कर्नाटक चुनाव संपन्न होने के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में रोजाना बढ़ोत्तरी की जा रही है. इससे पिछले नौ दिनों में पेट्रोल और डीजल के दामों में करीब दो रुपयों से ज्यादा की वृद्धि हो गई है. इस बीच जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में अगर पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले करों में कटौती नहीं की गई तो जल्द ही इनके दामों में सात से आठ रुपये तक की वृद्धि की जा सकती है. इससे आम लोगों की बेचैनियां काफी बढ़ गई हैं.

इसके साथ ही पेट्रोलियम उत्पादों पर अत्यधिक कर वसूलने की मोदी सरकार की नीति की आलोचना भी जोर पकड़ने लगी है. अब आम लोग भी पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह सरकार के समय पेट्रोल और डीजल पर वसूले जा रहे अपेक्षाकृत कम करों की तुलना अभी के समय के करों से करने लगे हैं. लोग सवाल कर रहे हैं कि जब मनमोहन सरकार के अंतिम दिनों में कच्चा तेल 107 डॉलर प्रति बैरल तक चला गया था और अभी उसका दाम सिर्फ 80 डॉलर प्रति बैरल ही है. इसके बावजूद दिल्ली में पेट्रोल और डीजल तब के मुकाबले करीब साढ़े तीन रुपये और 13 रुपये प्रति लीटर महंगा बिक रहा है. और अभी भी यह कहा जा रहा है कि इनके दामों में और वृद्धि की जा सकती है.

इसलिए पेट्रोलियम उत्पादों पर मोदी सरकार की मौजूदा कर नीति की कई आलोचक जमकर आलोचना कर रहे हैं. ऐसे लोगों में विपक्षी दलों के नेता सबसे आगे हैं. अभी कुछ ​दिनों पहले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडु ने इस बारे में केंद्र की आलोचना करते हुए एक खत पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखा है. इसमें उन्होंने लिखा है कि केंद्र सरकार ने 2014 के अंत से सस्ते हो रहे कच्चे तेल का फायदा उठाने के लिए 14 महीने में नौ बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया था. उन्होंने आगे लिखा कि अब जब ​यह फिर से महंगा होने लगा है तब केंद्र सरकार कर को पहले के स्तर तक घटाने के बजाय इसे बेवजह ऊंचा रखकर आम लोगों की जेबें ढीली कर रही है.

इसके अलावा कई आलोचक धर्मेंद्र प्रधान को उनके पुराने वादे की भी याद दिला रहे हैं. अपने एक बयान में पेट्रोलियम मंत्री ने पहले कहा था कि सस्ते तेल का फायदा लोगों तक इसलिए नहीं पहुंचाया जा रहा है क्योंकि जब कभी यह महंगा होगा तब सरकार इसके बोझ से लोगों को राहत देगी. हालांकि धर्मेंद्र प्रधान और उनकी सरकार अपना वह वादा अभी तक पूरा करते हुए नहीं दिख रही है.

मई 2014 में पेट्रोल और डीजल की कीमत क्या थी?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 107 डॉलर प्रति बैरल होने के बावजूद मार्च 2014 में दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल 73 रुपये और डीजल 55 रुपये में मिल रहा था. इसकी दो वजहें थीं. पहली यह कि पेट्रोल और डीजल पर केंद्र सरकार तब केवल 9.48 और 3.56 रुपये (क्रमश:) का उत्पाद शुल्क वसूल रही थी. इसके अलावा उस समय डीजल पर प्रति लीटर 8.37 रुपये की सब्सिडी भी दी जा रही थी. इसका मतलब यह हुआ कि एक लीटर डीजल पर उसे करीब पांच रुपये का घाटा हो रहा था.

दूसरी ओर आज पेट्रोल पर साढ़े उन्नीस रुपये तो डीजल पर साढ़े पंद्रह रुपये का उत्पाद शुल्क वसूला जा रहा है. इस तरह मोदी सरकार मनमोहन सरकार की तुलना में एक लीटर पेट्रोल पर 10 रुपये ज्यादा कमा रही है जबकि डीजल में उसे पांच रुपये नुकसान के बजाय करीब 15 रुपये का फायदा हो रहा है. इससे पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाला केंद्र का राजस्व तीन सालों में करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये बढ़ गया है. वहीं केंद्र पर पेट्रोलियम सब्सिडी का बोझ भी तब से करीब 50 हजार करोड़ रुपये घट गया है. यही वजह है कि मोदी सरकार के आलोचक इन उत्पादों पर उत्पाद शुल्क घटाकर आम लोगों को इनकी ऊंची कीमत से राहत देने की मांग कर रहे हैं.

पेट्रोल और डीजल की कीमतें कैसे तय होती हैं?

