1940 के दशक के मध्य में सांप्रदायिक स्तर पर भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि लगभग तैयार हो चुकी थी. सांप्रदायिकता वह राजनैतिक शै है जो पैदा तो धर्म के नाम पर होती है, लेकिन असल इंसानी धर्म से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता. एक और सच्चाई यह भी है कि जाने-अनजाने इसमें अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक कहे जानेवाले सभी समुदाय अपना-अपना नकारात्मक योगदान देते हो सकते हैं. जवाहरलाल नेहरू को इसका बहुत नज़दीक से अनुभव हुआ था. घटना कुछ ऐसी थी कि कांग्रेस के एक मुस्लिम नेता को छुरा मार दिया गया, लेकिन मुस्लिम लीग के किसी भी नेता ने इसकी निंदा नहीं की. बल्कि मुस्लिम लीग द्वारा हत्यारे को माफ़ी के क़ाबिल समझा गया. इसके अलावा एक नया सिलसिला चल पड़ा था, जिसमें कांग्रेस की सरकार वाले सूबों के बारे में रोज़-रोज़ और बार-बार यह दोहराया जाने लगा कि ये सरकारें मुसलमानों पर ‘जुल्म’ कर रही हैं.

स्वयं नेहरू के शब्दों में - ‘ये ‘जुल्म’ क्या थे, यह आमतौर पर नहीं बताया गया. छोटी-छोटी मुक़ामी घटनाओं को, जिनका सरकार से कोई ताल्लुक नहीं था, तोड़ा-मरोड़ा गया और उनको बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया. कुछ महक़मों की कुछ छोटी-छोटी ग़लतियां, जिनको फौरन ही ठीक कर दिया गया, ‘जुल्म’ बन गईं.’ नेहरू आगे लिखते हैं - ‘...मुस्लिम लीग के मेंबरों और उससे हमदर्दी रखने वाले लोगों की तरफ़ से मुस्लिम जनता को यह इत्मीनान दिलाने का ज़बरदस्त आंदोलन चल रहा था कि बड़ी भयंकर घटनाएं घट रही हैं और उसके लिए कांग्रेस कुसूरवार है. वे ‘भयंकर बातें’ क्या थीं, यह किसी को भी नहीं मालूम था. लेकिन यह बात तय है कि इस शोर और हुल्लड़ के पीछे यहां नहीं तो कहीं-न-कहीं कुछ-न-कुछ ज़रूर रहा होगा. उप-चुनावों के मौकों पर यह आवाज़ उठाई गई कि इस्लाम ख़तरे में है और मुस्लिम लीगी उम्मीदवार को वोट देने के लिए मतदाताओं से कुरान की कसम खाने को कहा गया.’

इस तरह नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में अविभाजित भारत के समय की अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक वाली सांप्रदायिक राजनीति का बखूबी चित्रण किया है. लेकिन यदि तटस्थ रूप से समझने की कोशिश करें और तत्कालीन ‘मुस्लिम लीग’ को संदेह का लाभ (बेनिफिट ऑफ डाउट) देने की कोशिश करें, तो हम कह सकते हैं कि संभव है मुसलमानों के एक बड़े हिस्से को झूठा ही सही, लेकिन यह सचमुच लग रहा हो सकता है कि उनके साथ ‘जुल्म’ और ‘भयंकर घटनाएं’ घट रही थीं. इसलिए किसी भी समाज में ‘अल्पसंख्यकों’ के इस कल्पित असुरक्षा और अतिरेकपूर्ण पीड़ाबोध (विक्टिमहुड) के मनोविज्ञान को समझना बहुत जरूरी है. क्योंकि यही बीमारी आगे जाकर उस समाज के बहुसंख्यक तबके में भी बहुत तेजी से फैलती है और अविश्वास, प्रतिक्रिया, ध्रुवीकरण और अलगाव की पृष्ठभूमि तैयार होने लगती है.

आज़ादी के बाद भले ही भारत की डेमोग्राफी या जनसांख्यिकी परिस्थितियां काफी बदल गईं हों. भले ही, भारतीय संविधान के निर्माताओं ने अपनी परिपक्व दृष्टि का परिचय देते हुए इसमें अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए हों, लेकिन बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक का एक अविश्वासपूर्ण राजनीतिक द्वैध दुर्भाग्य से बना ही रह गया.

देखा जाए तो न्याय, मानवीयता और उदारता का पलड़ा हमेशा ही अल्पसंख्यकों की ओर थोड़ा झुका होता है. क्या करें! सामाजिक मूल्यों के हिसाब से उदारता की यही कसौटी हम सब मानकर चलते हैं. यदि मोटरसाइकिल और साइकिल सवार की टक्कर हो जाए, तो दोष हम मोटरसाइकिल वाले को ही देते हैं, भले ही थोड़ी गलती साइकिल वाले की भी क्यों न हो. ऐसा ही कार और मोटरसाइकिल की टक्कर की स्थिति में हमारी स्वाभाविक सहानुभूति मोटरसाइकिल सवार के साथ होती है.

कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति किसी भी समाज में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय के मामले में लागू होती है. बहुसंख्यक समुदाय से हमें ज्यादा जिम्मेदारी और उदारता की अपेक्षा होती है. लेकिन भारतीय समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भूमि और अन्य महत्वपूर्ण आर्थिक संसाधनों के वितरण के स्तर पर घोर असमानता मौजूद रही है. ऐसे में उपरोक्त उदारतावादी आदर्श को व्यावहारिक रूप से लागू कर पाने में राजनीतिक अड़चनें रही हैं. दिनोंदिन बढ़ रहे सांस्कृतिक अलगाव और अविश्वास ने इसे और भी जटिल बना दिया है. ऐसी स्थिति में हमें नेहरू के विचारों में आज की दोतरफा सांप्रदायिक राजनीति को भी समझने की कुंजी मिलती है. हम सबके अवचेतन में भरे सतही पीड़ाबोध (विक्टिमहुड) से जनित सांप्रदायिकता से अक्सर हम अनजान ही बने रहते हैं. इसलिए बने-बनाए विचारधारात्मक खांचों से निकलकर देखेंगे, तभी इस दुश्चक्र से बाहर निकलने का रास्ता मिलेगा.

40 के दशक में मध्य में नेहरू क्या खूब लिखते हैं - ‘सांप्रदायिक समस्या में अल्पसंख्यकों के अधिकारों का इस तरह मेल बिठाना था कि जिसमें बहुसंख्यकों की कार्रवाई के ख़िलाफ़ उन्हें काफ़ी संरक्षण हो. यहां यह बात ध्यान रखने की है कि हिंदुस्तान के अल्पसंख्यक यूरोप की तरह प्रजातीय (रेशियल) या अलग राष्ट्रीयता वाले अल्पसंख्यक नहीं हैं- वे धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक हैं. प्रजातीय (या जातीय) रूप से हिंदुस्तान में एक अजीब मिश्रण है, लेकिन यहां प्रजातीय सवाल न तो उठे हैं और न उठ ही सकते हैं. इन जातीय भिन्नताओं के ऊपर धर्म है, जो एक-दूसरे में घुला-मिला हुआ है, और उनको अलग-अलग पहचानना अक्सर मुश्किल होता है. ज़ाहिर है धार्मिक दीवारें स्थायी नहीं होतीं, क्योंकि एक से दूसरे में धर्म-परिवर्तन हो सकता है और धर्म बदलने से उस आदमी की जातीय पृष्ठभूमि, सांस्कृतिक और भाषा संबंधी विरासत मिट नहीं सकती.’

नेहरू आगे लिखते हैं - ‘लफ़्ज के असली मायनों में, धर्म ने हिन्दुस्तानी राजनैतिक झगड़ों में क़रीब-क़रीब कोई हिस्सा नहीं लिया. हां, वैसे इस लफ़्ज का अक्सर इस्तेमाल किया जाता है और उससे नाजायज़ फ़ायदा उठाया जाता है. अपने सहज रूप में धार्मिक मतभेदों से कोई अड़चन नहीं होती, क्योंकि उनमें आपस में बहुत भारी सहनशीलता है. राजनैतिक मामलों में धर्म की जगह सांप्रदायिकता ने ले ली है. सांप्रदायिकता वह संकरी मनोवृत्ति है, जिसने अपनी बुनियाद किसी धार्मिक गिरोह पर बना ली है, लेकिन जिसका मक़सद दरअसल राजनैतिक ताकत अपने हाथ में कर लेना और अपने समुदाय को बढ़ावा देना है.’

आगे इसी अध्याय में एक स्थान पर नेहरू लिखते हैं - ‘...हिन्दुस्तान का सारा इतिहास अल्पसंख्यकों या विचित्र जातीय समुदाय के प्रति सहनशीलता का ही नहीं, बल्कि प्रोत्साहन का साक्षी था. यूरोप में जैसे तीखे धार्मिक झगड़े रहे, और जैसा धार्मिक उत्पीड़न हुआ, उस ढंग की चीज हिन्दुस्तान के इतिहास में कहीं भी दिखाई नहीं देती. इसलिए धार्मिक और सांस्कृतिक उदारता और सहनशीलता के विचारों को सीखने के लिए हमको कहीं बाहर नहीं जाना था; ये बातें हिन्दुस्तान की ज़िंदगी में शुरू से थीं.

...तब क्या बात बाकी थी? यह डर कि बहुसंख्यक अल्पसंख्यकों को राजनीतिक रूप से दबा देंगे. साधारणतया इस तादाद के मानी थे किसान और मजदूर, जिनमें हर धर्म के माननेवाले आम लोग थे, जिनको बहुत अरसे से सिर्फ़ विदेशी राज्य ने ही नहीं, बल्कि ख़ुद ऊंचे वर्ग के लोगों ने चूसा था. धर्म और संस्कृति की हिफ़ाज़त का आश्वासन देने के बाद जो बड़े मसले सामने आते थे, वे आर्थिक होते, और उनका किसी आदमी के धर्म से कोई ताल्लुक़ न होता; और अगर धर्म खुद किसी निहित स्वार्थ की नुमाइंदगी न करे, तो धार्मिक झगड़ों का कोई सवाल ही नहीं था. हां, वर्ग संघर्ष शायद होते.

