उच्चतम न्यायालय के आदेश पर कर्नाटक की नई बीएस येद्दियुरप्पा सरकार को आज शाम चार बजे विधानसभा में बहुमत साबित करना है. शीर्ष अदालत ने इस कार्यवाही का सीधा प्रसारण करने का भी आदेश दिया है. इससे पहले राज्यपाल ने येद्दियुरप्पा को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का वक्त दिया था. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) यह दावा कर रही है कि येद्दियुरप्पा सरकार बहुमत साबित कर देगी. दूसरी तरफ कांग्रेस और जनता दल सेकुलर (जेडीएस) का दावा है कि ऐसा नहीं हो पाएगा और येद्दियुरप्पा को इस्तीफा देना पड़ेगा.

भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं और पदाधिकारियों से बातचीत करने पर पता चलता है कि कर्नाटक में भाजपा सरकार बने रहना पार्टी के लिए तो महत्वपूर्ण है ही, लेकिन खुद 75 पार के बीएस येद्दियुरप्पा के लिए यह कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. उनके मुताबिक अगर कल बीएस येद्दियुरप्पा बहुमत साबित करने में नाकाम रहते हैं तो यह उनके राजनीतिक जीवन के पटाक्षेप की शुरुआत होगी.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों में भाजपा का नेतृत्व आने के बाद यह तय हो गया था कि सरकार में बने रहने के लिए अधिकतम उम्र सीमा 75 साल होगी. सरकार बनते वक्त इससे अधिक उम्र के कुछ नेताओं को इसलिए मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली. अगर आपको याद हो तो नजमा हेपतुल्ला और कलराज मिश्र जैसे केंद्रीय मंत्रियों ने इस उम्र सीमा को पार करने के बाद अपने पद से इस्तीफा भी दिया. यहां तक कि गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने भी अपने इस्तीफे में इसी वजह का जिक्र किया.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘ऐसे में 75 पार के येद्दियुरप्पा के लिए इस नियम को ताक पर रखकर उन पर दांव लगाने का फैसला भाजपा, नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इसलिए किया कि कर्नाटक में पार्टी के पास जितने चेहरे थे, उनमें सबसे प्रभावी येद्दियुरप्पा को माना जाता है. लेकिन पार्टी द्वारा पूरी कोशिश करने के बावजूद उसे बहुमत नहीं मिल पाया. येद्दियुरप्पा लिंगायत समाज से हैं लेकिन, इस समुदाय का भी पूरा वोट भाजपा को नहीं मिला. इस समुदाय के कई उम्मीदवार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत गए. इससे येद्दियुरप्पा के प्रति भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व में एक असंतोष का भाव है.’

भाजपा के कई नेताओं की बातों से यह संकेत मिलता है कि जितना सहयोग पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के स्तर पर हो सकता था, उससे अधिक सहयोग किया गया लेकिन येद्दियुरप्पा भाजपा को कर्नाटक में जिता नहीं पाए. कुछ का तो यह भी दावा है कि आखिरी मौके पर येद्दियुरप्पा की पसंद के हिसाब से 17 उम्मीदवारों के नाम बदले गए और इनमें से अधिकांश चुनाव हार गए.

इस बारे में बात करने पर पार्टी के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी कहते हैं, ‘मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके पास पार्टी में कम से कम कर्नाटक के अंदर खुद को सबसे उपयोगी साबित करने का एक और मौका है. अगर वे कांग्रेस के लिंगायत विधायकों को विधानसभा में वोटिंग न करने के लिए मना लेते हैं और अपनी सरकार बचा लेते हैं तब तो वे निश्चित तौर पर कर्नाटक भाजपा के सबसे ताकतवर नेता बने रहेंगे. लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है और कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस की सरकार बन जाती है तो फिर कर्नाटक के लिए भाजपा की जो भावी रणनीति होगी उसमें येद्दियुरप्पा की कोई खास भूमिका नहीं रहेगी.’

वे आगे कहते हैं, ‘जहां तक मेरी सूचना है, येद्दियुरप्पा धर्मगुरुओं और समाज के सम्मानित नेताओं के जरिए कांग्रस के लिंगायत विधायकों को मनाने की कोशिश कर रहे हैं. इस समाज के कुछ धर्मगुरुओं ने शायद इन विधायकों से बात भी की है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहुमत साबित करने का वक्त कम कर देने की वजह से अब पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता कि येद्दियुरप्पा अपनी इस कोशिश में कितना कामयाब हो पाएंगे.’

कुछ दूसरे नेताओं से बात करने पर पता चलता है कि कर्नाटक में येद्दियुरप्पा और केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार के खेमों में भाजपा बंटी हुई है. ऐसे में अगर येद्दियुरप्पा अपनी सरकार नहीं बचा पाते हैं तो अनंत कुमार खेमा मजबूत हो जाएगा. भाजपा के अंदर और बाहर अधिकांश लोगों का मानना है कि कांग्रेस के समर्थन से अगर जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी की सरकार बनती भी है तो वह बहुत दिन नहीं चलेगी. ऐसे में अगर कर्नाटक भाजपा में येद्दियुरप्पा कमजोर होंगे तो इसका सबसे अधिक फायदा अनंत कुमार को मिलेगा. इस चुनाव में जो स्थिति बनी है उसमें रेड्डी बंधु भी अनंत कुमार के ज्यादा करीब आए हैं. अगर येद्दियुरप्पा कमजोर होते हैं और अनंत कुमार मजबूत होते हैं तो इसमें ताकतवर रेड्डी बंधुओं का भी फायदा है.

कुल मिलाकर स्थिति यह दिख रही है कि अगर येद्दियुरप्पा अपनी सरकार बचाने में कामयाब रहे तो 75 पार की उनकी राजनीतिक यात्रा सुखद रहेगी. अगर ऐसा नहीं हुआ तो कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के साथ 2014 में केंद्र में मंत्री पद बनने का प्रस्ताव ठुकराने वाले येद्दियुरप्पा के राजनीतिक जीवन के पटाक्षेप में खुद भाजपा के कई नेता लग जाएंगे.