केजीबी एक ज़माने में सोवियत संघ की ख़ुफ़िया एजेंसी हुआ करती थी. दुनिया के कई देशों की सरकारें बनवाने-गिराने में अक्सर इसकी सक्रिय भागीदारी हुआ करती थी. और दिलचस्प बात है कि आज कर्नाटक की बीएस येद्दियुरप्पा सरकार को गिरने से बचाने की ज़िम्मेदारी जिन केजी बोपैया के हाथ में है उन्हें भी लोग ‘केजीबी’ ही बुलाते हैं. इससे भी ज़्यादा दिलचस्प यह है कि केजीबी इससे पहले 2010 में 16 विधायकों को सदन से बाहर का रास्ता दिखाकर येद्दियुरप्पा की सरकार बचाने का कारनामा कर भी चुके हैं.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार कर्नाटक की येद्दियुरप्पा सरकार शनिवार शाम चार बजे विधानसभा में बहुमत परीक्षण से गुजरने वाली है. इससे पहले राज्यपाल वजूभाई वाला ने शुक्रवार भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता केजी बोपैया को विधानसभा का अस्थायी अध्यक्ष (प्रोटेम स्पीकर) नियुक्त कर दिया. कांग्रेस ने शुक्रवार को ही इस फैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई. पार्टी ने दलील दी कि सदन के सबसे वरिष्ठ सदस्य को अस्थायी अध्यक्ष बनाने की परंपरा है. कांग्रेस के आरवी देशपांडे सबसे वरिष्ठ हैं.

लेकिन अदालत ने कहा, ‘अगर अस्थायी अध्यक्ष के मामले पर विचार किया जाएगा तो आज शाम चार बजे तक बहुमत परीक्षण नहीं हो सकेगा. इसलिए बोपैया अस्थायी अध्यक्ष बने रहेंगे.’ हालांकि इसके साथ ही अदालत ने सदन की कार्रवाई का पूरे देश में सीधे प्रसारण का आदेश भी जारी कर दिया जिससे लोग सीधे वह सब देख सकें जो बहुमत परीक्षण के दौरान होगा या किया जाएगा. इसीलिए केजीबी के लिए इस बार येद्दियुरप्पा सरकार को बचाने का मिशन पूरा कर पाना थोड़ा मुश्किल लग रहा है.

बताते चलें कि 2010 में भाजपा के कुछ विधायकों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी थी. तब विधानसभा अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी बोपैया के पास ही थी. उन्होंने भाजपा को समर्थन देने वाले पांच निर्दलीय और 11 बाग़ी विधायकों को सदन से बहिष्कृत कर दिया. इस तरह से येद्दियुरप्पा सरकार ने बहुमत हासिल कर लिया. यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और अदालत ने बोपैया की ख़िंचाई करते हुए उनका फैसला पलट दिया. ऐसे में तय है कि इस बार बोपैया देश के साथ ख़ास तौर पर सुप्रीम कोर्ट की निग़ाह में भी रहेंगे.

सो अब सवाल यह कि येद्दियुरप्पा बहुमत कैसे हासिल कर सकते हैं. द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर में इसका ज़वाब हो सकता है. इसके मुताबिक कांग्रेस और जनता दल-धर्मनिरपेक्ष (जेडीएस) के पास 20 विधायक लिंगायत समुदाय के हैं. इन्हीं विधायकों पर भाजपा की ख़ास नज़र है. उन्हें विभिन्न माध्यमों से यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि येद्दियुरप्पा लिंगायत समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं. उन्हें मुख्यमंत्री बनाए रखने में मदद नहीं की तो समाज को आगे कब सरकार का नेतृत्व करने का मौका मिले, कोई कह नहीं सकता.

इन विधायकों को यह भी बताया जा रहा है कि पिछले मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लिंगायत समुदाय के बीच विभाजन की रेखा को गहरा करने की कोशिश की थी और वही सिद्धारमैया जेडीएस के साथ गठबंधन कर फिर सरकार में भागीदार हो रहे हैं. सो उनका समर्थन करने से भी समाज में सही संदेश नहीं जाएगा. सूत्र बताते हैं कि इसके अलावा दूसरे तौर-तरीके भी अपनाए जा रहे हैं ताकि विधायकों को या तो सदन से ग़ैरहाज़िर रहने पर मना लिया जाए या सीधे येद्दियुरप्पा के समर्थन करने के लिए. हालांकि इनकी तरीकों की सफलता पर कोई आश्वस्त नहीं है.

इसीलिए सवाल यह भी है कि येद्दियुरप्पा इस बार कर्नाटक के कल्याण सिंह बनेंगे या जगदंबिका पाल. सिंह और पाल को उत्तर प्रदेश में बतौर मुख्यमंत्री ऐसी ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था. इनमें कल्याण सिंह की नैया तो पार हो गई थी लेकिन जगदंबिका पाल को 24 घंटे के भीतर ही मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा था. येद्दियुरप्पा का हश्र इनमें से किसके जैसा होगा यह तीन-चार घंटे में पता चल जाएगा.