भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येद्दियुरप्पा कर्नाटक के 23वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ तो ले चुके हैं, लेकिन वे इस पद पर बने रह पाएंगे या नहीं यह पुख़्ता तौर पर कोई नहीं कह सकता. हालांकि राज्यपाल वजूभाई वाला ने उन्हें बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय दिया है. वे इस समयावधि के बीच कभी भी विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर बहुमत साबित कर सकते हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आज अगर विपरीत फैसला दिया तो उन्हें इससे पहले पद छोड़ना भी पड़ सकता है. या फिर कोई तीसरी संभावना भी बन सकती है कि भाजपा के ही कुछ विधायक कांग्रेस-जनता दल-सेकुलर गठबंधन की तरफ़ खिसक जाएं और उसकी सरकार बन जाए.

यानी स्थिति हर संभावना के लिए पूरी तरह खुली है. इसकी वजह यह है कि कर्नाटक के मतदाताओं ने इस बार राजनेताओं को त्रिशंकु विधानसभा की सौगात दी है. लोगों ने भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनाया और 104 सीटें दीं, लेकिन सरकार बनाने लायक 113 सीटों का बहुमत नहीं दिया. कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया लेकिन उसे ठीक-ठाक तौर पर 78 सीटें देकर इस लायक भी बनाया कि वह प्रभावी विपक्ष या मौका लगे तो गठबंधन सरकार का हिस्सा भी बन सके. तीसरी पार्टी जेडीएस को भी 38 सीटें देकर मतदाताअों ने उसके लिए किंगमेकर या ख़ुद किंग बनने की संभावनाएं खोल दी हैं.

हालांकि अभी तो येद्दियुरप्पा के सर पर ताज रखा जा चुका है. सो ऐसे में सवाल यह है कि एक क्लर्क से तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे येद्दि (येद्दियुरप्पा का लोकप्रिय नाम) इस ताज को क़ायम रख पाएंगे या नहीं. रख पाएंगे तो कैसे और नहीं तो क्यों?

1. येद्दियुरप्पा किसी तरह बहुमत साबित कर लें

येद्दियुरप्पा मुख्यमंत्री कैसे बने रह सकते हैं, इस पर बात करने से पहले विधानसभा के आंकड़ों पर एक नजर डाल लेना जरूरी है. कर्नाटक विधानसभा यूं तो 225 सदस्यों वाली है. लेकिन इनमें एक सदस्य राज्यपाल द्वारा नामित होता है. इसलिए चुने हुए विधायकों की संख्या 224 हुई. इस बार दो सीटों पर चुनाव टल गया था. इसलिए सदस्य संख्या 222 रह गई. इसमें भी जेडीएस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी दो सीटों (चन्नापटना और रामनगर) से चुने गए हैं. बतौर विधायक शपथ लेते ही उन्हें एक सीट छोड़नी पड़ेगी. इस तरह सदन की संख्या घटकर 221 ही रह जाएगी. इनमें एक विधायक प्रोटेम स्पीकर (अस्थायी अध्यक्ष) बनाए जाएंगे जो विश्वास मत के दौरान सामान्य स्थिति में वोट नहीं देंगे. नियमानुसार वे तभी वोट दे सकते हैं जब दोनों तरफ के विधायकों के वोट बराबर हो जाएं. उस स्थिति में अस्थायी अध्यक्ष का वोट निर्णायक होगा. यानी सदन की प्रभावी सदस्य संख्या 220 होगी जिसमें 111 सदस्यों के साथ बहुमत साबित किया जा सकेगा.

