भारत सरकार का सपना है कि साल 2025 तक वह देश को टीबी यानी तपेदिक से पूरी तरह मुक्त कर ले. लेकिन टीबी से मुक्ति पाने की यह राह मुश्किल नजर आती है. इसकी वजह इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्ट टीबी ऐंड लंग डिजीज की एक रिपोर्ट है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2016 में भारत में टीबी से ग्रस्त करीब 1.2 लाख बच्चों की पहचान की गई. ये बच्चे 14 साल की उम्र तक के थे. बच्चों में टीबी के मामलों को लेकर इस रिपोर्ट में एक सूची भी दी गई है जिसमें भारत को दुनियाभर के देशों में पहले स्थान पर रखा गया है. भारत से ज्यादा आबादी वाला चीन दूसरे स्थान पर है. हालांकि वहां बच्चों में टीबी के नए मामले भारत की तुलना में आधे से भी कम हैं.

द टाइम्स आॅफ इंडिया के मुताबिक बुधवार को यह रिपोर्ट जिनेवा में चल रही विश्व स्वास्थ्य गोष्ठी में पेश की गई. ‘द साइलेंट एपिडेमिक : अ कॉल टु एक्शन अगेंस्ट चाइल्ड टीबी’ नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनियाभर के बच्चों में हर साल टीबी के करीब 10 लाख नए मामले सामने आ जाते हैं. ऐसे हर चार बच्चों में एक की मौत हो जाती है. यही नहीं, टीबी से ग्रस्त करीब 90 फीसदी बच्चों को इलाज ही नहीं मिल पाता और भारत भी इससे अछूता नहीं है.

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि कई बार फेफड़ों के टीबी से ग्रस्त बच्चों को वक्त पर इलाज न मिलने से यह बीमारी हड्डियों, जोड़ों और दिमाग तक पहुंच जाती है. ऐसी स्थिति में इलाज बहुत मुश्किल हो जाता है. उधर यूनियन अगेंस्ट टीबी की साइंटिफिक डायरेक्टर डॉक्टर पाउला फुजीवारा के मुताबिक टीबी के लिहाज से बच्चों की अनदेखी इसलिए भी होती है क्योंकि वयस्कों की तुलना में वे संक्रमण की चपेट में कम आते हैं. इसके अलावा बच्चों में इस बीमारी का पता लगाने के लिए वयस्कों के लिए अपनाई जाने वाली जांच की प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है. पाउला मानती हैं कि इस प्रक्रिया में बदलाव लाने की जरूरत है.

बताया गया है कि इस कार्यक्रम में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी हिस्सा लिया था. रिपोर्ट के आंकड़ों को जानने के बाद उन्होंने कहा है कि टीबी को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार तेजी से अभियान चलाएगी. साथ ही इस बीमारी से मुक्ति के लिए जिला स्तर से ही बच्चों में टीबी के लक्षणों की पहचान और फिर इलाज की व्यवस्था की जाएगी.

उधर विश्व स्वास्थ्य संगठन में उप महानिदेशक और टीबी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सौम्या स्वामीनाथन कहती हैं कि इस बीमारी से मुक्ति के लिए इसकी रोकथाम की दिशा में किए जाने वाले प्रयासों को बढ़ाना होगा. उनका कहना है, ‘झुग्गी बस्तियों जैसे जिन इलाकों में इस बीमारी का ज्यादा खतरा है वहां घर-घर जाकर संपर्क करना होगा. यह काम कुछ मश्किल है लेकिन परिवार के स्तर पर जांच के बाद पीड़ित का सही और पूरा इलाज सुनिश्चित करना होगा.’ उनका यह भी कहना है कि टीबी का इलाज अब और आसान हो गया है क्योंकि इलाज का वक्त घटा है और दवाइयों की गुणवत्ता भी बढ़ी है.