पेट्रोल और डीजल कच्चे तेल को रिफाइन करके तैयार होते हैं लिहाजा इनकी कीमत में कच्चे तेल के भाव की बड़ी भूमिका होती है. इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत डॉलर में तय होने से रुपये की विनिमय दर का भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान होता है. ऐसे में कच्चे तेल के महंगे होने का दर्द तब और बढ़ जाता है जब रुपया भी कमजोर हो जाता है. ऐसे में हमें रुपये में तेल की कीमत ज्यादा देनी पड़ती है. अभी ये दोनों हालात भारत की परेशानियां बढ़ा रहे हैं. इस वक्त ब्रेंट क्रूड आॅयल जहां 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है, वहीं डॉलर भी 68 रुपये को पार कर गया है. इसके चलते भारत में कच्चे तेल का आवक मूल्य (रुपये में) काफी बढ़ गया है. यह जानना भी जरूरी है कि इसका आवक मूल्य तय करने के लिए इसके अंतरराष्ट्रीय भाव में ढुलाई की लागत भी जोड़ी जाती है जो अभी करीब 1.5 डॉलर प्रति बैरल है. इस लिहाज से गणना करने पर हमारे देश में कच्चे तेल का आवक मूल्य फिलहाल 35 रुपये प्रति लीटर के आसपास ठहरता है.

कच्चे तेल के आयात के बाद देश की विभिन्न रिफाइनरियों में इसकी रिफाइनिंग करके कई तरह के पेट्रोलियम उत्पाद तैयार किए जाते हैं. पेट्रोल और डीजल इन्हीें उत्पादों में आते हैं. वैसे पेट्रोल की तुलना में डीजल की रिफाइनिंग जटिल होती है लिहाजा इसकी लागत भी ज्यादा आती है. फिलहाल एक लीटर पेट्रोल की रिफाइनिंग पर 4.75 रुपये जबकि डीजल पर 7.5 रुपये की लागत आती है.

रिफाइनिंग के बाद तेल बेचने वाली कंपनियां इसकी लागत में अपना मुनाफा और परिवहन लागत जोड़कर इसे पेट्रोल पंपों तक पहुंचा देती हैं. इस तरह पेट्रोल पंपों तक पहुंचते-पहुंचते पेट्रोल और डीजल के आवक मूल्य में करीब आठ रुपये और 10 रुपये और बढ़ जाते हैं. इसके बाद पेट्रोल और डीजल की तय कीमतें इनकी मूल लागत के नाम से जानी जाती हैं. केंद्र और राज्य सरकार द्वारा लगने वाले कर इसी मूल लागत पर लगाए जाते हैं. इस वक्त देश में पेट्रोल और डीजल की मूल लागत (डीलर प्राइस) करीब 43 रुपये और 45 रुपये आ रही है.

पेट्रोल और डीजल पर टैक्स का बोझ अभी कितना है?

केंद्र सरकार पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क लगाती है जो अभी 19.48 और 15.33 रुपये है. इसके बाद पेट्रोल पंप वाले अपना कमीशन चार्ज करते हैं. इसके बाद इस पर राज्य सरकारें वैट वसूलती हैं. हर राज्य में वैट की दरें चूंकि अलग-अलग होती हैं लिहाजा पेट्रोल और डीजल की कीमत भी हर जगह अलग-अलग होती है. वैसे यह मामला समझने के लिए हम दिल्ली और मुंबई का उदाहरण ले सकते हैं जहां पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब आठ और चार रुपये का अंतर है.

उत्पाद शुल्क और पेट्रोल पंपों का कमीशन जोड़ दें तो पेट्रोल और डीजल की कीमत क्रमश: 68 रुपये और 63 रुपये ठहरती है. इसमें अगर दिल्ली का वैट भी जोड़ दें तो दिल्ली में अभी पेट्रोल की खुदरा कीमत करीब 84 रुपये और डीजल की 74 रुपये से ज्यादा होनी चाहिए. लेकिन कर्नाटक चुनाव की वजह से कीमतों के रोजाना बदलाव में आई रुकावट के चलते अभी दिल्ली में पेट्रोल और डीजल की कीमत 76.57 और 68.08 रुपये ही है. इसलिए माना जा रहा है कि करों में कमी नहीं हुई तो जल्द ही इनके दाम क्रमश: आठ और सात रुपये तक बढ़ाए जा सकते हैं. यदि ऐसा हुआ तो केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा वसूला जाने वाला कुल कर पेट्रोल पर 37.28 रुपये जबकि डीजल पर 26.62 रुपये हो जाएगा. पेट्रोल के मामले में यह मूल लागत (डीलर प्राइस) का 87 फीसदी जबकि डीजल पर 59 फीसदी होगा.

यदि मनमोहन सरकार होती तो अभी पेट्रोल और डीजल के दाम कितने होते?

देश में अभी पेट्रोल की डीलर प्राइस करीब 43 रुपये जबकि डीजल की 45.5 रुपये ठहर रही है. इसमें मनमोहन सिंह के समय लागू उत्पाद शुल्क और डीलर कमीशन जोड़ दें तो वैट लगने के पूर्व पेट्रोल का दाम 55.90 रुपये जबकि डीजल का 51.24 रुपये ठहरेगा. इसमें अगर दिल्ली में लग रहे मौजूदा वैट को जोड़ दें तो एक लीटर पेट्रोल का भाव करीब 71 रुपये जबकि डीजल का 60 रुपये (बिना सब्सिडी के) ही ठहरता. इसमें अगर हम सब्सिडी को भी जोड़ दैं तो डीजल का दाम सिर्फ 52 रुपये प्रति लीटर ही रह जाएगा. यानी मोदी सरकार द्वारा बढ़ाए गए उत्पाद शुल्क और खत्म की गई सब्सिडी के चलते पेट्रोल का मौजूदा खुदरा भाव मार्च 2014 की तुलना में करीब छह और डीजल का 17 रुपये महंगा है.