कैराना के उस उपचुनाव का नतीजा अा गया जिस पर पूरे देश की नजर थी. विपक्ष की एकता के सामने भाजपा हार गई. फूलपुर-गोरखपुर में सपा-बसपा की जिस एकता का फार्मूला तलाशा गया था, कैराना में भी अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के साथ मिलकर विपक्ष ने उस पर इति सिद्धम लिख दिया.

कैराना चुनाव में रालोद की सफलता ने 2019 के लिए भाजपा की चिंता बढ़ा दी है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का दावा है कि भाजपा 2019 में पिछले लोकसभा चुनाव से ज्यादा सीटें जीतेगी. ऐसा तभी संभव हो सकता है जब उत्तर प्रदेश में भाजपा कम से कम 2014 वाला प्रदर्शन दोहराए. लेकिन कैराना में जो नए राजनीतिक समीकरण उभरे हैं, वे इस संभावना के खिलाफ दिखते हैं.

कैरानी जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश का हिस्सा है वहां पिछले आम चुनाव में भाजपा ने क्लीन स्वीप किया था. लेकिन अब सपा-बसपा-कांग्रेस की एकता के फार्मूले के साथ जमीन पर बदले सियासी समीकरण अगले लोकसभा चुनाव में उसकी परेशानी बढ़ा सकते हैं. बदला काफी कुछ है, लेकिन जानकारों के मुताबिक मोटे तौर पर देखें तो तीन चीजें उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन सकती हैं.

जाट-मुसलमान समीकरण की बहाली

कैराना चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद पहली बार जाट और मुसलमानों ने एक साथ किसी पार्टी के लिए वोट किया. 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा वास्तव में जाट-मुसलमान संघर्ष था. इन दंगों के बाद जाटों औऱ मुसलमानों के मन में पैदा हुई खटास ने बरसों पुराने समीकरण को बिगाड़ दिया था. कभी रालोद के लिए मुसलमानों के साथ वोट करने वाला जाट समुदाय तात्कालिक प्रतिक्रिया में 2014 में भाजपा के साथ जुड़ गया. माना जाता है कि दंगों की तपिश ने पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में असर डाला और भाजपा ने हिंदू मतों के ध्रुवीकरण के सहारे बड़ी सफलता हासिल की .

विधानसभा चुनावों में भी ध्रुवीकरण का कार्ड खूब चला. मुसलमान सपा और हिंदू मतदाता भाजपा के साथ एकजुट हुए. चुनावी गणित में बाजी भाजपा के हाथ लगी. इस दौरान इलाके में सपा-बसपा तो कमजोर हुईं ही, रालोद के चौधरी अजित सिंह की सियासी जमीन पूरी तरह से खिसक गई.

इसके बाद अजित ने नए सिरे से जाट-मुसलमान गठजोड़ को एक मंच पर लाने की कवायद शुरू की. छोटे चौधरी और उनके बेटे जयंत की यह कवायद कैराना में रंग लाई. दंगों के बाद पैदा हुुई खटास कैराना में दूर होती दिखी है. जाट और मुसलमान मतदाता रालोद के साथ दिखे. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर सपा-बसपा-रालोद और कांग्रेस 2019 में भी एक मंच पर रहते हैं यह भाजपा के लिए चिंताजनक बात होगी, क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में उसकी संभावना सबसे ज्यादा ध्रुवीकरण की हालत में ही रंग लाती है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अगर पार्टी कमजोर पड़ी तो प्रदेश में उसकी सीटों की संख्या पर खासा असर पड़ेगा. जाट-मुसलमान समीकरण पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कम से कम 10 सीटों पर खासा असर रखता है.

दलितों की नाराजगी

2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान बसपा के वोट प्रतिशत में गिरावट से साफ था कि दलित वोटों की ठीक-ठाक संख्या भाजपा के पक्ष में गई है. लेकिन मोदी सरकार के चार और योगी सरकार के एक साल गुजरने के बाद माहौल में तब्दीली नजर अा रही है. भीम अार्मी जैसे दलित संगठनों की बढ़ती गतिविधियों ने भाजपा नेताओं को भी चिंतित किया है.

