अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड आॅयल का दाम पिछले एक महीने में छह डॉलर (करीब आठ फीसदी) महंगा हो गया है. इससे एक बैरल कच्चे तेल का भाव बुधवार को 79 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है. इधर हमारे देश में कर्नाटक चुनाव के चलते पेट्रोल और डीजल के दामों में 19 दिनों तक कोई बदलाव न करने के बाद केंद्र ने पिछले हफ्ते से इसे फिर से बढ़ाना शुरू कर दिया है. इसके चलते महज 10 दिनों में दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल 2.54 रुपये (भाव 77.17 रु) जबकि एक लीटर डीजल 2.41 रुपये (भाव 68.34 रु) महंगा हो गया है. इससे आम लोगों का गुस्सा भी सातवें आसमान पर पहुंच गया है.

अब लोग सरकार से पेट्रोल और डीजल पर लग रहे भारी भरकम करों को तुरंत घटाने की मांग कर रहे हैं ताकि इनकी आसमान चढ़ती कीमतों पर काबू पाया जा सके. इसके जवाब में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस बारे में जल्द ही कोई नीतिगत फैसला लेने का आश्वासन दिया है. उन्होंने सोमवार को कहा कि सरकार इनकी कीमतों पर नजर रख रही है और वह इसकी बढ़ती कीमतों से आम जनता को राहत देने के लिए सभी संभव विकल्पों पर विचार कर रही है. हालांकि उन्होंने इन विकल्पों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है. लेकिन जानकारों का मानना है कि इस बारे में मोदी सरकार की चौथी वर्षगांठ के मौके पर शनिवार तक कोई ऐलान हो सकता है.

वैसे इन अटकलों के बीच सबसे अहम सवाल यही पैदा होता है कि मोदी सरकार के पास महंगे होते पेट्रोलियम उत्पादों से लोगों को राहत देने के लिए कौन-कौन से विकल्प मौजूद हैं. इसके अलावा दूसरा सवाल यह भी है कि केंद्र ने अभी तक इन विकल्पों पर क्यों नहीं गौर किया है जबकि उसे अंदाजा होगा कि पेट्रोलियम उत्पादों के बढ़ते दामों से जनता काफी परेशान हो सकती है?

पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाना

अर्थशास्त्रियों के अनुसार पेट्रोल और डीजल को सस्ता करने के लिए सरकार के पास मुख्यत: दो विकल्प हैं. पहला विकल्प यह कि इन उत्पादों को जीएसटी (वस्तु और सेवा कर) के अंतर्गत ले आया जाए जिससे केंद्र और राज्यों की कोई भी सरकार इन पर मनमाना टैक्स न लाद सकें. हालांकि ज्यादातर जानकारों को आज के हालात में ऐसा होने की संभावना न के बराबर दिखती है. इसका मुख्य कारण यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर अभी पेट्रोल पर 90 फीसदी से ज्यादा जबकि डीजल पर 60 फीसदी तक कर वसूल रही हैं. दूसरी ओर जीएसटी के तहत कर का उच्चतम स्लैब केवल 28 फीसदी ही है जो सरचार्ज आदि मिलाकर 30 फीसदी तक ही हो सकता है.

जानकारों के अनुसार जीएसटी के दायरे में आने पर पेट्रोल से मिलने वाला राजस्व घटकर दो तिहाई जबकि डीजल से प्राप्त होने वाला कर करीब आधा रह जाने का अनुमान है. आलोचकों के मुताबिक ऐसे हालात में जब सभी सरकारें अपना कर राजस्व बढ़ाने की भरसक कोशिश कर रही हैं तब पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के तहत शामिल करने की उम्मीद करना खयाली पुलाव पकाने जैसी बात ही होगी. केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री शिवप्रताप शुक्ल ने भी बुधवार को कहा कि बिना राज्यों के वित्त मंत्रियों की सहम​ति से पेट्रोल और डीजल को जीएसटी में शामिल करने का प्रस्ताव जीएसटी परिषद में लाना मुमकिन नहीं है. इसलिए जानकारों का मानना है कि पेट्रोल और डीजल के जीएसटी में शामिल होने की तब तक कोई उम्मीद नहीं है जब तक अप्रत्यक्ष कर की यह प्रणाली अपनी पूर्ण क्षमता के साथ काम न करने लगे. आलोचकों के मुताबिक तब तक केंद्र और राज्य सरकारें इस प्रस्ताव को एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हुए टालते रहेंगे. हालांकि कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि पेट्रोलियम उत्पादों के लिए ही जीएसटी में नये स्लैब भी बनाये जा सकते हैं ताकि कम से कम पूरे देश में इनके दामों में एकरूपता लायी जा सके. लेकिन फिर यह भी कहा जाता है कि इससे जीएसटी थोड़ा और जटिल हो जाएगा और इसे लाने का उद्देश्य भी खत्म हो जाएगा.