मौज़ूदा स्थिति यह बताई जा रही है कि कांग्रेस के 78, जेडीएस के 37 और बहुजन समाज पार्टी का एक विधायक (कुल 116) कुमारस्वामी के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ हैं. जबकि येद्दियुरप्पा को एक निर्दलीय विधायक ने समर्थन देने की घोषणा कर दी है. इस तरह भाजपा के पास 105 विधायकों का समर्थन कहा जा रहा है. यहां ‘कहा जा रहा है’ और ‘बताई जा रही है’ जैसे वाक्यांशों के इस्तेमाल की वज़ह यह है कि ये तमाम स्थितियां अनिश्चित हैं. मसलन- निर्दलीय विधायक- आर शंकर के बारे में ही खबर आ रही है कि वे बुधवार सुबह भाजपा के साथ दिखे तो शाम को कांग्रेस के खेमे में. फिर भी इन्हीं स्थितियों को फ़ौरी तौर पर सच मानें तो भाजपा को सदन में बहुमत साबित करने के लिए अभी छह विधायकों के समर्थन की और ज़रूरत है जिनका इंतज़ाम उसे जितनी जल्दी हो सके करना होगा.

हालांकि इसी बीच दो ख़बरें और हैं. एक हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक कि बेंगलुरु के एक होटल में बुधवार को जेडीएस विधायक दल की बैठक हुई. इसमें दो विधायक राजा वेंकटप्पा नायक और वेंकट राव नादगौड़ा शामिल नहीं हुए. इन दोनों के अलावा कांग्रेस के विधायक- राजशेखर पाटिल, नागेंद्र और आनंद सिंह का भी अब तक कोई पता नहीं चला है. दूसरी ख़बर ये है कि विधानसभा सचिवालय ने आठ बार के विधायक और कांग्रेस के नेता आरवी देशपांडे को अस्थायी अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव राज्यपाल के पास भेजा है. सदन का सत्र बुलाए जाते ही वे नए विधायकों को शपथ दिलाएंगे. कानून और संविधान के जानकारों के मुताबिक अस्थायी अध्यक्ष चाहें तो स्थायी अध्यक्ष-उपाध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं या फिर वे सीधे सरकार से बहुमत साबित करने को भी कह सकते हैं.

दोनों स्थितियों में येद्दियुरप्पा के बहुमत का परीक्षण हो जाएगा. अब यहां पर स्थिति यह बनती है कि सदन की सदस्यता की शपथ लेने से पहले ही अगर कांग्रेस-जजेडीएस के करीब 12-13 विधायक अनुपस्थित रह जाते हैं तो उनके ख़िलाफ़ किसी तरह की कार्रवाई नहीं हो सकेगी. सदन की प्रभावी सदस्य संख्या तब 207 या 208 रह और येद्दि 105 विधायकों के साथ ही बहुमत साबित कर देंगे. ऐसा वे 2008 में ‘ऑपरेशन कमल’ के जरिए कर चुके हैं. इस बार भी तैयारी वैसी ही दिख रही है. इसके अलावा उनके लिए दूसरा विकल्प नहीं दिखता.

2. जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बन जाए

जेडीएस कांग्रेस गठबंधन भी राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा कर चुका है. वह अपने समर्थक विधायकों की सूची भी उन्हें सौंप चुका है. हालांकि राज्यपाल ने पहले येद्दियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. लिहाज़ा अब ख़बर है कि भाजपा की संभावित ख़रीद-फ़रोख़्त से अपने विधायकों को बचाने के लिए दोनों पार्टियों ने उन्हें पहले बेंगलुरु के बाहरी इलाके में स्थित खूबसूरत ईगलटन रिज़ॉर्ट (कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार इसके मालिक हैं) में पहुंचाया गया. फिर सूत्र बताते हैं कि यहां से भी हटाकर जेडीएस के विधायकों को केरल के कोच्चि और कांग्रेस विधायकों को हैदराबाद ले जाया गया है.

लिहाज़ा दूसरी संभावना यही बनती है कि जेडीएस-कांग्रेस के जितने भी विधायक (क्योंकि पांच-छह अब भी लापता हैं) यहां पहुंचे हैं वे आख़िरी मौके तक यहीं टिके रहें. फिर जब सदन की कार्यवाही शुरू हो तब भी गठबंधन के साथ रहें. उसी स्थिति में येद्दियुरपा की जगह कुमारस्वामी के मुख्यमंत्री बनने की सूरत बनेगी.

