पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना को सीधी चुनौती देने के बारे में अमूमन सोचना भी मुश्किल माना जाता है. मगर इन दिनों महज़ 26 साल का एक नौजवान और उसका आंदोलन लगतार पाकिस्तानी सेना की चिंता बढ़ा रहा है. नौजवान का नाम है मंज़ूर पश्तीन, जो वैसे तो पेशे से जानवरों के डॉक्टर हैं लेकिन वह बीते तीन महीने से सेना के ख़िलाफ़ आम पाकिस्तानी की आवाज़ बनकर उभरे है.

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक हमेशा अपनी ख़ास पश्तीन टोपी में नज़र आने वाले मंज़ूर पश्तून तहफ़ूज़ मूवमेंट (पीटीएम) के नाम से सेना के ख़िलाफ़ अहिंसक आंदोलन चला रहे हैं. वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार रहीमुल्लाह यूसुफ़ज़ई के अनुसार, ‘मूल रूप से वे (मंज़ूर) यह कह रहे हैं कि मैं पश्तून हूं और पश्तूनों के हक़ के लिए लड़ रहा हूं. उनके पीटीएम के साथ बड़ी तादाद में लोग जुड़ भी रहे हैं. हर शख़्स जो दहशतग़र्दी से पीड़ित है, जो सेना के अभियानों से परेशान है, जिसे तमाम चैक प्वाइंट पर कभी न कभी ज़लील किया गया है, वह पीटीएम को समर्थन दे रहा है. उन्होंने बीते कुछ समय में पाकिस्तान के कई हिस्सों में बड़ी-बड़ी जनसभाएं की हैं.

ख़बर के मुताबिक पीटीएम यूं तो ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत में 2014 में शुरू किया गया था. वहां की गोमल यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं के बीच ज्वलंत मुद्दों पर बहस-मुबाहिसा की शक़्ल में यह शुरू हुआ. उस वक़्त इसे महसूद तहफ़ूज़ मूवमेंट (एमटीएम) कहा जाता और यह मुख्य तौर पर दक्षिण वज़ीरिस्तान तक ही सीमित था जो महसूद जनजातीय लोगों की बहुलता वाला इलाका है. ये लोग ख़ुद को पश्तीन कहते हैं. बताया जाता है कि इस साल जनवरी में कराची के उभरते मॉडल नक़ीबुल्लाह महसूद को पुलिस मुठभेड़ में मार दिए जाने के बाद पश्तूनों के इस अांदोलन ने जाेर पकड़ा. इस घटना के बाद आंदोलन का न सिर्फ़ नाम बल्कि स्वरूप भी बदल गया है.

इस्लामाबाद के एक पत्रकार मारवी सरमद कहते हैं, ‘नक़ीबुल्लाह को आतंकी संगठन तहरीक़-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का सदस्य बताकर मार दिया गया. जबकि बाद में पता चला कि उसका टीटीपी से कोई लेना-देना नहीं था. और यह ख़ुलासा होते ही मंज़ूर की अगुवाई में लोगों ने पुरज़ाेर आवाज़ बुलंद करना शुरू कर दी. लगातार रैलियां हो रहीं हैं. इनमें एक नारा बुलंद हाे रहा है- ये दहशतग़र्दी है, इसके पीछे वर्दी है. इसके ज़रिए मंज़ूर पश्तूनों के नए हीरो की तरह उभरे हैं. ठीक वैसे ही जिस तरह किसी ज़माने में बादशाह खान हुआ करते थे. बादशाह खान की तरह मंज़ूर भी पश्तून और ग़ैर-पश्तूनों में बराबर लोकप्रिय हो रहे हैं.’