पूरी ताकत लगाने के बावजूद भले ही कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी सरकार नहीं बचा पाई लेकिन, पार्टी नेताओं को अब भी लग रहा है कि जल्द ही राज्य में फिर से भाजपा सरकार बन सकती है. विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जब भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो भी पार्टी ने पूरी कोशिश की कि गोवा, मणिपुर और मेघालय की तर्ज पर कर्नाटक में भी भाजपा सरकार बन जाए. इन राज्यों में बहुमत से दूर रहने के बावजूद भाजपा ने सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की थी.

लेकिन कर्नाटक में ऐसा नहीं हो पाया. भाजपा ने राज्यपाल की मदद से अपने नेता बीएस येद्दियुरप्पा को मुख्यमंत्री की कुसी तक तो पहुंचा दिया लेकिन, देश की सर्वोच्च अदालत के दखल के बाद बहुमत साबित करने का वक्त कम किया गया और येद्दियुरप्पा को बहुमत साबित करने के पहले ही इस्तीफा देना पड़ा. इसके बाद कर्नाटक में कांग्रेस के समर्थन से जनता दल सेकुलर के एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में नई सरकार बनी. नतीजतन भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ रहा है.

लेकिन इसके साथ ही पार्टी के अंदर यह बात भी चल रही है कि जैसे सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद अरुणाचल प्रदेश में भाजपा समर्थित सरकार सत्ता से बेदखल हो गई थी और कुछ महीने बाद वहां फिर से भाजपा सरकार बनी, उसी तरह की स्थिति कर्नाटक में बन सकती है. भाजपा पर आरोप है कि पहले उसने अरुणाचल प्रदेश में चल रही सरकार को अस्थिर कराया और विधायकों को अपने पाले में लाकर भाजपा समर्थित सरकार बनवाई. यह सरकार सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद गिर गई. शीर्ष अदालत ने तब पुरानी सरकार को बहाल कर दिया था. लेकिन कुछ ही महीने के अंदर फिर से वहां विधायकों का दल-बदल कराके भाजपा ने फिर से अपनी सरकार बना ली. इसी का उदाहरण देकर भाजपा के अंदर यह बात चल रही है कि कर्नाटक में भी भाजपा आने वाले महीनों में सरकार बनाने की कोशिश कर सकती है.

इस बारे में भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘राजनीति संभावनाओं का खेल है. ऐसे में कुछ भी असंभव नहीं है. अरुणाचल मामले में जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला हमारे खिलाफ गया तो सबको यह लगा कि भाजपा के लिए एक बड़ा झटका है. उस वक्त भी पूर्वोत्तर में हमारे नेता हेमंत बिस्वा सरमा ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि अरुणाचल की कहानी का अंत अभी बाकी है. इसी तरह कर्नाटक को लेकर भी पार्टी के अंदर यही राय है कि यहां की कहानी का अंत अभी बाकी है.’

वे आगे कहते हैं, ‘अभी भाजपा का प्रबंधन जिन वरिष्ठ नेताओं के हाथ में है, वे बहुत कुशल हैं. 2015 के बिहार विधानसभा के नतीजों के बाद किसने सोचा था कि दो साल के अंदर भाजपा बिहार की सत्ता में वापस आ जाएगी. लेकिन ऐसा हो गया. इसलिए कर्नाटक में भी अगर कुछ महीने के अंदर भाजपा सत्ता में आ जाए ​तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए. आपको क्या लगता है कि कर्नाटक में जो कुछ भी हुआ और इतनी मेहनत के बाद भी सरकार नहीं बन पाई, इसे भाजपा और पार्टी नेतृत्व भूल जाएगा और हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा?’

सियासी समीकरणों को देखने पर उनकी यह बात कुछ-कुछ समझ में आती है. कर्नाटक में सिर्फ 222 सीटों पर चुनाव हुए थे. जबकि सीटें हैं 224. कर्नाटक के मुख्यमंत्री बनने जा रहे जनता दल सेकुलर के एचडी कुमारस्वामी दो सीटों से चुनाव लड़े थे. एक सीट उन्होंने खाली की है. इसका मतलब यह हुआ कि कर्नाटक में तीन सीटों पर चुनाव होने हैं.

भाजपा की कोशिश इन तीनों सीटों पर जीत हासिल करने की है. इसके अलावा प्रदेश के दो निर्दलीय विधायकों और बहुजन समाज पार्टी के एक विधायक पर भी भाजपा की नजर है. भाजपा नेताओं को लगता है कि अगर पार्टी ने तीनों सीटें किसी तरह जीत लीं और इन दो निर्दलीय और बसपा के एक विधायक को अपने पाले में ले आया तो उसके पक्ष में 110 विधायक हो जाएंगे. कर्नाटक विधानसभा में आने वाले एक एंग्लो—​इंडियन विधायक को भी जोड़ लें तो विधानसभा में कुल विधायक होंगे 225. इस स्थिति में बहुमत का आंकड़ा होगा 113.

ऐसे में अगर भाजपा 110 पर पहुंच जाती है और किसी तरह कांग्रेस और जेडीएस के पांच-छह विधायकों को तोड़कर उनका इस्तीफा दिला देती है तो वह कुमारस्वामी सरकार को अस्थिर करके फिर से कर्नाटक में सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है. क्योंकि विधानसभा में विधायकों की संख्या कम होने से बहुमत का आंकड़ा भी उसी अनुपात में कम होगा. ऐसे में 110 विधायकों के साथ भाजपा सरकार बनाने की कोशिश कर सकती है.

हालांकि, अभी की स्थिति में भाजपा की इस योजना का परवान चढ़ना थोड़ा मुश्किल जरूर लगता है लेकिन अरुणाचल प्रदेश में जो हुआ था, उसे देखते हुए यह बिल्कुल असंभव भी नहीं लगता.