नब्बे के दशक में कश्मीरी पंडितों का खूबसूरत कश्मीर घाटी से निकाला जाना एक ऐसी हकीकत है जिसके पीछे की हकीकत को कोई भी दावे के साथ नहीं समझा सकता. कश्मीरी पंडितों के पास इसकी अपनी कहानी है, घाटी में रह रहे मुसलमान कश्मीरियों के पास अपनी और इंडियन स्टेट के पास अपनी. करीब तीस साल पहले हुए इस हादसे की किसी एक कहानी पर यकीन ला पाना आसान नहीं रहा है. लेकिन क्या आज हम इस बात पर यकीन कर पाएंगे कि जम्मू में बसे डोगरों, पंडितों और बाकी हिंदुओं में यह डर फैलने लगा है कि जिस तरह घाटी से पंडितों को निकलना पड़ा, कल मुमकिन है उन्हें भी जम्मू छोड़कर भारत के बाकी हिस्सों का रुख करना पड़े?

जम्मू को एक लंबे समय से सरकारों और देश के मीडिया से कई शिकायतें रही हैं. यहां के लोगों का मानना है कि इन सभी का सारा ध्यान घाटी पर रहता है और उनकी परेशानियों और शिकायतों की परवाह न घाटी से आने वाली कश्मीरी सरकारों को है, न केंद्र को और न ही नेशनल मीडिया को. लेकिन कश्मीर को जम्मू से ज़्यादा मिलने वाला सरकारी पैसा या योजनाएं हों या कश्मीर की मिलिटेंसी की वजह से जम्मू को होने वाला नुकसान या फिर धारा 370, इन्हें लेकर जम्मूवासियों की शिकायतें और नाराजगी अब पुरानी पड़ चुकी हैं. अब नयी बात यह है कि पिछले दिनों यहां जो खदकने लगा है उसे नज़रअंदाज़ करना जम्मू-कश्मीर के हालात को बहुत ज्यादा और पेंचीदा और सामान्य होने से और बहुत दूर कर सकता है.

जम्मू के हिंदू बहुल इलाकों को मुसलमान घेर रहे हैं

जम्मू पारंपरिक रूप से हिंदू बहुल ज़िला रहा है. उसके नज़दीकी ज़िले सांबा, कठुआ और ऊधमपुर भी हिंदू बहुल हैं. इन इलाकों में इस समय यह चर्चा आम है कि हिंदू इलाकों को एक साज़िश के तहत मुसलमान आबादी घेर रही है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले तीस सालों में जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर आंतरिक विस्थापन हुआ है. बेहतर नौकरी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की तलाश में जम्मू आकर बसने वाले इन लोगों में हिंदू भी हैं और मुसलमान भी. पिछले कुछ समय से यहां आने वाले हिंदुओं में ज्यादातर सांबा, कठुआ और ऊधमपुर ज़िलों के डोगरा समुदाय के लोग हैं. और मुसलमानों में कश्मीर घाटी सहित राज्य के कई हिस्सों से आने वाले लोग. जम्मू के गुम्मट इलाके में किराने की दुकान चलाने वाले रोहित खजूरिया कहते हैं, ‘दस साल पहले दरबार मूव के बाद यहां इक्का-दुक्का कश्मीरी ही दिखते थे, लेकिन अब यहां आप साल भर उन्हें देख सकते हैं. हर तीसरे कश्मीरी ने जम्मू में घर खरीद लिया है. ये सिदड़ा, भटिंडी (जम्मू की फॉरेस्ट लैंड पर बनी गैर-कानूनी मुस्लिम बहुल कॉलोनियां), ये सब इलाके पिछले 20 साल में ऐसे डिवेलप हुए हैं जैसे जम्मू के पैरेलल एक नया शहर खड़ा कर दिया गया हो.’

