करीब एक साल पहले तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने कश्मीर घाटी में विस्टाडोम कोच वाली ट्रेन चलाने का एेलान किया था. पिछले साल 29 जून को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये कश्मीर में कुुछ नए रेलवे स्टेशनों का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा था, ‘घाटी में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिहाज से विस्टाडोम कोच काफी मददगार होंगे.’ बड़ी-बड़ी कांच की खिड़कियों वाले इस एयरकंडीशंड कोच की छत भी कांच की होती है ताकि पर्यटक बाहर के नजारों का ज्यादा से ज्यादा लुत्फ ले सकें.

घोषणा के एक साल बाद विस्टाडोम कोच घाटी में पहुंच गए हैं. संभावना जताई जा रही है कि जल्द ही इन्हें पटरी पर उतार दिया जाएगा. राज्य के पर्यटन विभाग का मानना है कि ये कोच पर्यटन क्षेत्र में नई जान फूंक देंगे. घाटी के पर्यटन विभाग के निदेशक महमूद शाह कहते हैं, ‘ये कोच कश्मीर में पर्यटन की संभावना को और बेहतर बनाएंगे और इससे ज़्यादा पर्यटक कश्मीर की तरफ आकर्षित होंगे.’

लेकिन क्या वाक़ई ऐसा होगा? खूबसूरती के लिहाज़ से देखा जाए तो इस कोच के लिए कश्मीर से बेहतर जगह भला क्या हो सकती है. लेकिन घाटी में सिर्फ खूबसूरती ही नहीं बल्कि हिंसा भी भरपूर है. इस हिंसा का खामियाज़ा बाकी सारी चीज़ों के साथ साथ रेलवे को भी भुगतना पड़ रहा है. किसी और पर्यटन स्थल पर इन कोच का आना गर्व और खुशी की बात होती. लेकिन कश्मीर में उत्तर रेलवे के अधिकारियों के लिए यह चिंता की बात बनी हुई है.

कश्मीर में हिंसा के चलते रेलवे को वैसे ही खासा नुकसान हो रहा है. तिस पर इन नए कांच वाले कोचों की सुरक्षा की चिंता. यही वजह है कि उत्तर रेलवे के श्रीनगर के चीफ एरिया मैनेजर, हरिमोहन ने लोगों से इस कोच की सुरक्षा के लिए ख़ास अपील की है. उनका कहना है, ‘यह सार्वजनिक संपत्ति है और लोगों को इसकी सुरक्षा का ज़िम्मा खुद उठाना चाहिए. अगर इस कोच का एक भी कांच टूट जाता है तो हमें इसको तब तक रोकना पड़ेगा जब तक वह कांच वापस न लग जाए.’

लेकिन सवाल उठता है कि क्या एक अपील भर से इस कोच की सुरक्षा की चिंता दूर हो जाएगी? घाटी में फिलहाल चल रही ट्रेनों में पिछले तीन साल में हुई पत्थरबाज़ी में 1000 से अधिक कांच टूटे हैं. इसके अलावा कांच टूटना ही एक मसला नहीं है. पिछले तीन सालों में घाटी में रेलवे को करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ा है. महीनों यहां के रेलवे ट्रैक प्रदर्शनों के चलते, खाली पड़े रहतेे हैं.

कश्मीर घाटी में रेल का आगमन एक दशक पहले 2008 में हुआ था. चार अलग-अलग फेज में अब यहां का रेलवे नेटवर्क बनिहाल और बारामुला के बीच 140 किलोमीटर का हो गया है. जैैसेे-जैसे लोगों की निर्भरता ट्रेनों पर बढ़ रही है, वैसे-वैसे रेल सुविधा प्रदर्शनकारियों के निशाने पर अाती जा रही है.

पिछले दिनों नौ मई को श्रीनगर से बनिहाल जा रही ट्रेन पर दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में बिजबेहड़ा के पास जमकर पथराव हुआ. यहां एक मिलिटेंट के मारे जाने पर प्रदर्शन हो रहे थे. प्रदर्शनकारियों ने न सिर्फ ट्रेन पर पत्थर मारे बल्कि रेलवे के सिग्नल सिस्टम और पटरियों को भी नुकसान पहुंचाया.

बड़गाम में तैनात एक रेलवे अधिकारी ने सत्याग्रह को बताते हैं, ‘सिर्फ आधे घंटे में रेलवे को सात लाख रुपए से अधिक का नुकसान हुअा. तीन दिन तक रेल सेवा भी बंंद करनी पड़ी.’ और जगहोंं पर एेसा कभी-कभार ही होता है, लेकिन घाटी में यह नुकसान नियमित रूप से होता रहता है. आंकड़ों केे मुताबिक पिछले तीन साल में उत्तर रेलवे के कश्मीर चैप्टर को कम से कम 8.5 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है.

