ऐसा है कि इस परिस्थिति में नरेंद्र मोदी के प्रचार और अमित शाह का प्रबंधन कौशल के बूते भी भाजपा के लिए सीटें निकालना बेहद मुश्किल हो जाएगा. अभी बिहार की कुल लोकसभा सीटों में से तीन चौथाई से अधिक भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास हैं.

तमिलनाडु

तमिलनाडु में जब तक जयललिता जीवित थीं एआईएडीएमके स्वतंत्र पार्टी के तौर पर दिखती थी. लेकिन उनके निधन के बाद इस पार्टी में भाजपा का दखल काफी बढ़ गया है. तमिलनाडु की राजनीति में एआईएडीएमके और करुणानिधि की डीएमके को धुर विरोधी माना जाता है. अब भाजपा एआईएडीएमके के एक खेमे के जरिए तमिलनाडु में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है. पार्टी का एक खेमा भाजपा के पक्ष में है. लेकिन एआईडीएमके में एक खेमा ऐसा भी है जो भाजपा की राजनीति का विरोधी है. ऐसे में जिस तमिलनाडु में भाजपा पहले से ही कमजोर स्थिति में है, वहां अगर एआईएडीएमके और डीएमके एक हो जाते हैं या फिर एआईएडीएमके पूरी तरह संगठित भी रहती है तो भी भाजपा के लिए इस राज्य में अपना पैर जमाने का सपना पूरा करना बेहद मुश्किल हो सकता है.