अगर सिर्फ जम्मू डिवीजन को ही देखा जाये तो यहां कुल दस ज़िले हैं. इनमें से छह - पुंछ, रजौरी, डोडा, किश्तवाड़, रामबन और रेआसी मुसलमान बहुल हैं. इनमें से पीर-पंजाल इलाके में आने वाले पुंछ और रजौरी में मुसलमान जनसंख्या क्रमश: 91.9 और 60.2 फीसदी है. इनकी मुख्य भाषाएं गोजरी, पहाड़ी और कश्मीरी हैं. पुंछ की दूरी जम्मू से लगभग 235 किलोमीटर है और श्रीनगर से लगभग 175 किलोमीटर. लेकिन कम दूरी और सांस्कृतिक समानता के बावजूद पुंछ के मुसलमान जम्मू की तरफ इसलिए माइग्रेट करते हैं क्योंकि श्रीनगर मिलिटेंसी से प्रभावित है और यहां रोज़गार के अवसर भी ज़्यादा हैं. इसके अलावा श्रीनगर न जाने का एक और कारण पुंछ से जम्मू आकर रह रहे इरशाद खान गिनाते हैं - ‘पुंछ के मुसलमानों में एक बड़ी संख्या गुज्जरों की है. घाटी के कश्मीरियों में गुज्जर आप समझ लें एक गाली जैसा शब्द है. वो गुज्जरों को नीची नज़र से देखते हैं. इसलिए भी हम जम्मू जाना पसंद करते हैं. जम्मू के डोगरों और गुज्जरों के रिश्ते हमेशा बेहतर रहे हैं.’

तवी नदी के उस पार बस रहा नया जम्मू | प्रदीपिका सारस्वत
तवी नदी के उस पार बस रहा नया जम्मू | प्रदीपिका सारस्वत

चिनाब घाटी के चार ज़िलों डोडा, किश्तवाड़, रामबन और रेआसी के गोल-अरनास और गुलाबगढ़ में भी मुसलमानों की जनसंख्या लगभग साठ फीसदी है. भद्रवाही, कश्मीरी और गोजरी बोलने वाले ये लोग भी सुरक्षा, शिक्षा, रोज़गार और अन्य कारणों से जम्मू का ही रुख करते रहे हैं. इसके अलावा जम्मू डिवीजन के हिंदू बहुल जिलों - कठुआ, सांबा और ऊधमपुर - के दूर-दराज़ के इलाकों में रहने वाले मुसलमानों ने भी अपने ज़िलों के केंद्रीय हिस्सों का रुख किया है, साथ ही अन्य ज़िलों के ग्रामीण इलाकों की मुसलमान आबादी भी यहां आकर बस रही है.

इसके अलावा जम्मू के इन चारों हिंदू बहल ज़िलों की जनसांख्यिकी में जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ है वह है अब तक घुमक्कड़ जीवन जीते रहे गुज्जरों-बकरवालों का इन इलाकों में आ बसना. जम्मू में यूं तो शुरू से ही गुज्जर आबादी रही है. लेकिन पिछले 20 सालों में जागरूकता और शिक्षा का स्तर बढ़ने के कारण ज़्यादा से ज़्यादा गुज्जर-बकरवालों ने एक जगह पर रहना शुरू कर दिया है. जहां पहले परिवार के परिवार मवेशियों के साथ मैदानों से पहाड़ और पहाड़ से मैदान की यात्रा करते रहते थे. वहीं अब परिवार के कुछ सदस्य ही इस काम को चुनते हैं, बाकी लोग शिक्षा और अन्य नौकरियों या व्यवसायों की तरफ मुड़ चुके हैं.

कठुआ के रसाना में हुए बच्ची के बलात्कार के मामले में ये कहा जा रहा है कि डोगरों ने ऐसा इन इलाकों के गुज्जरों को डराकर भगाने के लिए किया. सच जो भी हो लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कठुआ हो या जम्मू के अन्य हिंदू बहुल इलाके, इन सभी में अपने चारों ओर बढ़ती मुसलमान आबादी से डर पैदा हो चुका है. और इस डर में जम्मू-कश्मीर सरकार की कुछ नीतियों के खिलाफ गुस्सा भी मिल चुका है. लोगों का मानना है कि जम्मू में डेमोग्राफिक चेंज सरकार की साज़िश है.

डेमोग्राफिक चेंज सरकार की सोची-समझी चाल है

कठुआ मामले में बचाव पक्ष के वकील अंकुर शर्मा साफ तौर पर कहते हैं कि जम्मू में हो रहा जनसांख्यिकी परिवर्तन स्टेट स्पॉन्सर्ड है. वे आरोप लगाते हैं, ‘(राज्य) सरकार यहां लेजिस्लेटिव (कानूनी) और एडमिनिट्रेशन (प्रशासन) स्तर पर बदलाव ला रही है.’

