राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़े के बाद से कांग्रेस में उथल-पुथल है. लोकसभा चुनाव में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद से ही राहुल गांधी इस्तीफे की जिद पर अड़े थे और कई वरिष्ठ नेताओं की मान-मनौव्वल के बावजूद उन्होंने हाल में यह पद छोड़ ही दिया. उनके बाद कांग्रेस संगठन की कमान जिन नेताओं के हाथ में सौंपे जाने की संभावना सर्वाधिक जताई जा रही है, उनमें अशोक गहलोत, गुलाम नबी आजाद, केसी वेणुगोपाल, कैप्टन अमरिंदर सिंह, एके एंटनी और शरद पवार प्रमुख हैं. इसी फेहरिस्त में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान के उपमुख्यमंत्री व पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट के नाम भी जुड़ गए हैं.

हाल ही में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने एक ट्वीट कर किसी वरिष्ठ की बजाय युवा नेता को पार्टी की बागडौर सौंपे जाने की इच्छा ज़ाहिर की थी. हालांकि कैप्टन ने किसी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन कई जानकारों ने यहां युवा नेता से मतलब ज्योतिरादित्य सिंधिया या सचिन पायलट से निकाला. इनमें से ज्योतिरादित्य के समर्थकों ने तो उन्हें अध्यक्ष बनवाने के लिए भोपाल में पोस्टर तक लगा दिए.

लेकिन राजनीतिकारों की मानें तो देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी को संभालने के लिए सचिन पायलट ज्योतिरादित्य सिंधिया की तुलना में कई मायनों में इक्कीस नज़र आते हैं. इसमें पहला मोर्चा तो संगठन संभालने के अनुभव और गुर से जुड़ा है. सचिन पायलट बीते पांच साल से ज्यादा समय से राजस्थान में पार्टी को अध्यक्ष के तौर पर संभाल रहे हैं जबकि ज्योतिरादित्य इस मामले में खाली हाथ हैं. जानकार कहते हैं कि इस अंतराल में सचिन पायलट राजस्थान में न सिर्फ़ कांग्रेस का बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं बल्कि जनमानस के बीच पैठ बनाने में भी सफल हुए हैं. वे यह भी जोड़ते हैं कि पायलट की मंच पर प्रभावी उपस्थिति और हिंदी और अंग्रेजी, दोनों ही भाषाओं पर एक ही सी पकड़ भी उन्हें लोगों से जोड़ने में खासी मददगार साबित होती है .

राजस्थान में सचिन पायलट को अपना नेता मानने वाले उनकी खूबियों को गिनाते हुए कहते हैं कि एक वे ही हैं जो बेहद नाजुक दौर से गुज़र राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी को संबल दे सकते हैं. अपनी इस बात के पक्ष में एक पायलट समर्थक कहते हैं, ‘पायलट राजस्थान में अपनी इस काबिलियत को साबित कर चुके हैं. उन्हें प्रदेश संगठन को संभालने का जिम्मा तब मिला था, जब 2013 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की ऐतिहासिक हार के बाद आम कार्यकर्ता का मनोबल पूरी तरह से टूट चुका था. लेकिन सचिन पायलट की कड़ी मेहनत का ही नतीजा था उसके बाद हुए निकाय चुनावों, कई उपचुनावों और इस (2018) विधानसभा चुनाव में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया.’

हालांकि सचिन पायलट को चाहने वाले इस बात पर चुप्पी साध लेते हैं कि उनके प्रदेशाध्यक्ष रहते हुए पिछले दोनों लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथ से राजस्थान की सभी 25 सीटें कैसे फिसल गई. लेकिन वे यह बात गिनवाने से नहीं चूकते कि इस आम चुनाव में करारी हार के बाद जब राहुल गांधी के पलायनवादी रुख से देशभर के कार्यकर्ताओं में निराशा फैल रही थी तो उस दौरान सचिन पायलट एक सच्चे लीडर की तरह राजस्थान के गांव-देहात में जाकर संगठन में ऊर्जा भर रहे थे.