... फिर भी लोग धार्मिक-विच्छेद की दिशाओं में सोचने के आदी हो गए थे और सरकारी नीति (ब्रिटिश) और सांप्रदायिक और धार्मिक संस्थाओं से इसके लिए बराबर बढ़ावा मिलता रहता था कि यह डर कि बहुसंख्यक धार्मिक जाति, यानी हिंदू जाति, दूसरों को दबा लेगी. यह डर बहुत से मुसलमानों के दिमाग़ में बना रहा. यह बात समझ में नहीं आती थी कि मुसलमानों जैसी बड़ी अल्पसंख्यक जाति के हितों को कोई बहुसंख्यक जाति भी किस तरह चोट पहुंचा सकती है; क्योंकि मुसलमान खासतौर से देश के कुछ हिस्सों में केंद्रित थे और ये हिस्से खुदमुख़्तार होते. लेकिन भय में तर्क कहां होता है.’

और फिर नेहरू लिखते हैं - ‘...हिंदुओं की खास सांप्रदायिक संस्था हिंदू महासभा है, जो मुस्लिम लीग के बर-अक्स है और मुक़ाबले में कम महत्व की है. लीग की तरह वह भी आक्रामक रूप से सांप्रदायिक है, लेकिन वह अपने दृष्टिकोण की संकीर्णता को कुछ अस्पष्ट राष्ट्रीय शब्दावली में छिपाने की कोशिश करती है. वैसे उसका दृष्टिकोण प्रगतिशील नहीं है और वह फिर से बीते हुए युग को वापस लाना चाहती है. उसे बदक़िस्मती से कुछ ऐसे नेता मिले हैं, जो मुस्लिम लीग के नेताओं की तरह बहुत ग़ैर-ज़िम्मेदार और उत्तेजक बकवास करते हैं. यह लफ़्जी लड़ाई, जो दोनों तरफ से चलती रहती है और बराबर झुंझलाहट पैदा करती है. असल काम करने की जगह दोनों तरफ यही बकवास चलता रहता है.’

ध्यान रहे कि नेहरू ने यह बात अविभाजित भारत के दौर में लिखी थी जब अल्पसंख्यक होते हुए भी मुसलमानों की आबादी बहुत ज्यादा थी. खास इलाकों में वे बहुसंख्यक भी थे. लेकिन प्रकारांतर से देखें, तो मूल मसला अब भी कमोबेश वही है. सेकुलरिज़्म की एक अस्पष्ट सी प्रचलित अवधारणा दरअसल इतनी रूढ़ हो चुकी है कि वास्तव में भारत का कोई भी धार्मिक समुदाय इसे व्यावहारिकता में आत्मसात करने को मानसिक रूप से तैयार ही नहीं हो पाता. आज बहुसंख्यकवाद का हाथी यदि हमारी पकड़ से बाहर निकलता जा रहा है, तो इसका एक कारण ‘बहुसंख्यक’ और ‘अल्पसंख्यक’ दोनों के ही मानस को वास्तविकता के धरातल पर समझने में हुई चूक भी हो सकता है.

भारत में प्रतिक्रियावादी राजनीति जिस दिशा में बढ़ रही है उसे देखते हुए नेहरू के इन बेबाक वक्तव्यों को एकदम निर्मोही होकर समझना होगा. भारत में सांप्रदायिकता की समस्या दरअसल मनोवैज्ञानिक समस्या ज्यादा है. और यह दोतरफा या बहुतरफा है. एक अज्ञात और अबूझ-सा डर, अंतहीन विक्टिमहुड, काल्पनिक असुरक्षा और बीमार करनेवाली सामूहिक और सामुदायिक आत्महीनता - यह सब मिलकर विभिन्न समुदायों के बीच गलतफहमियों की मानसिक दीवारें पैदा कर देता है. और इस सबके ऊपर सबकी अपनी-अपनी मूढ़ धार्मिक आस्थाएं तो जैसे नीम चढ़े करेले की भांति कार्य करती हैं. आखिरकार ये सब मिलकर ही हमारी सहिष्णुता को, हमारे आपसी प्रेम और भाईचारे को, आपसी सम्मान और विश्वास को खाते जाते हैं. भारत के बहुसंख्यकों, प्रभावशाली अल्पसंख्यकों और हाशिए पर पड़े अनगिनत प्रकार के अल्पसंख्यकों, इन सबको अपने-अपने स्तर पर बहुत कुछ सीखना और बदलना होगा. इसके साथ वैचारिक लोगों में भी नेहरू की सी बेबाकी चाहिए होगी.