अंकुर कहते हैं, ‘कानूनी स्तर पर उदाहरण देखना चाहें तो आप स्टेट लैंड (वेस्टिंग ऑफ ओनरशिप) टू द ओनरशिप एक्ट 2001 को देख सकती हैं. इसे रौशनी एक्ट भी कहा जाता है. इसे दो तिहाई बहुमत से पास किया गया. आप ऐसा कोई भी एक्ट हिंदुस्तान तो क्या दुनिया के किसी हिस्से में नहीं देखेंगीं जहां गैरकानूनी तौर पर कब्ज़ाई गई सरकारी ज़मीन को स्टेट खुद कब्ज़ा करने वालों को देने के लिए कानून बना रहा हो.’

वे बताते हैं कि ऐसा नहीं है कि स्टेट लैंड सिर्फ मुसलमानों के ही कब्ज़े में थी. जम्मू, कठुआ, सांबा और ऊधमपुर इलाकों के हिंदू किसान भी इन ज़मीनों पर खेती कर रहे थे. पर अंकुर आरोप लगाते हैं कि इन इलाकों में इस एक्ट के तहत जिन भी दरख्वास्तों पर कार्रवाई हुई उनमें से 95 फीसदी मुसलमानों की थीं. और इनमें से भी ज़्यादातर मुसलमान स्थानीय न होकर बाहर के थे, मसलन पीर-पंजाल, चिनाब घाटी या फिर कश्मीर घाटी के.

अंकुर के मुताबिक साज़िशन हिंदू इलाकों में मुसलमानों को सरकारी ज़मीनें दे दी गईं. वे कैग की 2014 की रिपोर्ट का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि लगभग 20 लाख कनाल ज़मीन पर गैरकानूनी कब्ज़ा था. ‘न सिर्फ इन्होंने इस ज़मीन का ब़ड़ा हिस्सा मुसलमानों को दे दिया बल्कि इन्होंने इसे बाज़ार मूल्य से भी कम दाम में ये ज़मीन दे देने के लिए कुछ ऐसे नियम बनाए जो खुद पेरेंट एक्ट को वायलेट कर रहे थे. उन्होंने बोनस दिए, कनसेशंस दिए, कमर्शियल ज़मीन को एग्रीकल्चरल कह के कौड़ियों के भाव लोगों को दे दिया गया. इसके अलावा एग्ज़म्प्टेड कैटेगरी में आने वाली फॉरेस्ट लेंड भी ‘इनको’ दे दी. कैग की रिपोर्ट ने खुद बताया कि इन सब कारणों की वजह से राज्य को 25 हज़ार करोड़ का नुकसान हुआ.’

‘ये तो रही कानूनी स्तर पर स्टेट की साज़िश’ अंकुर कहते हैं, ‘इन्होंने प्रशासनिक स्तर पर भी ऐसा किया. जेएंडके में पटवारी की पोस्ट एक डिस्ट्रिक्ट काडर पोस्ट है. इसका अर्थ है कि जिस ज़िले से पटवारी चुना जाएगा उसकी नियुक्ति उसी ज़िले में रहेगी, उसका तबादला नहीं किया जा सकता. रेवेन्यू एडमिनिस्ट्रेशन में पटवारी सबसे मुख्य अधिकारी होता है. तो इन्होंने पहले सिदड़ा और भटिंडी की पूरी फॉरेस्ट लेंड को एनक्रॉच कर लिया, यहां कोई रजिस्ट्री नहीं होती, एग्रीमेंट के ऊपर एक दूसरे से ज़मीनें खरीद ली जाती हैं. इन्होंने तवी बेड (तवी नदी की ज़मीन) पर भी कब्ज़ा कर लिया. फिर इन्होंने सर्विस लॉ (सबॉर्डिनेट (नॉन गजटेड) रेवेन्यू रूल्स) का वायलेशन करते हुए, बाहर के ज़िलों के मुसलमान पटवारियों को यहां लाया. हमारे पास ढाई सौ से ज़्यादा रिकॉर्ड्स हैं कि इन पटवारियों ने बाहर से आने वाले मुसलमानों के नाम पर ग़लत तरीके से ज़मीनें ट्रांसफर कीं.’

