गुजरात के वड़गाम से विधायक जिग्नेश मेवानी दलित युवक मुकेश वानिया के परिवार को ढांढस बंधाने सुरेंद्रनगर स्थित उसके पैतृक गांव पहुंचे हैं. कबाड़ बीनने का काम करने वाले वानिया को बीते दिनों राजकोट में चोरी के शक के चलते पीट-पीट कर मार दिया गया था. स्थानीय भीड़ से मुख़ातिब होते मेवानी की बातों से प्रदेश सरकार के खिलाफ़ जबरदस्त आक्रोश झलक रहा है. उन्हें लंबे समय से देख रहे एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि उनका अंदाज आज भी वैसा ही आक्रामक है जो उना कांड के समय देखने को मिला था, लेकिन उनके तेवर कहीं ज्यादा तीखे हो गए हैं.

गुज़रे साल यानी 2017 की आखिरी तिमाही में देशभर के राजनीतिकारों की निगाहें जिस युवा तिकड़ी पर टिकी थीं उसमें हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर के साथ जिग्नेश मेवानी भी शामिल थे. हालांकि शुरुआत में राजनीतिक अहमियत के लिहाज से मेवानी को हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर के बाद जगह मिलती थी. लेकिन गुजरात विधानसभा चुनाव आते-आते वे इन दोनों कद्दावर युवा नेताओंं के बराबर दिखने लगे और अब वे उनसे आगे खड़े नज़र आते हैं.

कारण

इसकी वजह के तौर पर जानकार इन तीनों के व्यक्तित्व से लेकर राजनैतिक लक्ष्यों के बीच के अंतर को गिनाते हैं. गुजरात के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘अल्पेश ठाकोर की राजनैतिक पृष्ठभूमि कांग्रेस से ही जुड़ी रही है. बीच में वे कुछ समय के लिए पार्टी से दूर हुए लेकिन आखिर में फिर वहीं आ पहुंचे. एक तरह से देखा जाए तो उनका सियासी लक्ष्य विधायक बनने तक का था जिसके पूरा होने पर वे लगभग निष्क्रिय हो चुके हैं.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘यदि हार्दिक पटेल की बात की जाए तो उनका लक्ष्य पाटीदारों को आरक्षण दिलवाना है. लेकिन इस तरह के आंदोलनों की धार लंबे समय तक नहीं रहती. उदाहरण के लिए राजस्थान के गुर्जर आरक्षण आंदोलन को देखा जा सकता है. इसमें भी यदि भाजपा सरकार पाटीदारों की मांग का कोई तोड़ निकाल लेती है तो फिर हार्दिक के लिए अपना जनाधार बचाए रखना एक बड़ी चुनौती साबित होगा.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘लेकिन जिग्नेश मेवानी ने शुरू से ही दलित हितों के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों को पकड़े रखा है जो लंबे समय तक उनकी प्रासंगिकता बनाए रखने में मदद करेंगे.’

जानकार बताते हैं कि विधायक बनने के बाद भी जिग्नेश मेवानी ने छोटे-बड़े जमीनी आंदोलनों में सक्रिय रहना नहीं छोड़ा है, लेकिन हार्दिक और अल्पेश इस मोर्चे पर अब शिथिल होने लगे हैं. इस बात का उदाहरण देते हुए गुजरात के सामाजिक कार्यकर्ता कलीम सिद्दीकी कहते हैं कि अपनी शुरुआत से लेकर अब तक जिग्नेश मेवानी ने दलितों को भूमि दिलवाने से जुड़े लैंड मूवमेंट यानी जमीन आंदोलन को लगातार जारी रखा है. इस आंदोलन का उद्देश्य भूमि अधिग्रहण बिल के तहत दलित और पिछड़ों को आवंटित हो चुकी भूमि को अलग-अलग तरह के कब्ज़ों से छुड़वाना है. सिद्दीकी कहते हैं, ‘पिछली आधी सदी के दौरान कई नेता इस मुहिम से आकर जुड़े थे, फिर धीरे-धीरे उनमें से अधिकतर गायब होते चले गए. लेकिन विधायक बनने के बाद मेवानी ने इस मुद्दे को लेकर प्रदेश सरकार पर इतना दबाव बनया कि उसे छह महीनों के अंदर दलितों को उनकी जमीन दिलवाने का आश्वासन देने के लिए मजबूर होना पड़ा.’

