प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के चार साल पूरे हो चुके हैं. भाजपा अपनी सरकार को जबरदस्त कामयाब बताते हुए कई उपलब्धियां गिना रही है. ऐसा करते वक्त उसका सबसे ज्यादा जोर आर्थिक मोर्चे पर दिख रहा है. इसके लिए वह कई आंकड़े भी पेश कर रही है. इनमें विकास दर और वित्तीय घाटे के आंकड़ों से लेकर नोटबंदी और जीएसटी जैसे विवादास्पद फैसले भी शामिल हैं. इसके अलावा करोड़ों लोगों को एलपीजी कनेक्शन देने की पहल सहित हर गांव तक बिजली पहुंचाने की उपलब्धि भी सरकार के दावों में शुमार है. लेकिन मुद्रा योजना के तहत बांटे गए लोन को छोड़कर रोजगार के मामले में खुद मोदी सरकार ही ज्यादा दावे नहीं कर रही है.

सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए अर्थशास्त्रियों का भी दावा है कि रोजगार के मामले में मोदी सरकार को कामयाब नहीं कहा जा सकता. खासकर तब जब आगरा में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए 22 नवंबर, 2013 को नरेंद्र मोदी ने दावा किया था कि यदि भाजपा की सरकार बनी तो हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार दिया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा था कि देश की आबादी में 35 साल से कम के 65 फीसदी लोग हैं, लेकिन कांग्रेस की सरकार युवाशक्ति का राष्ट्रनिर्माण में उपयोग करने में नाकाम रही है. उन्होंने मनमोहन सरकार पर ‘जॉबलेस ग्रोथ’ का आरोप जड़ा था.

हालांकि चार साल बाद अब मोदी सरकार के बारे में आंकड़े बता रहे हैं कि इन चार सालों में कुल मिलाकर भी दो करोड़ रोजगार सृजित नहीं हो सके हैं. यही वजह है कि आलोचकों का मानना है कि केंद्र सरकार यदि दोबारा सत्ता में आना चाहती है तो उसे रोजगार बढ़ाने के लिए जल्द ही कुछ ठोस उपाय करने होंगे और ऐसा न हुआ तो नाराज युवा केंद्र की सत्ता में उसकी वापसी पर ग्रहण लगा सकते हैं.

वैसे ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मैक्रोइकनॉमिक आंकड़ों के लिहाज से आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार का प्रदर्शन ठीक-ठाक कहा जा सकता है. खासकर तब जब वित्त वर्ष 2012 से 2014 के बीच अ​र्थव्यवस्था की हालत बदतर हो गई थी. लेकिन अब सरकार के समर्थक भी कह रहे हैं कि पिछले चार साल में अर्थव्यवस्था सुधरने के बाद भी सरकार पर्याप्त रोजगार देने में कामयाब नहीं हो सकी है.

हालांकि भारत में रोजगार पर किसी विश्वस्त और विस्तृत सर्वेक्षण के अभाव में इसकी सही स्थिति का आकलन कर पाना हमेशा से एक मुश्किल काम रहा है. लेकिन कुछ महीने पहले आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बीते चार सालों में केवल 36 लाख सालाना की दर से ही रोजगार पैदा हो पाए हैं. वहीं लेबर ब्यूरो के अनुसार अर्थव्यवस्था में आठ फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले संगठित क्षेत्र में 2014 से 2016 के बीच तीन लाख से भी कम की औसत से रोजगार पैदा हुए हैं. वित्त वर्ष 2014-15 में यह आंकड़ा 4.93 लाख का था जबकि इसके अगले दो साल यह आंकड़ा महज 1.55 और 2.31 लाख तक सिमटकर रह गया. हालांकि संगठित क्षेत्र के आकार और प्रधानमंत्री के वादे को देखते हुए इससे हर साल करीब 16 लाख रोजगार पैदा करने की जरूरत थी.

भारतीय रिजर्व बैंक भी अपने एक अध्ययन में 2014 से 2016 के बीच कम रोजगार पैदा होने की बात मान चुका है. वहीं नोटबंदी और जीएसटी के चलते 2016 के अंत से अब तक असंगठित क्षेत्र में भी रोजगार की संभावनाएं नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई हैं. इसके अलावा पिछले चार साल में अर्थव्यवस्था के अपेक्षित गति से वृद्धि न करने से भी देश में बेरोजगारी का औसत प्रतिशत लगातार बढ़ा है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार 2014 में देश में बेरोजगारी की दर 3.41 फीसदी थी जो अगले तीन सालों (2015, 2016 और 2017) में बढ़ते हुए 3.49, 3.51 और 3.52 फीसदी हो गई. हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाली निजी एजेंसी सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी (सीएमआईई) के बेरोजगारी संबंधी आंकड़े आईएलओ से करीब एक फीसदी ज्यादा हैं. सीएमआईई यह भी कहती है कि अप्रैल 2018 में देश में 5.86 फीसदी बेरोजगारी थी. वैसे अर्थशास्त्रियों का मानना है कि किसी भी अच्छी अर्थव्यवस्था में चार फीसदी से ज्यादा बेरोजगारी ठीक नहीं होती है.