अंकुर आगे कहते हैं, ‘प्रशासनिक तरीके से जम्मू की ज़मीन बाहर से आने वाले मुसलमानों को देने के लिए सरकार ने अगला तरीका निकाला उस ऑर्डर की शक्ल में जो आदिवासियों के नाम पर मुसलमानों को स्टेट लैंड, फॉरेस्ट लैंड और प्राइवेट लैंड पर कब्ज़ा करने के लिए लीगल इम्यूनिटी दे रहा था. इसमें एक क्लॉज़ था कि आदिवासी जिस भी ज़मीन पर रह रहे होंगे उन्हें वहां से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स उनके लिए कोई नीति नहीं बना लेती. एक और क्लॉज़ था कि किसी की निज़ी ज़मीन पर अदिवासियों द्वारा कब्ज़े की स्थिति में, अगर कोर्ट से भी उन्हें हटाने के निर्देश मिल जाते हैं तब भी पुलिस इस मामले में एविक्शन के लिए रेवेन्यू अधिकारियों की मदद नहीं करेगी. इस तरह की इम्युनिटी सिर्फ एक खास धर्म के लोगों को दी गई.’

अंकुर इस मामले में एक शिकायत पर काम करने वाले विजयपुर के डीएसपी का तबादला कर दिए जाने का उदाहरण देते हैं. और आरोप लगाते हैं कि पुलिस अधिकारियों को गुज्जर-बकरवालों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने के लिए हतोत्साहित किया जा रहा है. वे ऐसे और भी उदाहरण देते हैं.

फंडेड कॉलोनाइज़ेशन और इंड्यूस्ड माइग्रेशन

डेमोग्राफिक बदलाव की बात करने वालों का एक और खास मुद्दा है फंडेड कॉलोनाइज़ेशन. इसका अर्थ है कि बाहरी ज़िलों से आने वाले मुसलमानों को हिंदू बहुल इलाकों में ज़मीन खरीदने के लिए पैसा मुहैया कराया जा रहा है. अंकुर शर्मा आरोप लगाते है कि जम्मू और उसके आसपास मुसलमानों को हिंदू बहुल इलाकों में ज़मीन खरीदने के लिए पैट्रो-डॉलर्स और हवाला से आया पैसा मिल रहा है.

अंकुर शर्मा के मुताबिक यह काम दो तरह से किया जा रहा है. वे कहते हैं, ‘एक तो कुछ एनजीओज़ हैं जो मस्जिदों और मदरसों के ज़रिए मुसलमानों को हिंदू इलाकों में ज़मीन खरीदने के लिए पैसा दे रहे हैं. आप ज़मीन खरीदिए, उन्हें कागज़ात दिखाइए और वे आपको खर्च किए गए पैसे का चालीस फीसदी तक दे देंगे.’

कठुआ के बिलावर इलाके के अनुराग शर्मा इस बारे में कहते हैं कि उन्होंने अपने गांव में पुश्तैनी ज़मीन का एक हिस्सा बेचने के लिए कुछ वेबसाइट्स पर इश्तेहार दिया था और ज़मीन खरीदने के लिए उनके पास आने वाले लगभग सभी फोन मुसलमानों के थे. अनुराग कहते हैं, ‘वे आपसे पैसे का मोलभाव नहीं करते, सीधे पूछेंगे कि मिलिए और सौदा तय कर लीजिए. हिंदुओं के पास इतना पैसा नहीं है कि वे इस तरह बिना मोल-भाव किए ज़मीन खरीद लें.’

‘आप ये बताइए कश्मीर में कौन से मुसलमानों को धर्म के आधार पर मारा जा रहा है? कौन से मुसलमान धर्म के आधार पर कश्मीर छोड़ कर जाएंगे. वे नौकरी के लिए जा सकते हैं, रोज़गार के लिए जा सकते हैं पर रिलीजियस परसीक्यूशन की वजह से कैसे जा सकते हैं? लेकिन सरकार ने इसी आधार पर 200 से ज़्यादा परिवारों को घाटी से लाकर जम्मू में बसा दिया. इन्हें वो स्टेटस दिया गया जो कश्मीरी पंडितों को दिया गया है. यूं तो 90 के दशक से ये लगातार हो रहा है पर पिछले दो सालों का रिकॉर्ड हमारे पास है’ इंड्यूस्ड माइग्रेशन की बात करते हुए अंकुर शर्मा कहते हैं.