केंद्र और राज्य के करों को कम करना

पेट्रोल और डीजल पर अभी दो तरह के कर - उत्पाद शुल्क और वैट - लगते हैं. उत्पाद शुल्क जहां केंद्र सरकार लगाती है. वहीं वैट राज्यों द्वारा लगाया जाता है लिहाजा हर राज्य में यह अलग-अलग है. मोदी सरकार पेट्रोल पर अभी 19.48 रुपये जबकि डीजल पर 15.33 रुपये का उत्पाद शुल्क वसूल रही है. सरकार इस राशि का इस्तेमाल वित्तीय घाटा कम करने और बुनियादी ढांचा विकसित करने में कर रही है.

संसद के बजट सत्र के दौरान फरवरी 2018 में मोदी सरकार ने लोकसभा को बताया कि वित्त वर्ष 2013-14 में पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्कों से उसे केवल 88.6 हजार करोड़ रुपये की आय हुई थी. लेकिन कच्चा तेल सस्ता होने के बाद केंद्र ने जब नवंबर 2014 से जनवरी 2016 तक नौ बार उत्पाद शुल्क बढ़ाए तो उसकी यह आय बढ़ती ही चली गई. वित्त वर्ष 2014-15 में पेट्रोल और डीजल से मिलने वाला राजस्व 19 फीसदी बढ़कर 1.06 लाख करोड़ रुपये हो गया. हालांकि केंद्र के कुल कर राजस्व में इसका योगदान 8.5 फीसदी ही था. लेकिन उत्पाद शुल्क के बढ़ते रहने के चलते अगले वित्त वर्ष (2015-16) में यह हिस्सेदारी बढ़कर 12.7 फीसदी (1.86 लाख करोड़ रु) हो गई. वहीं वित्त वर्ष 2016-17 में यह आंकड़ा बढ़ते हुए 14.8 फीसदी (2.53 लाख करोड़ रुपये) तक जा पहुंचा.

हालांकि पिछले वित्त वर्ष की अंतिम छमाही में कच्चे तेल के फिर से महंगा होने के बाद मोदी सरकार ने अक्टूबर में पहली बार पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क घटा दिया. इसके चलते बढ़ने के बजाय 2017-18 में इन उत्पादों से होने वाली कमाई साल भर पहले जितना ही रहने का अनुमान है. दरअसल केंद्र के कुल कर राजस्व में पेट्रोल और डीजल का हिस्सा इतना बड़ा है कि इसे खोने के डर से केंद्र सरकार ही इन उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाना नहीं चाहती.

जानकारों के अनुसार मोदी सरकार के पास एक विकल्प यह भी है कि वह राज्यों को वैट घटाने के लिए मनाने की कोशिश करे. आलोचकों का मानना है कि देश के 20 राज्यों और 64 फीसदी आबादी वाले इलाके पर एनडीए का शासन होने के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यदि चाहें तो ऐसा होना आसान तो नहीं लेकिन नामुमकिन भी नहीं है.

वैसे एक अध्ययन के अनुसार वैट की भारी-भरकम दरों की वजह से कई राज्यों की कुल आय में पेट्रोल और डीजल की हिस्सेदारी केंद्र से भी ज्यादा है. इसके मुताबिक देश के सभी 36 राज्यों में पेट्रोल पर लागू वैट का औसत अभी 26 फीसदी है और डीजल पर 18.5 फीसदी. लेकिन पेट्रोल पर 18 राज्य और डीजल पर 13 राज्य इस औसत से ज्यादा कर वसूल रहे हैं. महाराष्ट्र में तो पेट्रोल पर 40 फीसदी से ज्यादा वैट वसूला जा रहा है जबकि आंध्र प्रदेश में डीजल पर 28.50 फीसदी वैट लिया जा रहा है. ऐसे में अगर नरेंद्र मोदी केवल भाजपा शासित महाराष्ट्र सरीखे राज्यों को ही वैट की दर घटाने के लिए तैयार कर लेते हैं तो इससे अन्य राज्यों पर भी इसे कम करने का दबाव बनेगा. और ऐसे में विपक्षी दल भाजपा और केंद्र सरकार पर यह आरोप भी नहीं लगा पाएंगे कि वे पेट्रोल और डीजल के दाम घटाने के लिए कुछ कर नहीं रहे हैं.

