कर्नाटक चुनाव का नतीजा आने और उसके बाद राज्यपाल द्वारा बीएस येद्दियुरप्पा को सरकार बनाने का न्योता दिए जाने के विवाद के बीच यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि कर्नाटक में आखिर जनादेश मिला किसे है? इस सवाल को कुछ यूं भी पूछा जा सकता है कि जनादेश किस पार्टी के खिलाफ है?

यह तय है कि जनादेश कांग्रेस के लिए नहीं था. यह पार्टी सत्ता में थी और 224 विधानसभा सीटों में से 78 ही जीत पाई है. ध्यान देने वाली बात है कि कांग्रेस सरकार की कैबिनेट के आधे से ज्यादा सदस्यों को हार का सामना करना पड़ा है. इसका मतलब है कि जनादेश सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ था. इसी तरह से यह जनादेश जेडीएस के लिए भी नहीं था, जिसने राज्य में 38 सीटों (बसपा की एक सीट मिलाकर) पर जीत दर्ज की है. कर्नाटक का यह जनादेश भाजपा के लिए भी नहीं माना जा सकता क्योंकि 104 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद वह बहुमत नहीं पा सकी.

हमारे यहां व्यवस्था है कि जो पार्टी बहुमत यानी सदन की कम से कम आधी सीटें जीत लेती है, उसे सरकार बनाने का मौका मिलता है. कर्नाटक के इस चुनाव में बहुमत का आंकड़ा 112 सीटों (दो सीटों पर चुनाव नहीं हुए, अगर होते तो यह आंकड़ा 113 होता) का था. अब अगर किसी पार्टी को बहुमत न मिले और पार्टियों के बीच कोई चुनाव पूर्व गठबंधन न हो तो सवाल उठता है कि ऐसे में सरकार बनाने का न्योता किसे मिलना चाहिए. इस सवाल का जवाब दो बातों पर निर्भर करता है. पहली – पार्टियों द्वारा गठबंधन करके बहुमत साबित करने की क्षमता पर या फिर सदन में इतने सदस्यों की अनुपस्थिति सुनिश्चित करवाने की क्षमता पर जिसके बाद बहुमत के लिए किसी पार्टी या गठबंधन पास उपलब्ध सीटों की संख्या पर्याप्त साबित हो. दूसरी – राज्यपाल के विवेक पर.

कर्नाटक के मामले में राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के नेता बीएस येद्दियुरप्पा को सरकार बनाने का न्योता दिया था और वे कल मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले चुके हैं. इससे पहले भाजपा नेता ने राज्यपाल से मिलकर उनके सामने सरकार बनाने का दावा पेश किया था. इसका मतलब है कि उन्होंने यह भरोसा दिया था कि वे सदन में बहुमत साबित करेंगे. वहीं कांग्रेस ने सरकार बनाने के लिए जेडीएस को समर्थन दिया था और इसका मतलब था कि इन पार्टियों का चुनाव के बाद गठबंधन हुआ है. इनकी संयुक्त सीटों की संख्या - 116 बहुमत के आंकड़े से ऊपर थी, इसके बावजूद राज्यपाल ने सरकार बनाने के इस गठबंधन के दावे की अनदेखी कर दी. इसके खिलाफ फिर कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट में गई और आज इस मामले की अगली सुनवाई होगी.

अदालत चाहे जो फैसला करे, इस पूरे घटनाक्रम के दो पक्ष काफी बेचैनी पैदा करने वाले हैं. पहला तो यही कि राज्यपाल ने कांग्रेस-जेडीएस के सरकार बनाने के दावे को सीधे-सीधे खारिज कर दिया और वहीं येद्दियुरप्पा को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का वक्त दे दिया. ऐसा करके राज्यपाल ने कोई कायदा तो नहीं तोड़ा, लेकिन इससे यह जरूर साबित हुआ कि उन्होंने एक पार्टी को फायदा पहुंचाने की गरज से अपने ‘विवेक’ का इस्तेमाल किया है. यह पहले भी हो चुका है (और शायद आगे भी होगा), लेकिन राज्यपाल से उम्मीद की जाती है कि वे राजनीति से ऊपर उठकर कामकाज करेंगे. खैर, जब-जब ऐसा न हो तब-तब इस बात को याद करना जरूरी है.

दूसरा पक्ष यह है कि अगर तुलनात्मक रूप से बात करें तो भाजपा के पास सरकार बनाने के लिए बाकियों से ज्यादा जनादेश है. कांग्रेस ने 38 सीटें जीतने वाली पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री बनने के लिए समर्थन दिया है और यह सीधे-सीधे जनादेश का अपमान है. यहां एक बार फिर कहा जाना चाहिए कि यह भी पहली बार नहीं हुआ है (यह आगे भी शायद होता रहे).

कर्नाटक की राजनीति के इस पूरे अध्याय को देखें तो यह बात साफ हो जाती है कि हमारे यहां सभी पार्टियों के बीच, चाहे वे किसी भी विचारधारा की हों, यह सहमति है कि अगर साध्य हासिल हो जाए तो हर प्रकार के साधन का इस्तेमाल जायज है. (स्रोत)