कश्मीरी पंडित डॉक्टर अजय चुरुंगू इस बाबत बताते हैं, ‘पिछले कई सालों से इस तरह के माइग्रेशन के लिए रजिस्ट्रेशन बंद थे. घाटी के हालात को ठीक बताया जा रहा था. कश्मीरी पंडितों को फिर से घाटी में बसाने की बातें हो रही थीं. लेकिन महबूबा मुफ्ती की सरकार ने आते ये रजिस्ट्रेशन फिर खोल दिए. बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद जब हालात खराब हुए थे तब सरकारी नौकरियों के चलते घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडित जम्मू वापस आ गए थे. उस दौरान उनकी तनख्वाहें रोक दी गई थीं. लेकिन मुसलमानों को यहां बसाने के लिए सरकार ने कहा कि घाटी में हालात खराब होने के कारण और नए विस्थापन होने की संभावना है, जिसके चलते रजिस्ट्रेशंस एक बार फिर शुरू किए जाएंगे.’

रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों का जम्मू में बसना

‘जब राज्य में आर्टिकल 370 है तो ये लोग यहां कैसे रह रहे हैं?’ अंकुर पूछते हैं और खुद ही जवाब देते हैं, ‘इन्हें यहां की सरकार और मुसलमानों का इंटेलेक्चुअल और फिज़िकल सपोर्ट है. जैसे ही हम इलीगल इमीग्रेंट्स को बाहर निकालने की बात करते हैं ये तुरंत वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजीज़ की बात करने लगते हैं, स्टेट सब्जेक्ट लॉ 1957 में बना और ये लोग (पश्चिमी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी) 1947 के बाद से यहां रह रहे हैं और भारत के नागरिक हैं. पर स्टेट सब्जेक्ट लॉ में इन्होंने 1930 के आस-पास की डेटलाइन रख ली कि उस समय से यहां रह रहे लोग ही स्टेट सब्जेक्ट हो सकते हैं. इनके पास आज भी राज्य में मतदान करने का अधिकार नहीं हैं जबकि हालात ये हैं कि रोहिंग्या तक यहां फर्ज़ी वोटर आइडी बनवाने लगे हैं.’

अंकुर आगे कहते हैं, ‘और आपको रोहिंग्या चाहिए ही तो उन्हें जम्मू में क्यों रखा गया है, कश्मीर में क्यों नहीं रख लिया जाता? ’ इसके अलावा अंकुर राज्य सरकार पर इस्लामिक होने का आरोप लगाते हैं. वे कहते हैं कि राज्य में सिख, बौद्ध और ईसाइयों के अलावा हिंदू अल्पसंख्यक हैं लेकिन अल्पसंख्यक आयोग न होने की वजह से अल्पसंख्यकों को मिलने वाले सभी लाभ मुसलमानों को मिलते रहे हैं जो कि राज्य में बहुसंख्यक हैं. वे यह भी कहते हैं कि संविधान के आर्टिकल 370 को इस्तेमाल करके जम्मू-कश्मीर के रूप में एक थियोक्रेटिक (धर्म आधारित) राज्य बना दिया गया है.

पिछले कुछ समय से जम्मू में रहने वाले हिंदू यहां रह रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों का मुखर विरोध करने लगे हैं. विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठन भी इस विरोध में हिस्सा लेते रहे हैं. जम्मू के पीरमिट्ठा इलाके के राकेश शर्मा इस बारे में कहते हैं, ‘हम डोगरे काफी एकोमोडेटिंग हैं. कश्मीरी पीड़ित आए हमने उनसे अपना शहर, अपने रिसोर्सेज़ साझा किए. गुज्जर यहां आकर बसे, हमने शिकायत नहीं की. लेकिन रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को यहां क्यों रहने दिया जा रहा है? होली पर इस बार हमारे लड़कों ने इसके खिलाफ रैली निकाली. कश्मीरी अपनी दीवारों पर लिखते हैं गो इंडिया गो बैक. हम लिख रहे हैं गो रोहिंग्या गो बैक, और आपका मीडिया हम डोगरों को बदनाम करने पर लगा है कि हम कम्युनल हैं.’

घाटी के अलगाववादी अपनी तहरीक को जम्मू तक लाने की कोशिश कर रहे हैं

घाटी से बाहर बढ़ती मुसलमानों की संख्या को लेकर जम्मू और अन्य हिंदू बहुल इलाकों में हो रही एक और चर्चा यह है कि घाटी के अलगाववादी मुसलमानों को घाटी के बाहर बसा कर या दूसरे हथकंडे अपनाकर अपनी तहरीक को जम्मू तक लाना चाहते हैं. रोहित खजूरिया इस बारे में कहते हैं, ‘रसाना में जो हुआ आपने देखा. गुज्जर बच्ची के साथ जो हुआ उसे इस्तेमाल करते हुए वे गुज्जरों को डोगरों के खिलाफ भड़काकर अपनी तरफ मोड़ना चाहते हैं. गुज्जरों ने अब तक कभी जम्मू-कश्मीर में आज़ादी नहीं मांगी. कश्मीर घाटी के लोग कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें डोगरों से डरा दें तो इनके पास उनके पीछे खड़े होने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा.’

