71वें कान फिल्म फेस्टिवल पर 19 मई को परदा गिर गया. समारोह खत्म हो गया और शाबाशी प्राप्त कई अंतरराष्ट्रीय फिल्में देखने का इंतजार हमारी झोली में आ गिरा. साथ ही एक बार फिर हिंदुस्तान में कान को चंद खूबसूरत अभिनेत्रियों द्वारा लाल रंग की दरी पर अजीबो-गरीब कपड़े-लत्ते पहनकर चलने का प्रायोजित आयोजनभर बना दिया गया. लेकिन जानने वाले जानते-समझते रहे, और इसलिए कद्र करते रहे कि दुनियाभर में ऐसा कोई दूसरा फेस्टिवल नहीं है जिसे दुनियाभर की फिल्में दिखाने के लिए इस कदर सेलिब्रेट किया जाता हो. ऑस्कर्स जरूर कान से बड़ा महाआयोजन है, लेकिन याद रखने वाली बात है कि वो सिर्फ अमेरिकी सिनेमा का उत्सव है. बाकी दुनियाभर की फिल्मों को तो वो सिर्फ एक ‘फॉरेन लेंग्वेज’ कैटेगरी में समेट देता है.

वेनिस फिल्म फेस्टिवल को टक्कर देने के लिए 1946 में शुरू हुए कान फिल्म फेस्टिवल की एक खासियत यह भी है कि वहां पर प्रदर्शित हुई फिल्में अगर कमाल की होती हैं तो विश्वभर से आए सैकड़ों सिनेप्रेमी दर्शक उसके खत्म होने के बाद खड़े होकर देर तक तालियां बजाते हैं. जैसा कि 2015 में हमारी ‘मसान’ की स्क्रीनिंग के दौरान हुआ था, और सुना है इस बार नंदिता दास की ‘मंटो’ के साथ चार मिनट तक लगातार हुआ. ऐसा होना सबसे बड़े सम्मानों में गिना जाता है क्योंकि विश्वभर में ख्यात है कि कान की ऑडियन्स और समीक्षकों को लुभा पाना बेहद मुश्किल काम है. इतना, कि अगर पुरस्कार लायक किसी फिल्म को पुरस्कार नहीं भी मिलता, तब भी दशकों तक उसके जिक्र में फख्र के साथ कान में देर तक बजी तालियों का ब्यौरा सुंदर बनावट के साथ लिखा जाता है.

लेकिन जब ये तालियां नहीं बजतीं और उनकी जगह देर तक दर्शक फिल्म को हूट करते हैं - यानी शोर मचाकर अपनी नापसंदगी जाहिर करते हैं - तो बदकिस्मती से वो भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाता है. कहा भी जाता है कि कान फिल्म फेस्टिवल में अपनी फिल्म ले जाने वाला निर्देशक/निर्माता/एक्टर अगर किसी चीज से डरता है तो वो दर्शकों की इसी हूट करने की आदत से डरता है. इस समारोह के भूतपूर्व प्रेसीडेंट जिल जैकब के अनुसार तो, ‘हूटिंग कान फिल्म फेस्टिवल का राष्ट्रीय खेल है!’

अमेरिकी निर्देशक मार्टिन स्कॉरसेसी की सबसे मुकम्मल फिल्मों में से एक ‘टैक्सी ड्राइवर’ को एक जमाने में इसी तरह कान फिल्म फेस्टिवल में हूट किया गया था. क्लासिक का दर्जा पा चुकी ‘टैक्सी ड्राइवर’ उन चंद फिल्मों में से एक है जो ‘सर्वश्रेष्ठ अमेरिकी फिल्मों’ नाम की दर्जनों सूचियों में पहली पांच फिल्मों में हमेशा शामिल मिलती है. जब-जिसने भी कान फिल्म फेस्टिवल का सर्वोच्च सम्मान ‘पल्म डो’र जीतने वाली सर्वोत्तम फिल्मों की सूचियां बनाई है तो इसका नाम शुरुआती तीन सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में आता ही आता है. टेरंटीनो से लेकर अपने अनुराग कश्यप तक इसके कसीदे किसी भी वक्त पढ़ सकते हैं और दावे के साथ यह कहना फिजूलखर्ची नहीं है कि अपने मुख्य किरदार की इससे बेहतर ‘कैरेक्टर स्टडी’ करने वाली फिल्म बेहद कम बनी हैं. टेरंटीनो के अनुसार तो बनी ही नहीं हैं.