3. सुप्रीम कोर्ट राज्य की सरकार बनाए या बचाए

कर्नाटक का मामला सुप्रीम कोर्ट में है. आज शुक्रवार 18 मई को इस पर सुनवाई है. येद्दियुरप्पा को सरकार बनाने के लिए बुलाने के राज्यपाल वजूभाई वाला के फैसले को कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन ने शीर्ष अदालत में चुनौती दी है. शीर्ष अदालत इससे पहले ऐसे मामलों में यह परिभाषित कर चुकी है कि राज्यपाल किन-किन स्थितियों में अपने विवेक से किस-किस तरह के फ़ैसले ले सकते हैं. लिहाज़ा इस बार अदालत उन्हीं फैसलों की कसौटी पर राज्यपाल वजूभाई के निर्णय की परख करेगी. इसीलिए उसने भाजपा से समर्थन देने वाले विधायकों की वे चिट्ठियां भी करने को कहा है जो येद्दियुरप्पा ने राज्यपाल को सौंपी हैं और जिनके आधार पर उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाया गया.

मौज़ूदा परिस्थितियों देखें तो यह संभावना कम ही लगती है कि येद्दियुरप्पा शुक्रवार की सुबह 10.30 बजे तक जब मामले की सुनवाई शुरू होगी शीर्ष अदालत में 105 के अलावा किन्हीं और विधायकों के समर्थन की चिटि्ठयां दे पाएंगे. ऐसे में अदालत दो विकल्प आजमा सकती है. पहला- चूंकि येद्दियुरप्पा मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं ऐसे में उन्हें जल्द से जल्द बहुमत साबित करने के लिए कहा जाए. राज्यपाल ने उन्हें 15 दिन का वक़्त दिया है, अदालत इस समय-सीमा को घटाकर एक सप्ताह, तीन दिन, 48 या 24 घंटे भी कर सकती है.

अदालत के लिए दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि वह राज्यपाल के फैसले को ही पलट दे. लेकिन यह तभी हो सकेगा जब वह भाजपा द्वारा पेश की गई विधायकों के समर्थन की चिटि्ठयों से संतुष्ट न हो. अलबत्ता फिर भी राज्यपाल के फैसले के पलटे जाने की संभावना कम ही लगती है. ख़ास तौर पर इस तथ्य के मद्देनज़र कि शीर्ष अदालत ने बुधवार-गुरुवार की रात चली विशेष सुनवाई के बावज़ूद येद्दियुरप्पा को शपथ दिलाने की प्रक्रिया पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था. सो ऐसे में संभावना यह भी है कि मामले के अध्ययन के नाम पर अदालत सुनवाई आगे भी बढ़ा सकती है. ऐसे में येद्दियुरप्पा को अपने आप ही बहुमत जुटाने के लिए कुछ और वक़्त मिल जाएगा.

चलते-चलते

कर्नाटक के मौज़ूदा राज्यपाल वजूभाई वाला 1996 में गुजरात भाजपा के अध्यक्ष हुआ करते थे. उस दौरान केंद्र में प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की सरकार थी. कर्नाटक के वही दिग्गज देवेगौड़ा जो आज अपनी पार्टी जेडीएस का कांग्रेस के साथ गठबंधन कराने के हिमायती हैं और जिनके पुत्र कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने के प्रस्ताव पर इस गठजोड़ ने मुहर लगा दी है. इन्हीं देवेगौड़ा ने प्रधानमंत्री रहते गुजरात की भाजपा सरकार बर्ख़ास्त कर दी थी क्योंकि उस वक़्त तत्कालीन भाजपाई शंकरसिंह वाघेला अपने समर्थक विधायकों के साथ बागी हो गए थे.

किस्सा 22 साल पुराना है लेकिन आज उतना ही मौज़ूं भी.