बूकानाकेरे सिद्धलिंगप्पा येद्दियुरप्पा, कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बीएस येद्दियुरप्पा का यह पूरा नाम है. आज सुबह नौ बजे कर्नाटक राजभवन में राज्यपाल वजूभाई वाला द्वारा शपथ दिलाए जाने के बाद वे तीसरी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन गए हैं. हालांकि उनकी परीक्षा अभी ख़त्म नहीं हुई है. भाजपा की सरकार बनाने और मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी तरफ़ से किए गए दावे को स्वीकार किया जाना कई जानकारों की नज़र में विवादास्पद है. इनका कहना है कि भले ही येद्दियुरप्पा सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि फ़िलहाल उनके पास बहुमत नहीं है. जबकि चुनाव नतीजों के बाद बने कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन का दावा है कि उसके पास बहुमत के लिए ज़रूरी विधायक हैं और कागजों पर ही सही, यह स्पष्ट भी है. कर्नाटक के राज्यपाल ने येद्दियुरप्पा को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का समय दिया है.

वैसे कर्नाटक में येद्दियुरप्पा की राजनीतिक अहमियत मुख्यमंत्री पद पर निर्भर नहीं है. वे पहले भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं. लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में उन्होंने ख़ुद को न सिर्फ़ ऐसा नेता साबित किया जिसका विकल्प भाजपा के पास नहीं था, बल्कि जिसके लिए पार्टी को भ्रष्टाचार के आरोपों और 75 वर्ष की उम्र के नेताओं को मुख्यधारा की राजनीति से अलग रखने के कथित सिद्धांत की भी अनदेखी करनी पड़ी. येद्दियुरप्पा का राजनीतिक जीवन बताता है कि वे एक-एक सीढ़ी चढ़कर इस मुक़ाम पर पहुंचे हैं.

येद्दियुरप्पा के पिता लिंगायत समुदाय के एक प्रभावशाली नेता थे

येद्दियुरप्पा का जन्म 27 फ़रवरी, 1943 को कर्नाटक के मांड्या ज़िले के बुक्कनकेरे में हुआ था. बताया जाता है कि कर्नाटक के तुमकुर ज़िले के येदियुर स्थित शैव मंदिर के नाम पर उनका नाम रखा गया था. येद्दियुरप्पा के माता-पिता का नाम सिद्धालिंगप्पा और पुट्टतायम्मा था. येद्दियुरप्पा लिंगायत समुदाय से हैं और उनके पिता इस समुदाय के प्रभावशाली नेता रहे हैं. येद्दियुरप्पा जब चार साल के थे तभी उनकी मां का निधन हो गया था. पिता ने ही उनका पालन-पोषण किया. येद्दियुरप्पा ने मांड्या के ही पीईएस कॉलेज से अपनी शिक्षा पूरी की है.

1965 वे कर्नाटक के सामाजिक कल्याण विभाग में प्रथम श्रेणी के क्लर्क के पद पर नियुक्त हुए, लेकिन उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी और शिकारीपुरा आ गए. यहां उन्होंने वीरभद्र शास्त्री शंकर राइस मिल में बतौर क्लर्क ही दूसरी नौकरी की. इसी मिल के मालिक की बेटी से फिर 1967 में उनकी शादी हुई. येद्दियुरप्पा के दो बेटे हैं और तीन बेटियां. उनके दो बेटों में से एक राघवेंद्र अपने पिता की तरह राजनेता हैं और इस समय कर्नाटक विधानसभा के सदस्य हैं.

ज्योतिषी के कहने पर नाम की स्पेलिंग बदली

येद्दियुरप्पा कुछ ज्यादा ही धार्मिक विश्वास वाले नेता माने जाते हैं. साल 2007 में उन्होंने ज्योतिषियों के कहने पर अपने नाम की स्पेलिंग (Yediyurappa से Yeddyurappa) बदल ली थी. उसी साल वे पहली बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री भी बने और उनके सहयोगी नेताओं को तब यह कहते हुए सुना जा रहा था कि नाम की स्पेलिंग बदलना येद्दियुरप्पा के लिए शुभ साबित हुआ है. हालांकि वे जेडीएस से मतभेदों के चलते उसके साथ बनी इस गठबंधन सरकार को ज़्यादा दिन नहीं चला पाए थे. लेकिन बाद में 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा को फिर जीत दिलाई. हालांकि तब भी पार्टी बहुमत से दो सीटें दूर रह गई थी और उस समय भाजपा ने निर्दलीयों की मदद से सरकार बनाई थी. यह किसी भी दक्षिण भारतीय राज्य में भाजपा की अपने दम पर बनी पहली सरकार थी और इसका नेतृत्व येद्दियुरप्पा कर रहे थे.

संघ के इकाई सचिव से मुख्यमंत्री बनने तक का सफ़र

कॉलेज के दिनों से ही येद्दियुरप्पा का झुकाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ़ रहा. यहीं से उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत भी हुई. 1970 में वे संघ की शिकारीपुरा इकाई के सचिव बने. इसके दो साल बाद येद्दियुरप्पा शिकारीपुरा टाउन नगर निगम चुनाव में जीते और जनसंघ (जो अब भाजपा है) की तालुका इकाई के अध्यक्ष भी चुने गए. इसके बाद 1975 में वे शिकारीपुरा टाउन नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए. उसी साल लगे आपातकाल के दौरान वे जेल भी गए. बाद में 1980 में येद्दियुरप्पा भाजपा की शिकारीपुरा तालुका इकाई के अध्यक्ष पद के लिए चुने गए और 1985 में पार्टी के शिमोगा जिले के अध्यक्ष बने. उनकी पदोन्नति का यह सिलसिला इसी तरह जारी रहा और 1988 में येद्दियुरप्पा कर्नाटक में भाजपा के अध्यक्ष बन गए.