लेकिन इन तमाम खूबियों के बावजूद विश्लेषकों का एक तबका ऐसा भी है जो मानता है कि गांधी परिवार सचिन पायलट पर दांव लगाने से पहले सौ बार सोचेगा. राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार राजेश असनानी कहते हैं, ‘राहुल गांधी अभी तक राष्ट्रीय राजनीति में अपने पैर नहीं जमा पाए हैं. ऐसे में गांधी परिवार उनके हमउम्र किसी भी नेता को दिल्ली में स्थापित होने का मौका नहीं देना चाहेगा. यदि किसी युवा नेता को पार्टी का मुखिया चुनना भी पड़ा, तो भी कई कारणों के चलते सचिन पायलट गांधी परिवार को शायद ही पसंद आएं! ’

बात को आगे बढ़ाते हुए असनानी कहते हैं, ‘सचिन, अपने पिता राजेश पायलट की तरह जबरदस्त महत्वाकांक्षी तो हैं ही, बेहद आक्रामक भी हैं. कई राष्ट्रीय पत्रकार और नामचीन लेखक पायलट को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखने की अपनी इच्छा सार्वजनिक तौर पर ज़ाहिर कर चुके हैं. उन्होंने भी कभी इस बात का खंडन नहीं किया कि वे मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि प्रधानमंत्री बनने की भी ख्वाहिश मन में पाले बैठे हैं.’

राजेश असनानी के मुताबिक कांग्रेस हाईकमान जानता है कि यदि पायलट एक बार दिल्ली में टिक गए तो उन्हें हिलाना मुश्किल होगा. वे कहते हैं, ‘फिर राजस्थान में मुख्यमंत्री पद को लेकर जिस तरह का अड़ियल रवैया उन्होंने अपनाया उससे कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व, खासतौर पर प्रियंका गांधी खासी नाराज़ हुई थीं. इस दौरान पायलट ने अपनी छवि एक जाति विशेष के नेता के तौर पर भी स्थापित हो जाने दी. शायद यह एक बड़ा कारण था कि राहुल गांधी के करीबी होने के बावजूद प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए अशोक गहलोत को पायलट के ऊपर तवज्जो मिली.’

कुछ अन्य राजनीतिकारों का यह भी कहना है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी के लचर प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी बार-बार इशारा देते रहे कि अहम पदों पर बैठे नेताओं को हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा देना चाहिए. पार्टी नेताओं पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ता देख राहुल गांधी ने हाल ही में खुलकर नाराज़गी भी जताई. इसके बावजूद उनके बेहद करीब माने जाने वाले सचिन पायलट इस मामले में खामोशी ओढ़ पद पर बने रहे जबकि बतौर प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट का कार्यकाल औसत मानी जाने वाली अवधि से ज्यादा हो चुका है.

प्रदेश के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार इस बारे में कहते हैं, ‘यदि सचिन पायलट राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे भी देते हैं तो भी प्रदेश का उपमुख्यमंत्री होने की वजह से उनका क़द कम नहीं होगा. लेकिन असुरक्षा के भाव के चलते वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, जबकि दोहरी जिम्मेदारी संभालना उनके लिए भी मुश्किल साबित हो रहा है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘पायलट के इस रुख़ से नई कांग्रेस बनाने का सपना देख रहे राहुल गांधी को निश्चित तौर पर निराशा हुई होगी. वहीं, इस्तीफ़ा देकर ज्योतिरादित्य सिंधिया गांधी परिवार के मन में अपने लिए नई जगह बनाने में सफल हुए होंगे.’

हालांकि अमेठी से राहुल गांधी की तरह ज्योतिरादित्य को भी अपनी गुना सीट से इस लोकसभा चुनाव में बड़ी हार का सामना करना पड़ा है और सचिन पायलट भी राजस्थान में अपने मजबूत गढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों में पार्टी की लाज बचा पाने में नाकाम रहे हैं.