जिग्नेश की बढ़ती स्वीकार्यता को लेकर समाजशास्त्री भी अपनी अलग राय रखते हैं. उनके मुताबिक हार्दिक और अल्पेश का जातिगत प्रभाव मोटे तौर पर गुजरात तक ही सीमित है. लेकिन दलितों के पूरे देश में फैले हुए होने की वजह से उनकी अगुवाई करने वाले जिग्नेश मेवानी का दायरा अपेक्षाकृत कहीं ज्यादा बढ़ गया है. हार्दिक और अल्पेश के साथ उन्हीं के समुदाय या वर्ग के लोग खड़े दिखते हैं. लेकिन दलित-मुस्लिम एकता की पैरोकारी करने और अल्पसंख्यकों के हक़ की बात उठाने की वजह से जिग्नेश मेवानी को मुसलमानों का भी खासा समर्थन मिला है. बताया जाता है कि जिग्नेश मेवानी आदिवासियों से भी जुड़ने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं. जानकारों की मानें तो इस कवायद में सफल होने पर मेवानी गुजरात की एक तिहाई आबादी (दलित+मुस्लिम+आदिवासी) के बड़े नेता के तौर पर स्थापित हो सकते हैं.

विचारधारा का भी फायदा

इन सभी कारणों के अलावा अपने राजनैतिक सफ़र में जिग्नेश मेवानी को उनकी विचारधारा की वजह से भी खासा फायदा मिलता रहा है जबकि हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर इस मोर्चे पर लगभग खाली हाथ रहे हैं. असल में जिग्नेश का झुकाव वामपंथ की तरफ माना जाता है. इसके चलते उन्हें इस विचारधारा को मानने वाले अलग-अलग लोगों जैसे- जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के युवा छात्र नेताओं, जमीन पर काम करने वाले कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, संगठन और आंदोलनकारियों के साथ कई ख्यात बुद्धिजीवियों से समर्थन के रूप में जबरदस्त ऊर्जा लगातार मिलती रही है.

जिग्नेश मेवानी की बढ़ती लोकप्रियता के लिए उनके एक करीबी आमजन से उनके जुड़ाव को सबसे ज्यादा श्रेय देते हैं. वे कहते हैं, ‘पूरा गुजरात जानता है कि ईमानदारी के मामले में जिग्नेश मेवानी का कोई सानी नहीं. उनके पास आज भी वही कपड़े और चप्पलें हैं जो पहले हुआ करती थीं. विधायक बनने के बाद भी मेवानी का बैंक बैलेंस सिर्फ एक लाख रुपए है और उनके पास अपनी कार तक नहीं है.’ गुजरात की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले एक पत्रकार कहते हैं, ‘मेवानी को लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचना बखूबी आता है. वे जानते हैं कि 20 लोगों के प्रदर्शन को 20 हजार लोगों तक कैसे पहुंचाया जाता है. इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर बेझिझक सीधा हमला बोलने की वजह से भी वे लगातार सुर्खियों में बने रहते हैं.’

विश्लेषकों का कहना है कि अपने बढ़ते कद की वजह से मेवानी न सिर्फ हार्दिक और अल्पेश बल्कि गुजरात कांग्रेस के कई नेताओं के लिए भी बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं. जानकार की मानें तो जिग्नेश मेवानी की सक्रियता से उन बड़े कांग्रेस नेताओं का जनाधार खिसकने का खतरा मंडरा रहा है जो खासतौर पर गुजरात में दलित-अल्पसंख्यक हितैषी होने का दम भरते हैं. इसके अलावा उनकी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से नजदीकियां बढ़ने से भी गुजरात कांग्रेस के कई दिग्गज खासे नाखुश देखे जा सकते हैं. प्रदेश कांग्रेस से जुड़े एक विश्वसनीय सूत्र के मुताबिक इस फेहरिस्त में अर्जुन मोढ़वाड़िया, सिद्धार्थ पटेल, शक्तिसिंह गोहिल और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष भरतसिंह सोलंकी जैसे नाम शामिल हैं.

हालांकि सत्याग्रह से हुई बातचीत में जिग्नेश मेवानी हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर से अपनी तुलना को सही नहीं मानते. वे कहते हैं, ‘हार्दिक और अल्पेश भी अपने स्तर पर कुछ न कुछ बेहतर करने की कोशिश करते रहे हैं.’ लेकिन ख़बरों में खुद के ज्यादा छाये रहने को लेकर जिग्नेश मेवानी का कहना है, ‘विधायक बनने से पहले भी मैं एक आंदोलनकारी था और आखिरी दम तक यही मेरी पहचान रहेगी. पर चूंकि देश भर में सबसे ज्यादा अत्याचार हमारे (दलितों के) ऊपर हो रहा है, इसलिए शायद हमारा प्रतिशोध भी सबसे ज्यादा दिखता है. और कुछ नहीं.’