ये अधिकारी कहते हैं, ‘पिछले तीन साल में पत्थरबाज़ी में टूटे खिड़कियों के शीशों से ही क़रीब 1.5 करोड़ का नुकसान हुआ है. एक खिड़की 15000 में नयी लगती है. 50 हजार रुपये की कीमत वाले पांच फ्रंट ग्लास पथराव में टूट गए. इसके अलावा पिछले तीन साल में रेलवे ट्रैक के डेढ़ लाख से अधिक इलास्टिक रेल क्लिटस (ईआरसी) प्रदर्शनों के दौरान निकाल लिए गए हैं. एक ईआरसी 55 रुपए का मिलता है. छोटी सी ईआरसी सेे भी रेलवे को 82 लाख 50 हज़ार का नुकसान उठाना पड़ा.’

कश्मीर घाटी में इन सामानों की कीमत ज्यादा हो जाती है क्योंकि यह सामान दिल्ली के शकूर बस्ती डिपो से आता है या फिर लखनऊ के चारबाग डिपो से. सामान घाटी तक पहुंचने में काफी वक्त लग जाता है क्योंकि अन्य राज्यों से घाटी को अभी तक कोई सीधा ट्रेन लिंक नहीं जोड़ता है. बड़गाम में तैनात ये अधिकारी कहते हैं, ‘यही वजह है कि यहां ज्यादातर ट्रेनों में कांच की जगह प्लाईवुड लगा हुआ है.’

लंबे प्रशासनिक विचार-विमर्श के बाद अब यह रास्ता निकाला गया है कि किसी भी प्रदर्शन या हड़ताल की सूचना मिलते ही रेल सेवा तुरंत बंद कर दी जाए. लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह रास्ता ठीक है. प्रशासन का कहना है कि इसके अलावा कोई रास्ता है भी नहीं. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘इससे कम से कम हम यात्रियों को तो सुरक्षित रख पाते हैं.’

2016 के बाद से ही घाटी में रेल सेवा और इंटरनेट बंद कर देना अाम हो गया है. छोटी सी घटना की सूचना मिलने पर रेल सेवा बंद कर दी जाती है. आठ जुलाई 2016 को जब मिलिटेंट कमांडर बुरहान वानी मारा गया था तो ट्रेन सेवाएं भी उसी दिन स्थगित कर दी गयी थीं जो करीब चार महीने बाद बहाल हो पाई थीं.

एक रेलवे अधिकारी के मुताबिक घाटी में रेल सेवा स्थगित होने से एक दिन में रेलवे को लगभग तीन लाख रुपए का नुकसान होता है. 2016 में ट्रेन सेवा बंद रहने से रेलवे को तीन करोड़ 90 लाख रुपए का नुकसान उठाना पड़ा था. 2017 में भी रेल सेवाएं क़रीब 56 दिन आंशिक रूप से या पूर्ण रूप से स्थगित रहीं. अधिकारियों केे मुताबिक आंशिक रूप से सेवा स्थगित होने पर भी नुकसान लगभग उतना ही होता है क्योंकि श्रीनगर-बनिहाल ट्रैक पर सेवा रोकनी ही पड़ती है और 80 प्रतिशत राजस्व इसी हिस्से से आता है. 2018 में अभी तक रेल सेवाएं 40 से ज़्यादा दिन बंद रही हैं. 2017 और 18 का कुल हिसाब लगाएं तो सेवाएं स्थगित होने से रेलवे को अब तक क़रीब दो करोड़ से ऊपर का नुकसान हो चुका है.

हम रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी से पूछते हैं कि क्या ऐसे में विस्टाडोम कोच चलाना ठीक होगा. उनका जवाब आता है कि कि ये सब राजनीतिक फैसले होते हैं जिन पर उनका बस नहीं होता. वे चिल्ड्रेन्स स्पेशल ट्रेन की मिसाल देते हैं. यह ट्रेन पिछले साल अप्रैल में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती के ज़ोर देने पर चलायी गयी थी. इस अधिकारी का कहना था, ‘वह भी एक राजनीतिक फैसला था. बहुत राजनीतिक धूमधाम के बावजूद भी वह ट्रेन एक ही दिन चलने के बाद बंद हो गई.’

क्या विस्टाडोम कोच वाली ट्रेन का भी वही हश्र होने वाला है? इस सवाल पर वे मुस्करा कर चुप हो जाते हैं.