कुछ दूसरे विकल्प भी तलाशे जा रहे हैं

उधर बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक के बाद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बताया कि केंद्र सरकार इस बारे में तात्कालिक के बजाय ‘दीर्घकालिक उपाय’ करने की सोच रही है. हालांकि उन्होंने ऐसे किसी उपाय के बारे में कोई जानकारी नहीं दी. उन्होंने यह जरूर कहा कि सरकार ऐसे उपाय खोज रही है जिससे जनता को पेट्रोल और डीजल के मूल्यों में होने वाली घट-बढ़ से हमेशा के लिए निजात मिल जाए. उनके बयान का यह मतलब भी निकाला जा रहा है कि सरकार शायद अगले चुनाव तक पेट्रोल और डीजल के मूल्यों में होने वाले रोजाना के संशोधनों पर रोक लगा दे.

वहीं कुछ जानकारों का दावा है कि केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क घटाने के बजाय तेल कंपनियों पर अंकुश लगाने की सोच रही है. इसके तहत भारत में कच्चा तेल निकालने वाली कंपनियों को इसे अंतरराष्ट्रीय दर पर बेचने से रोका जा सकता है. ऐसा दावा किया जा रहा है कि मोदी सरकार कच्चा तेल निकालने वाली कंपनियों के लिए देश में तेल बेचने की अधिकतम कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल तय कर सकती है. दुनिया के कई देशों में पहले से ऐसे नियम हैं. ब्रिटेन ने 2011 में उत्तरी सागर से निकलने वाले तेल और गैस पर कर लगाते हुए तेल का अधिकतम मूल्य 75 डॉलर तय कर दिया था. भारत में 2008 में ऐसे कर का प्रस्ताव आया था लेकिन निजी कंपनियों के भारी विरोध के चलते मनमोहन सरकार ने इसे लागू नहीं किया था. सूत्रों का यह भी दावा है कि सरकार ऑइल मार्केटिंग कंपनियों का मुनाफा मार्जिन भी कम करने पर विचार कर रही है. अभी ऐसी कंपनियों को एक लीटर पेट्रोल पर 3.30 रुपये जबकि डीजल पर 2.90 रुपये मार्जिन दिया जाता है. हालांकि इस फैसले से तेल विपणन कंपनियों की सेहत खराब होने की आशंका है जो लंबे समय में नुकसानदेह हो सकता है.

सरकार कर कटौती कर क्यों नहीं रही है?

केंद्रीय वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले एक रुपये के उत्पाद शुल्क से केंद्र को एक साल में करीब 15,000 करोड़ की आय हो रही है. इसका मतलब यह हुआ कि यदि इस हफ्ते उत्पाद शुल्क में सिर्फ दो से चार रुपये की कटौती की गई तो इससे केंद्र सरकार को 25 से 50 हजार करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है.

अर्थशास्त्रियों के अनुसार केवल उत्पाद शुल्क घटाने के फैसले से वित्त वर्ष 2018-19 में केंद्र का वित्तीय घाटा 3.3 फीसदी के तय लक्ष्य को पार करते हुए 3.6 फीसदी तक जा पहुंचेगा. वहीं केंद्र यदि वित्तीय घाटा को तय सीमा में रखने पर अड़ा रहता है तो उसके पास अपने खर्च में 25 से 50 हजार करोड़ रुपये की कमी करने के सिवा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं बचेगा. जानकारों के अनुसार आम चुनाव से ठीक पहले किसी सरकार द्वारा ऐसा सोच भी पाना बेहद मुश्किल है. और ऐसा करने से मौजूदा वित्त वर्ष में विकास दर के अपेक्षा से कम रहने का खतरा भी पैदा हो सकता है.

इसके अलावा वैट घटाने से राज्यों की पहले से खराब वित्तीय सेहत के और पस्त होने की आशंका है. इसका भी दबाव केंद्र सरकार पर पड़ने की आशंका है. जानकारों के अनुसार इसी वजह से मोदी सरकार जितना हो सके करों को कम करने को टालती रही है. लेकिन इसी साल होने वाले चार राज्यों के चुनाव और अगले साल होने वाले आम चुनावों की वजह से मोदी सरकार को अब तेल के दाम कम करने ही पड़ेंगे. केंद्र सरकार के ऐसा करने की एक वजह महंगाई भी हो सकती है. केयर रेटिंग्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि पेट्रोलियम उत्पादों के महंगे होने से देश की खुदरा महंगाई पहले के अनुमान से आधा फीसदी ज्यादा रह सकती है. जानकारों के अनुसार इस आशंका ने भी केंद्र सरकार की चिंता काफी बढ़ा दी है.