गुज्जर परिवार से ताल्लुक रखने वाले ज़ुल्करनैन इस कहानी को पूरी तरह नकार देते हैं. पेशे से वकील ज़ुल्करनैन कहते हैं, ‘पहली बात तो गुज्जर हमेशा से खुद को भारत का नागरिक मानता रहा है. जानवरों के साथ एक जगह से दूसरी जगह घूमती रहने वाली इस कौम को न तो पाकिस्तान चाहिए ना ही आज़ादी. रही बात कश्मीरियों के पीछे खड़े होने की, तो ये दोनों कौमें बहुत अलग हैं. इनका एक साथ खड़ा होना आसान नहीं है.’ ज़ुल्करनैन बताते हैं कि पिछले 20 सालों में जम्मू शहर फैला है और इसके आस-पास मुसलमान बस्तियां बढ़ी हैं. लेकिन वे कहते हैं कि इसे हिंदुओं के खिलाफ साज़िश बताना, कुछ लोगों की राजनीति का ज़रिया है.

जम्मू के प्रतिष्ठित वकील और बार एसोसिएशन के सदस्य शेख शकील भी इस साज़िश को सिरे से नकारते हैं. वे कहते हैं, ‘जम्मू एक फर्टाइल हिंदू कॉन्स्टीट्सीयुएंसी है. बीजेपी को लगता है ये उसके लिए सोने की खान है. वो डेमोग्राफिक चेंज और रोहिंग्या का डर दिखाकर हिंदुओं के वोट लेना चाहते हैं. वो अगले चुनावों तक यही राग अलापने वाले हैं.’

वे कहते हैं, ‘जम्मू एक छोटा सा इलाका है, और शिक्षा और रोज़गार के लिए आने वाले लोग जब शहर के भीतर जगह नहीं पाएंगे तो बाहर की ओर ही बसेंगे. वैसे भी अल्पसंख्यकों की मानसिकता होती है कि वे इकट्ठे रहना चाहते हैं. मुसलिम बहुल इलाकों में अगर ज़मीन मंहगी भी मिलेगी तो भी मुसलमान वहीं जाकर सैटल होगा. अब बाहर बसे मुसलमानों को ये कहकर ब्रांड किया जा रहा है कि इन्होंने हिंदू इलाकों को घेर लिया है.’

वे रसाना बलात्कार का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, ‘इस अपराध को बीजेपी और उसके समर्थकों ने मज़हबी रंग दे दिया. उसके बाद पूरा जम्मू, कठुआ, सांबा और यहां तक कि हमारा बार असोसिशन भी धार्मिक आधार पर दो हिस्सों में बंट गया. इससे बुरा क्या हो सकता है!’ वे हिंदू एकता मंच के बारे में कहते हैं कि ये भी आरएसएस का ही एक हिस्सा है जिसे कठुआ, जम्मू और बाकी हिंदू इलाकों में सांप्रदायिकता फैलाने के लिए फौरन तैयार किया गया है.

शकील मानते हैं कि कश्मीर में चल रही आज़ादी की हवा का असर जम्मू डिवीजन के मुस्लिम बहुल इलाकों पर होता है. वे बताते हैं, ‘गिलानी की हड़ताल की कॉल पर भद्रवाह और किश्तवाड़ जैसे इलाकों में मुसलमान अपनी दुकानें बंद करते हैं. पर जम्मू, कठुआ, सांबा और ऊधमपुर में ऐसा नहीं होता.’ लेकिन यहां जब उनसे यह सवाल किया जाता है कि अगर जम्मू, कठुआ, सांबा और ऊधमपुर में भी मुस्लिम आबादी बढ़ जाएगी तो क्या यहां भी गिलानी की आवाज़ पर हड़तालें नहीं होने लगेंगी तो वे इसका ठीक जवाब नहीं खोज पाते.