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1976 में अमेरिका में रिलीज होकर हिट होने के बाद ‘टैक्सी ड्राइवर’ ने उसी साल 29वें कान फिल्म फेस्टिवल में शिरकत की थी और रोमन पोलेंस्की, इतावली मूल के बेरतोलूची व स्वीडिश इंगमार बर्गमैन जैसे महान निर्देशकों की फिल्मों को पीछे छोड़कर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का बेहद प्रतिष्ठित पल्मडो’र पुरस्कार जीता था (स्कॉरसेसी की उम्र उस वक्त महज 33 साल थी).

लेकिन जब इस पुरस्कार की घोषणा की गई – ज्यूरी प्रमुख टेनेसी विलियम्स द्वारा जो कि खुद इस फिल्म के चुनाव के खिलाफ थे – तो वहां मौजूद दर्शकों ने इसके चयन पर जमकर हूटिंग की. फिल्म में दिखाई गई अति की हिंसा लोगों के बर्दाश्त से बाहर थी और खासकर फिल्म के रक्तरंजित क्लाइमेक्स पर दर्शकों को आपत्ति थी. उनकी ही तरह ज्यूरी प्रमुख अमेरिकी नाटककार टेनेसी विलियम्स भी इन्हीं कारणों से फिल्म को नापसंद कर चुके थे, लेकिन आखिर में ज्यूरी के बाकी सदस्यों की सूझबूझ ने एक महान कृति पर गलत फैसला लेने से कान फिल्म फेस्टिवल को बचा लिया था.

42 सालों से दर्शकों, समीक्षकों और आयोजकों को इसी तरह बांट रही ‘टैक्सी ड्राइवर’ की कहानी 70 के दशक वाले न्यूयॉर्क की है. वियतनाम युद्ध से लौटा उसका युवा नायक (या खलनायक?, इसपर आज भी बहसें गर्म होती रहती हैं) अपने आसपास मौजूद भ्रष्टाचार, वेश्यावृति और उनके प्रति शहरियों की असंवेदनशीलता से अंदर ही अंदर आक्रोशित रहता है. अनिद्रा ग्रसित होने के अलावा दुनिया से सदैव कटकर रहता है, और फिल्म उसके ‘अकेलेपन’ को हमारे चुक चुके समाज की सबसे बड़ी नाकामयाबी की तरह आलातरीन तरीके से पेश करती है.

इस किरदार का अकेलापन और उस अकेलेपन से पनपी सही-गलत की गलत समझ उसे हिंसा के चरम पर पहुंचा देती है और वो ऐसा ‘एंग्री यंग मैन’ बन जाता है जो कि 70 के ही दशक वाले हमारे अमिताभ बच्चन का एकदम विलोम कहलाएगा. इसी बीच रात में टैक्सी चलाने वाले इस नायक ट्रैविस बिकल (रॉबर्ट डी नीरो) को वेश्यालय में काम करने वाली एक कम उम्र लड़की (जोडी फोस्टर) से सहानुभूति हो जाती है और वेश्यावृति की दुनिया से उसे बाहर निकाल लाने को वो पाक काम मानकर खुद हिंसा के रास्ते पर चल पड़ता है.

महेश भट्ट साहब ने ‘टैक्सी ड्राइवर’ के इस हिस्से से ‘प्रभावित’ होकर 1991 में संजय दत्त कृत लव-स्टोरी ‘सड़क’ बनाई थी जिसमें कोठे का हिजड़ा मालिक बनकर सदाशिव अमरापुरकर ने रोएं खड़े कर देने वाला अभिनय किया था. लेकिन बॉलीवुड के मिजाज अनुसार भट्ट साहब ने अपने नायक को एकदम पाक-साफ दिखाया, क्योंकि विरोधाभासों की भसड़ मचाना हमारे हिंदी सिनेमा को आता कहां है!