कैराना उपचुनाव में भीम अार्मी ने भी दलितों से गठबंधन प्रत्याशी को वोट करने की अपील की थी. भीम अार्मी का जन्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुआ था. 2017 में महाराणा प्रताप जयंती के दौरान निकले जुलूस के दौरान हुई हिंसा के बाद इसके संस्थापक चंद्रशेखर उर्फ रावण राष्ट्रीय सुर्खियों में अा गए. राजपूत-दलित जातीय संघर्ष के बाद से ही चंद्रशेखर उर्फ रावण जेल में हैं. अदालत से सभी मामलों में जमानत मिलने के बाद प्रदेश सरकार ने उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) लगा दिया जिसके चलते वे अभी भी जेल में हैं. 2014 की लहर में भाजपा के साथ जाने वाले इलाके के दलित भी इस बात का अारोप लगाते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार रावण के साथ बदले का व्यवहार कर रही है.

एसएसी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद हुए भारत बंद के दौरान सबसे ज्यादा हिंसा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देखी गई थी. इस हिंसा पर हुई कार्रवाई को लेकर भी दलित नेता भेदभाव का आरोप लगाते हैं. मेरठ में बसपा के कद्दावर नेता और पूर्व विधायक योगेश वर्मा को हिंसा के अारोप में गिरफ्तार किया गया था. उनके साथ पुलिस की सार्वजनिक अभद्रता के वायरल वीडियो को लेकर भी दलितों में नाराजगी है. इससे इन अारोपों को और बल मिल रहा है कि प्रदेश की भाजपा सरकार विपक्ष के राजनीतिक दलों के प्रति बदले की भावना से काम कर रही है.

वापस कैराना पर लौटते हैं. उपचुनाव में इलाके के दलित बहुल गांवों में रालोद को अच्छा वोट मिला है. दलित भाजपा से मुंह मोड़ते हैं तो उसके लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले जैसी सफलता दोहराना नामुमकिन होगा. माना जा रहा है कि यहां से निकला संदेश बाकी प्रदेश में भी भाजपा की दिक्कत बढ़ाएगा.

गन्ना बकाये की कड़वाहट

कैराना उपचुनाव में जयंत चौधरी का दिया एक नारा खूब चला. नारा था - हमें जिन्ना नहीं, गन्ना चाहिए. योगी सरकार के मंत्री दावे करने में व्यस्त रहे और रालोद ने किसानों की दुखती रग पकड़ ली. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में गन्ना खड़ा है और मिलों ने सीजन के खत्म होने की घोषणा कर दी है. जो गन्ना मिलों में पहुंच चुका है उसका बकाया भी अब तक किसानों को नहीं मिला है. गन्ना किसानों का असंतोष लगाातर बढ़ता जा रहा है. उनको चिंता है कि अगर मिलें बंद कर दी गईं तो खेतों में पड़ी उनकी फसल का क्या होगा. सरकार के 14 दिन में गन्ना भुगतान के दावे हवाई साबित हो रहे हैं.

इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ी बिजली की दरों ने भी किसानों में गुस्सा पैदा किया है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक गन्ने से संचालित है. केंद्र और प्रदेश सरकार ने इनके लिए लंबी-चौड़ी घोषणाएं की थीं, लेकिन उनमें से कोई धरातल पर उतरती नहीं दिखती. राष्ट्रीय लोकदल इस मुद्दे पर लगातार सरकार पर हमलावर रहा. कैराना में उसका चुनाव नतीजा भी दिखा. जानकारों के मुताबिक अगर गन्ना किसानों की नाराजगी यूं ही बढ़ती रही तो 2014 में भाजपा का गढ़ रहा पश्चिमी उत्तर प्रदेश दरक सकता है.