हालांकि वे ये मानते हैं कि सूबे में हिंदू, मुसलमानों के बीच दूरी बढ़ती जा रही है. पिछले कई दशकों से सूबे में सत्ता का केंद्र कश्मीर रहा है और शकील इसे भी जम्मू में हिंदुओं के बढ़ते असंतोष की वजह बताते हैं. वे सत्तारूढ़ बीजेपी पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने भी सत्ता में आने के बाद जम्मू की इस शिकायत को दूर करने की कोई कोशिश नहीं की कि सूबे की अधिकतर योजनाएं घाटी को ध्यान में रखकर ही बनती रही हैं, अधिकतर पैसा कश्मीर पर खर्च होता रहा है.

जम्मू के बाहर फॉरेस्ट लैंड पर बसे मुस्लिम बहुल इलाकों सिदरा, भटिंडी और सुंजवां की बाबत वे कहते हैं, ‘ये सब कंस्ट्रक्शन एक रात में वहां नहीं हुआ. अगर इतने बड़े लेवल पर वहां एनक्रॉचमेंट हुआ है तो स्टेट ज़िम्मेदार है न. क्यों वे सरकार में होते हुए भी इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करते. क्यों? क्योंकि उन्हें अपनी कुर्सियां बचानी हैं और सिर्फ सियासत करनी है.’

शेख शकील हों या ज़ुल्करनैन, जम्मू के मुसलमान आरोप लगाते हैं कि डेमोग्राफिक चेंज का हौआ जम्मू की शांति को खत्म करने और यहां सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए तैयार किया गया है. ठीक इसी तरह तमाम हिंदुओं से बात करने पर आप सुनेंगे कि इसे सरकार, घाटी के मुसलमान, और पाकिस्तान मिलकर अंजाम दे रहे हैं. इसके अलावा एक कहानी कश्मीरी पंडितों के खिलाफ भी सुनी जा रही है.

कश्मीरी पंडित चाहते हैं कि जम्मू के डोगरे मुसलमानों से उनका बदला लें

जम्मू के हिंदू डोगरों और मुसलमानों की बैठकों में यह चर्चा भी सुनी जा रही है कि डेमोग्राफिक चेंज के भूत को कश्मीरी पंडितों ने जिलाया है ताकि वे डोगरों को डरा कर उन्हें मुसलमानों से अपना बदला लेने के लिए इस्तेमाल कर सकें. रूपनगर इलाके में रहने वाले आदित्य जमवाल और उनके दोस्त इमरान से बात करने पर वे कहते हैं कि कश्मीरी पंडितों को घाटी के मुसलमानों से नफरत है क्योंकि उनकी वजह से उन्हें अपने घर अपनी ज़मीनें छोड़ने पड़े.

जम्मू विश्वविद्यालय से एमए कर रहे जमवाल कहते हैं, ‘पिछले तीस साल उन्होंने खुद को संभालने में लिए. अब वे अपनी लड़ाई लड़ना चाहते हैं लेकिन उनके बच्चे तो सब बाहर सैटल हो गए हैं. ऐसे में वो चाहते हैं कि डोगरे उनकी लड़ाई लड़ें. इसीलिए वो लोग भी डेमोग्राफिक चेंज की आड़ में एक्टिव हो गए हैं.’ वे उदाहरण देते हैं कि डेमोग्राफिक चेंज की लड़ाई लड़ने वाले अंकुर शर्मा के पीछे उनके सलाहकार कश्मीरी पंडित डॉक्टर अजय चुरुंगू हैं. यहां आदित्य ये भी समझाने की कोशिश करते हैं कि जिस तरह कश्मीरी मुसलमान गुज्जरों को खुद से नीचा समझते हैं वहीं कश्मीरी पंडितों की नज़र में डोगरा, डंगर (जानवर) रहे हैं.

डॉक्टर चुरुंगू से बात होने पर वे इस कहानी को वापस 1990 के दशक में ले जाते हैं. वे कहते हैं, ‘कश्मीर घाटी से हिंदुओं की रिलिजियस क्लीज़िंग के बाद ही जम्मू को हिंदू बहुल इलाके से मुस्लिम बहुल बनाने की तैयारी शुरू हो गई थी. हम पंडित इस बात को समझ सकते हैं क्योंकि हमने देखा है कि इस्लामिक फंडामेंटलिज़्म कैसे काम करता है. हमने ग़ौर किया कि हमारे घाटी से निकलने के बाद योजनात्मक तरीके से घाटी और बाहर के मुसलमानों ने जम्मू में ज़मीनें खरीदना शुरू कर दिया.’