‘टैक्सी ड्राइवर’ का नायक (या एंटी-हीरो) कई विरोधाभासों से मिलकर बना है. ट्रैविस बिकल समाज में पल-पल बढ़ रहे अपराधों से आक्रोशित है और उसे इसपर समाज का मौन समझ नहीं आता. वो इसके लिए कुछ करना चाहता है और विद्रोहकर विजलेंटी बनने की चाहत रखता है. यहां तक तो फिल्म की कहानी हीरोइज्म की आभा बिखेरने वाली दर्जनों फिल्मों सी ही आम है, लेकिन विरोधाभास जन्म लेते हैं जब वो सही काम करने के लिए निकलकर पागलपन की गर्त में समाने लगता है. अर्बन स्पेस का अकेलापन उसे टिपिकल नायक बनाने की जगह कुंठा की ऐसी आग में जलाने लगता है जिसे बुझा पाने वाली रेत वो ढूंढ़ नहीं पाता.

न सिर्फ भ्रष्टाचार और समाज के पाखंड से दुखी हर दौर के युवा ऐसे नायक से ‘कनेक्ट’ करते हैं, जिनकी भी कोई सुनता नहीं, बल्कि उसके द्वारा उठाए गए गलत कदमों को भी वो सीधे-सीधे गलत मान नहीं पाते. मार्टिन स्कॉरसेसी ने इस कड़वे सच की चीर-फाड़ जिस उत्तमता से की है वो विस्मित करने वाली है. उनके बाद कई निर्देशकों ने इस थीम के आसपास बेहतरीन फिल्में रची हैं और अभी-अभी याद आ रहा है कि अमेरिकी नाजी नायक की कहानी कहने वाली एडवर्ट नॉर्टन की ‘अमेरिकन हिस्ट्री एक्स’ (1998) भी ऐसी ही क्रूर फिल्म थी. ऐसी फिल्में अति की हिंसा में डूबे होने के बावजूद हिंसा का स्तुतिगान नहीं करतीं, बल्कि हर दौर की कड़वी सच्चाई हमारे सामने पेश करती हैं. सही-गलत का गलत मूल्यांकन कर बैठने वाला नायकों का (एंटी-हीरोज का) सही मूल्यांकन पेश करती हैं.

‘टैक्सी ड्राइवर’ को रॉबर्ट डी नीरो के अद्भुत अभिनय के लिए भी पुरजोर याद किया जाता है. पॉल श्रेडर के बेमिसाल स्क्रीनप्ले और मार्टिन स्कॉरसेसी के विजन को मूर्त रूप देने वाले रॉबर्ट डी नीरो ने इसमें मैथड एक्टिंग के उसूलों का इतना बेहतरीन क्रियान्वयन किया था कि लगा ही नहीं वे परदे पर अभिनय कर रहे हों. जैसे उनके अंदर ही सनकी और ‘यू टॉकिंग टू मी?’ पूछ कर डरा देने वाला ट्रैविस मौजूद हो जो किसी भी वक्त पिस्तौल निकालकर सामने वाले की हत्या करने की कुव्वत रखता हो.

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अपने ऐसे नायक की वजह से भी 42 साल पुरानी ‘टैक्सी ड्राइवर’ न सिर्फ आज के अमेरिकी समाज में फिर से मौजूं हो चुकी है – जिस देश का युवा अपने आसपास के लोगों से इस कदर कट रहा है कि उसका अकेलापन उसे विक्षिप्त इंसान बनाकर सार्वजनिक जगहों पर अंधाधुंध गोलीबारी तक करने को मजबूर कर रहा है – बल्कि मौजूदा हिंदुस्तान में भी ऐसे युवाओं के पनपने के आसार साफ-साफ नजर आ रहे हैं. अकेलेपन, बेरोजगारी और राजनीतिक प्रोपेगैंडा के घातक मिश्रण से तैयार हो रहे कई हिंदुस्तानी युवा क्या आपको सही का साथ देने के मुगालते में रहकर गलत रास्तों पर बढ़ते नजर नहीं आ रहे?

(‘टैक्सी ड्राइवर’ को आप इन दिनों नेटफ्लिक्स पर भी देख सकते हैं.)