2014 में पहली बार ऐसा मौका आया जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजनीतिक संगठन - भारतीय जनता पार्टी - को केंद्र में सरकार बनाने के लिए पूर्ण बहुमत मिला. इसके पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में जो सरकार बनी थी वह कई दलों के सहयोग पर टिकी थी. लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बन कर चल रही भाजपा की वर्तमान सरकार को किसी के समर्थन की दरकार नहीं है.
ऐसे में स्वाभाविक ही था कि संघ को केंद्र की अपनी पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार से खासी उम्मीदें थीं. इन उम्मीदों को सरल भाषा में समझाते हुए दिल्ली प्रदेश में संघ का काम देखने वाले एक पूर्णकालिक प्रचारक कहते हैं, ‘संघ में यह स्वाभाविक उम्मीद थी कि राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार-प्रसार होगा. संघ की शाखाओं का विस्तार होगा और समाज में जिन वर्गों तक संघ पहुंच नहीं पाया है, वहां तक वो पहुंच पाएगा. साथ ही करोड़ों हिंदुओं की आस्था के विषय राम मंदिर के भी निर्णायक मोड़ पर पहुंचने की उम्मीद थी. कश्मीरी पंडितों को न्याय और समान नागरिक संहिता की दिशा में भी कुछ किए जाने की उम्मीद थी. प्रखर राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक नीतियों की भी अपेक्षा थी.’
तो क्या मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल में ये उम्मीदें पूरी हुईं या इस सरकार ने इन उम्मीदों को पूरा करने की दिशा में काम किया? इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं, ‘जाहिर है किसी भी सरकार के लिए इन्हें पूरा कर पाना आसान नहीं है. लेकिन इतना जरूर है कि संघ के एक आम कार्यकर्ता में इनके पूरा होने को लेकर विश्वास जगा है. राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को हमेशा से एक खेमा बहुत संकुचित दायरे में राजनीतिक चश्मे से देखने का अभ्यस्त रहा है. इस वजह से ये मुद्दे विवादास्पद हो जाते हैं. लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि एक राष्ट्रवादी चेतना का उभार इस सरकार के कार्यकाल में दिख रहा है.’
वे आगे कहते हैं, ‘आर्थिक मोर्चे पर सरकार की नीतियों को लेकर संघ में भ्रम की स्थिति है या यों कहें कि थोड़ी असहमति है. नोटबंदी का निर्णय काला धन की समस्या से लड़ने के लिए लिया गया लेकिन इससे सबसे अधिक परेशानी आम लोगों को और छोटे कारोबारियों को हुई. ऐसे ही जीएसटी से भी सबसे अधिक परेशान छोटे कारोबारी हुए. विदेशी निवेश को लेकर भी कई विषय ऐसे हैं जिस पर और समग्रता के साथ देखे जाने की जरूरत है.’
यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पिछली विजयादशमी पर जो भाषण दिया था, उसमें उन्होंने जीएसटी के क्रियान्वयन को लेकर कुछ सवाल खड़े किए थे. उन्होंने कहा था कि छोटे कारोबारियों के लिए काम करना आसान हो ऐसे उपाय किए जाने चाहिए न कि उनके कामकाज में दिक्कतें पैदा करने वाले निर्णय होने चाहिए. उनके इस भाषण के बाद जीएसटी में कुछ ऐसे बदलाव किए गए जिनसे छोटे कारोबारियों के लिए इसके तहत काम करना थोड़ा आसान हो गया.
मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल में संघ पदाधिकारियों और इसके स्वयंसेवकों में नरेंद्र मोदी को लेकर अलग-अलग राय बनती दिख रही है. बिहार में संघ का काम देख रहे एक प्रचारक इस बारे में बताते हैं, ‘संघ के कुछ पदाधिकारियों और कई स्वयंसेवकों को यह लगता है कि नरेंद्र मोदी औऱ अमित शाह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन को अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं और इस वजह से वे अपने करीबियों को इसमें प्रमुख पदों पर बैठाना चाहते हैं. इसके चलते पिछले कुछ महीनों में संघ के कुछ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं में नरेंद्र मोदी के प्रति नकारात्मकता की भावना बढ़ी है. इस धारा के लोगों को लगता है कि भाजपा पर संघ को और कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए.’
संघ के लोगों से इस मामले में और बात की जाए तो वे सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले का नाम लेते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह इसी साल मार्च में सुरेश भैयाजी जोशी के स्थान पर होसबोले को संघ का सरकार्यवाह यानी नंबर दो बनवाना चाहते थे. लेकिन अंत में संघ के अंदर इसे भाजपा का अतिक्रमण माना गया और दत्तात्रेय होसबोले सरकार्यवाह बनते-बनते रह गए.
मोदी सरकार के प्रति दूसरी तरह की राय रखने वालों के बारे में बिहार के प्रचारक बताते हैं, ‘संघ के अंदर कुछ लोग ऐसे हैं जो सत्ता प्रतिष्ठान से अपनी नजदीकी का फायदा निजी लाभ के लिए उठा रहे हैं. ऐसे लोगों का प्राथमिक लक्ष्य यही है कि किसी भी कीमत पर भाजपा सत्ता में बनी रहे. और इसके लिए उन्हें नरेंद्र मोदी सबसे उपयुक्त व्यक्ति लगते हैं.’
संघ के कई स्वयंसेवकों से बातचीत करने पर यह पता चलता है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों की तरक्की हुई है. सरकारी संस्थानों में जिन पदों पर सरकार नियुक्ति कर सकती है, वहां संघ से जुड़े लोगों को रखा जा रहा है. देश के ज्यादातर बड़े संस्थानों में संघ की विचारधारा की वकालत करने वाले लोगों को प्रमुख पद मिल रहे हैं. सरकारी विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर से लेकर कुलपति तक के पद पर संघ की विचारधारा वाले लोगों की नियुक्तियां हो रही हैं.
जाहिर सी बात है कि संघ के भीतर मौजूद यह वर्ग खुद को मिल रहे फायदों की वजहों से मोदी सरकार की तारीफ करता दिख रहा है लेकिन दूसरी तरह वैचारिक प्रतिबद्धता वाले लोग उसे अपनी अपेक्षाओं पर उस तरह से खरा उतरता नहीं देख रहे हैं जिस तरह से वे चाहते हैं.
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