येद्दियुरप्पा के पूरे राजनीतिक जीवन में शिकारीपुरा चुनाव क्षेत्र का अहम योगदान है. यहीं से वे पहली बार संघ की इकाई के सचिव बने थे और हालिया चुनाव में भी उन्होंने यहीं से विधानसभा सीट पर जीत दर्ज की. 1983 में वे पहली बार शिकारीपुरा विधानसभा सीट से चुने गए थे. उसके बाद लगातार छह बार उन्होंने इसी विधानसभा क्षेत्र के लोगों का नेतृत्व किया. 1994 के विधानसभा चुनाव के बाद वे पहली बार कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता चुने गए थे. हालांकि 1999 का चुनाव वे हार गए थे. तब भाजपा ने उन्हें विधान परिषद का सदस्य बनाकर सदन में भेजा था. उसके बाद 2004 में येद्दियुरप्पा फिर चुनाव जीते और विधानसभा पहुंच गए.

येद्दियुरप्पा का पहली बार मुख्यमंत्री बनना भी कम नाटकीय नहीं था

येद्दियुरप्पा के राजनीतिक जीवन में एक अहम पड़ाव 2004 में ही आया जब उन्होंने जेडीएस के साथ मिलकर तब के मुख्यमंत्री धरम सिंह के नेतृत्व वाली सरकार गिरा दी और एक समझौते के तहत जेडीएस संग वैकल्पिक सरकार बना ली. समझौते के मुताबिक़ यह तय हुआ था कि नई सरकार के पहले 20 महीने तक जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री रहेंगे, और बाद के 20 महीने येद्दियुरप्पा सरकार की कमान संभालेंगे. लेकिन अक्टूबर 2007 में जब येद्दियुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने का समय आया तो कुमारस्वामी समझौते से मुकर गए और पद छोड़ने से इनकार कर दिया.

इसके बाद येद्दियुरप्पा ने अपने सहयोगियों के साथ कैबिनेट से इस्तीफ़ा दे दिया और जेडीएस से समर्थन वापस ले लिया. परिणामस्वरूप, गठबंधन सरकार गिर गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. बाद में दोनों दलों ने अपने मतभेद ख़त्म किए और येद्दियुरप्पा पहली बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने. हालांकि वे ज़्यादा दिन इस पद पर नहीं रह पाए, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने उन्हें कर्नाटक में भाजपा का सबसे बड़ा नेता बना दिया था.

उस समय येद्दियुरप्पा के राजनीतिक कद का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब 2008 में विधानसभा चुनाव हुए तो उन्हें हराने के लिए समाजवादी पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री एस बंगारप्पा को मैदान में उतारा था. उन्हें कांग्रेस और जेडीएस का भी समर्थन प्राप्त था. इसके बावजूद येद्दियुरप्पा अपनी सीट 45,000 वोटों के बड़े अंतर से जीते. तब भाजपा को भी ऐतिहासिक सफलता मिली थी और 30 मई, 2008 को येद्दियुरप्पा दूसरी बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने.

भ्रष्टाचार के आरोप और भाजपा से नाता तोड़कर अलग पार्टी बनाना

दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद येद्दियुरप्पा भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर लगातार विवादों में रहे. राज्य में अवैध खनन की जांच कर रहे कर्नाटक लोकायुक्त ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि येद्दियुरप्पा ने बेंगलुरु और शिमोगा में हो रहे खनन में मुनाफ़ाख़ोरी की थी. लोकायुक्त ने यह आरोप भी लगाया कि बेल्लारी, तुमकुर और चित्रदुर्ग ज़िले में कच्चे लोहे के निर्यात में हुए घोटाले से भी येद्दियुरप्पा का संबंध था. इस विवाद के चलते येद्दियुरप्पा पर भाजपा आलाकमान की तरफ़ से दबाव बढ़ने लगा. आख़िरकार 31 जुलाई, 2011 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. उसके अगले साल उन्होंने अपने विधायक पद और भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफ़ा दे दिया और कर्नाटक जनता पक्ष के नाम से एक नई पार्टी बना ली. 2013 के विधानसभा चुनाव में वे इसी पार्टी से चुनाव लड़े और जीते. लेकिन भाजपा से उनकी दूरी ज़्यादा दिन क़ायम नहीं रह पाई और नवंबर में उन्होंने वापसी कर ली. 2014 के चुनाव को देखते हुए उन्होंने नई पार्टी का भाजपा में विलय कर लिया था. इस बार उन्होंने शिमोगा से लोकसभा चुनाव लड़ा और तीन लाख 60 से ज़्यादा वोटों से जीते.

बाद में 2016 में उन्हें एक बार फिर भाजपा की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष चुना गया और हालिया विधानसभा चुनाव में उन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया. उनके नेतृत्व में पार्टी ने सबसे ज़्यादा सीटें हासिल की हैं. हालांकि इस बार उनका मुख्यमंत्री बनना विवाद का मुद्दा बन गया है.