ईस्टर्न पेरीफेरल एक्सप्रेस वे के लोकार्पण और रैली की तारीख - 27 मई - भाजपा ने बड़े जतन से तय की. कैराना में वोटिंग से ठीक एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली पर सवाल उठे. राजनीति के उच्च मानदंडों की बात हुई. लेकिन सियासत में सब जायज होता है. अब सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह रैली और उनकी बातें कैराना पर कितना असर डाल सकती हैं?

राजनीति संभावना का खेल है. लेकिन इसमें आशंका से भी बचा नहीं जा सकता. मोदी की बागपत रैली से ठीक पहले गन्ना बकाये को लेकर धरना दे रहे एक किसान की मौत हो गई. इसके बाद जयंत चौधरी ट्वीट कर इसे कैराना उपचुनाव का मुद्दा बना रहे थे और प्रधानमंत्री रैली में यह बता रहे थे कि किसानों के लिए उनकी सरकार ने क्या किया. नरेंद्र मोदी की बागपत रैली का तात्कालिक उद्देश्य कैराना उपचुनाव ही था, इससे शायद ही अब कोई सियासी जानकर इन्कार करे. मोदी ने अपने भाषण में पिछड़ी और दलित जातियों पर फोकस किया. उनकी सरकार इनके लिए क्या क्या कर रही है यह बताया. इनकी बदहाली के लिए उस कांग्रेस को जिम्मेदार बताया जो कैराना चुनाव नहीं लड़ रही है.

अगर कैराना उपचुनाव की बात करें तो भाजपा की प्राथमिक चिंता जाट समुदाय को लेकर है. 2014 के लोकसभा और बाद के विधानसभा चुनाव में इस समुदाय का भाजपा को पूरा समर्थन मिला. लेकिन राष्ट्रीय लोकदल के सुप्रीमो अजित सिंह और जयंत चौधरी की लगातार भावनात्मक अपीलों और बिरादरी के घटते राजनीतिक प्रभाव की बातों ने हालात कुछ बदले हैं. जानकारों का मानना है कि मुजफ्फरनगर दंगो के बाद अलग-अलग हुए जाट और मुसलमानों को एक करने की कोशिश में ये दोनों काफी हद तक कामयाब हुए हैं. इनका मानना हैं कि कैराना का नतीजा जो भी हो लेकिन अजित अपने मकसद में कामयाब दिखते हैं.

तो सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री ने भाजपा से दूर जाते दिख रहे जाटों को उससे जुड़े रहने की सीधी या सांकेतिक अपील क्यों नहीं की? कुछ लोगों का मानना है कि नरेंद्र मोदी ने सीधे तौर पर ऐसा भले न किया हो लेकिन वे जब किसानों की बात कर रहे थे तो वह अप्रत्यक्ष रूप से जाटों से जुड़ी बात ही थी. लेकिन ठीक चुनाव से पहले राजनेता अपने बयानों को इतने सामान्य तरीके से नहीं कहते, मोदी तो बिल्कुल नहीं? सियासी जानकर कहते हैं कि इसकी एक वजह यह हो सकती है कि भाजपा जाटों के बजाय अपना ध्यान दलित और पिछड़े मतदाताओं पर फोकस कर रही है. जयंत चौधरी कैराना उपचुनाव में जिस तरह सक्रिय हैं, उसने भी भाजपा को रणनीति बदलने पर मजबूर किया है. इसलिए वह उन पिछड़ी जातियों पर फोकस कर रही है जो फिलहाल कैराना में भाजपा के साथ दिखती हैं. पाल, कश्यप और सैनी बिरादरी के इलाके में कई विधायक हैं और इनके भाजपा से दूर होने की कोई वजह फिलहाल नहीं दिखती है. प्रधानमंत्री अपनी रैली के जरिये इन जातियों की गोलबंदी करते प्रतीत हो रहे थे.

अब दलित जातियों की बात. 2014 के बाद इलाके का सियासी माहौल काफी बदल चुका है. सहारनपुर में राजपूत-दलित संघर्ष के बाद हालात काफी बदले हैं और दलितों का भाजपा से मोहभंग हुआ है. मोदी के भाषण में दलितों पर लंबी बातचीत भाजपा की चिंता को बताती है. भाजपा जानती है कि कैराना में उनकी उम्मीदवार मृगांका को सजातीय गुर्जर समुदाय ,पिछड़ी जातियों के साथ अगर दलित वोट न मिला तो वह मुश्किल में आ सकती है. इसलिये प्रधानमंत्री दलित वोटरों को रिझाते नजर आ रहे थे.

कैराना चुनाव अजित सिंह के लिए बड़ा इम्तहान है. लेकिन मोदी के तीर उन पर के बजाय कांग्रेस पर चलते नज़र आ रहे थे. यह कर्नाटक चुनाव औऱ उसके बाद बनी परिस्थितियों का असर भी हो सकता है. अजित और जयंत पर वे खामोश रहे तो शायद इसलिए कि वे जाटों से जुड़े किसी भी तार को छेड़ने से बचना चाहते थे. कुल मिलाकर अब यह साफ है कि कैराना उपचुनाव में जाट और दलित वोट निर्णायक होने वाला है.