डॉक्टर चुरुंगू भी अंकुर शर्मा की तरह आरोप लगाते हैं कि मुसलमानों को जम्मू में बसाने के लिए पैट्रो डॉलर्स का इस्तेमाल हुआ. इस दावे के पीछे सबूतों की बात करने पर वे कहते हैं कि ‘हमारे पास ऐसे कागज़ात तो नहीं हैं जो हमारे दावे को साबित कर सके लेकिन आप इन इलाकों में बनी बड़ी-बड़ी मस्जिदें देखिए और पूछिए कि इनके लिए पैसा कहां से आया. किसी एजेंसी ने ये जांच नहीं की कि इतनी बड़ी संख्या में इतनी मस्जिदें बनाने के लिए पैसा कहां से आ रहा है. जम्मू में रेलवे स्टेशन के सामने ही देख लें एक बहुत बड़ी मस्जिद है जबकि उस इलाके में कोई खास मुस्लिम जनसंख्या नहीं है.’ इसके अलावा वे कहते हैं कि आप पुलिस से पता करिए, इंटेलिजेंस एजेंसीज़ से पूछिए, आर्मी से पूछिए कि हालात क्या हैं. वे सुंजवां हमले का जिक्र करते हैं और वहां बढ़ी मुसलिम आबादी को इस हमले से जोड़ते हैं.

जम्मू के आस-पास बसी मुस्लिम कॉलोनियों के बारे में डॉक्टर चुरुंगू कहते हैं, ‘इनमें से तमाम कॉलोनियों में घर खाली पड़े हैं. जब भी जम्मू में मुसलमानों की ताबाद बढ़ानी होगी, इन लोगों (कश्मीरी मुसलमानों) के पास इतने घर हैं कि एक बार में दस लाख तक जनसंख्या को रातों रात यहां लाकर रखा जा सकता है. कम से कम 45 मुस्लिम कॉलोनीज़ पिछले बीस सालों में यहां तैयार हो चुकी हैं. हमने यहां लगातार ‘एक्सक्लूसिव मुस्लिम कॉलोनी’ में प्रॉपर्टी के एडवर्टीज़मेंट देखे हैं.’

इसके अलावा वे पिछली जनगणनाओं के सही होने पर भी सवाल उठाते हैं. वे आरोप लगाते हैं कि पिछली जनगणना के आंकड़ों में भी हेरफेर किया गया है ताकि जनसांख्यिकी बदलाव को छुपाया जा सके. वे कहते हैं, ‘आप जनगणना के आंकड़ों का मिलान राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र या गैस कनेक्शनों की संख्या से कराइए, आपको पता चल जाएगा कि कितना अंतर है.’ इन सब गड़बड़ियों के लिए वे सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

अगर हम इन कहानियों पर न जाकर सिर्फ हकीकत देखें तो रौशनी एक्ट स्कैम एक हकीकत है. जम्मू की फॉरेस्ट लैंड पर बनी सिदरा और भटिंडी जैसी गैर-कानूनी मुस्लिम बहुल कॉलोनियां हकीकत हैं. जम्मू की ज़मीन पर रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों की बसावट एक सच्चाई है. इसी तरह हिंदू एकता मंच जैसी संस्था का बनना और जम्मू में हिंदू-मुसलमानों के बीच बढ़ता एक-दूसरे का डर भी सच्चाई है.

चाहे जम्मू की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर लगे इलाके अरनिया या आरएसपुरा के डोगरे हों या फिर कठुआ के बिलावर या जम्मू के रूपनगर के, हर जगह यह डर फैला हुआ कि यहां आने वाले वक्त में हिंदू और मुसलमानों के बीच कभी-भी दंगे की आग भड़क सकती है. कश्मीरी पंडितों का विस्थापन देख चुके डोगरों में कमज़ोर पड़ जाने का डर इस बात से समझा जा सकता है कि इनमें से कई अपने बेटों को जम्मू से बाहर चंडीगढ़ या अन्य भारतीय शहरों में ज़मीनें खरीदने की सलाह देने लगे हैं. लेकिन इस डर का दूसरा असर यह भी है कि डोगरे ‘आने वाले खतरे’ के लिए खुद को तैयार करने लगे हैं. कुल 26 साल के आदित्य जमवाल कहते हैं, ‘2008 अमरनाथ लैंड रो के वक्त हम छोटे थे तब भी हमने उन लोगों के साथ लोहा लिया था. इस बार अगर हमारे साथ ग़लत हुआ तो हमने चूड़ियां नहीं पहनी हैं. डोगरा मार्शल कॉम है. हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगे.’