देह व्यापार से जुड़ी खौफनाक कहानियां सुनना, पढ़ना और देखना कब आसान रहा है! हमारे यहां कई वृत्तचित्र समाज के वहशीपन को उसकी संपूर्णता में नग्न करते आए हैं और देखने वाले कई दिनों तक सिहरते रहे हैं. ‘इंडियाज डॉटर’ ने कुछ साल पहले ऐसा किया था कि सबसे ज्यादा पढ़े, देखे और सुने गए निर्भया रेप केस के आरोपितों को वाया कैमरा हमारे सामने लाकर खड़ा कर दिया था और हमारे रोंगटे खड़े हो गए थे. साथ ही महानगरों में मौजूद जीबी रोड, सोनागाछी और कमाठीपुरा जैसे देह व्यापार के सबसे बड़े इलाकों की अंदरूनी कहानियां कहने वाली रिपोर्ट्स अक्सर अंदर तक हमें दहलाती रही हैं और कई किताबें हैं जिन्होंने देह व्यापार के बाजारों की खौफनाक सच्चाइयां तफ्सील से लिखकर हमें निरुत्तर किया है. 2012 में आई पत्रकार-लेखिका सोनिया फिलेरो की बेहतरीन रिपोर्ताज किताब ‘ब्यूटीफुल थिंग’ शायद आपको याद हो, जिसने मुंबई के डांस बार की भीतरी दुनिया को बेहद बारीकी से उजागर किया था.

डिजिटल डॉक्यूमेंट्री ‘अमोली’ इन सब से कुछ अलग है, क्योंकि यह मासूम बच्चे-बच्चियों के देह व्यापार का हिस्सा बनने की कहानियों को दिखाती है. और सबसे अलग है, क्योंकि एक समाधान भी देती है जिसका पालन करने पर इस अनैतिक और गैरकानूनी व्यापार का फलना-फूलना कम हो सकता है. यह बड़ी बात है, क्योंकि देह व्यापार से जुड़े ज्यादातर वृत्तचित्र, फीचर फिल्में और किताबें हमें त्रासद सच्चाइयां दिखाकर निरुत्तर तो कर देते हैं, लेकिन समाधान उनके पास कभी नहीं होता.

‘अमोली’ जब पीड़ित बच्चियों की दिल दहला देने वाली कहानियां सुना रही होती है, उनके परिवार से हमें मिला रही होती है, दलालों के छिपे चेहरे दिखाने लगती है, देह व्यापार के खिलाफ लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं की चिंताओं की तहरीरें पढ़ रही होती है और पुलिस व कानून की सही मदद ले रही होती है तब वो इस बुराई से लड़ने का उपाय भी बता रही होती है. ऐसा उपाय, जिसपर जितना जल्दी अमल हो उतना बेहतर.

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‘अमोली’ को जिन जैसमीन कौर रॉय ने लिखा और निर्देशित किया है, उन्होंने सिनेमा की पढ़ाई एफटीआईआई, पुणे से की है और वहीं बनाई उनकी डिप्लोमा फिल्म ‘सांझ’ को 2005 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया था. उनके साथ मिलकर अविनाश रॉय ने इसे लिखा और निर्देशित किया है जो कि खुद भी एफटीआईआई के भूतपूर्व छात्र हैं. डॉक्यूमेंट्री निहायत ही खूबसूरती से शूट की गई है – उच्च स्तर का कैमरा, उसका बेहद धीमी गति से अपने सब्जेक्ट के पास जाना या दूर होना, नयनाभिराम लैंडस्कैप और दबे हुए रंगों को भी उभारने का सलीका – लेकिन ऐसा असल में विरोधाभास क्रिएट करने के लिए किया गया है - एक सिनेमैटिक हथियार जिसमें कि दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी को सबसे खूबसूरत फ्रेमों में सजाकर दर्शकों को झकझोरा जाता है. ‘अमोली’ यह काम करने में बेहद सफल रहती है और इस वृत्तचित्र का असल हासिल आपको उस इनवेस्टिगेटिंग ऑफिसर की बातों में मिलता है जो कहता है, ‘जब तक आप कस्टमर को सजा नहीं देंगे तब तक देह व्यापार में डिमांड कम नहीं होगी.’

वृत्तचित्रों की विशालता के मुकाबले केवल 30 मिनट अवधि की छोटी-सी ‘अमोली’ को कई भाषाओं में रिलीज किया गया है - क्योंकि यह बुराई पूरे हिंदुस्तान में फैली है, तमिल वर्जन को जहां अभिनेता कमल हासन अपनी आवाज देते हैं, कन्नड़ को पुनीत राजकुमार, बंगाली को जीशू सेनगुप्ता, वहीं अंग्रेजी वर्जन में विद्या बालन ने सूत्रधार की भूमिका निभाई है. लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावी वॉइस ओवर राजकुमार राव का कहलाएगा जिनकी आवाज हिंदी वर्जन में वैसी ही ईमानदारी और सामाजिक प्रतिबद्धता लेकर आती है जैसी ‘न्यूटन’ में वे सशरीर लेकर आए थे. इसीलिए दृश्यों के साथ-साथ चलती उनकी धीर-गंभीर आवाज में जब सुनने को मिलता है - ‘ये सिर्फ एक स्टेटिस्टिक्स नहीं...गौर करें तो हर नम्बर के पीछे एक बच्चे की कहानी होती है’, या फिर, ‘नीलम की यह हंसी भी एक माया है’ - तो आपकी रूह देर तक कांपती रहती है.