अफगानिस्तान के राशिद खान आईपीएल 2018 की नई सनसनी हैं. उनकी टीम सनराइज़र्स हैदराबाद आईपीएल के फाइनल में हार गई. लेकिन वे गर्व से कह सकते हैं - हारे हुए लश्कर में हूं, पर हूं बहादुर. इससे पहले वाले मैच में केकेआर के खिलाफ उनका थ्री इन वन प्रदर्शन ही हैदराबाद को फाइनल में लेकर आया था.

19 साल के इस खिलाड़ी की गुगली का अपना रहस्यवाद है. राशिद क्रिकेट में स्पिन बॉलिंग का नया ‘काबुलीवाला’ हैं जिसकी पोटली से निकली फिरकी महेंद्र सिंह धोनी जैसे धुरंधर को भी भौचक्का कर देती है. एबी डीविलियर्स और विराट कोहली की बिखरी गिल्लियां इस बात की तस्दीक कर चुकी हैं कि अभी यह फिरकीवाला दुनिया के महान बल्लेबाजों को अपने इशारे पर नचाने वाला है.

रिफ्यूजी कैंप में जिंदगी का टर्न

आज राशिद खान के पास सुर्खियां हैं और वे आईपीएल के सबसे काम के प्लेयर्स में एक माने जा रहे हैं. लेकिन राशिद के लिए सबकुछ इतना आसान न था. 1998 में नानगाहार, अफगानिस्तान में पैदा हुए उनके परिवार को अफगान गृहयुद्ध के चलते पाकिस्तान में शरण लेनी पड़ी. पांच-छह बरस के राशिद का क्रिकेट के प्रति रुझान तब बढ़ा जब वे रिफ्यूजी कैंप में लगे इकलौते टेलीविजन में मैच देखा करते थे. सैकड़ों के भीड़ से घिरा यह टीवी ही उनका कोच था. एक साक्षात्कार में राशिद बताते हैं, ‘अफरीदी जब विकेट लेते हुए लहराकर अपील करते थे तो मैं सोचता था मुझे भी ऐसे करना है.’

उनकी भी शुरुआत उसी टेनिस बॉल वाले गली क्रिकेट से हुई जिससे ज्यादातर भारतीय प्रायद्वीप के खिलाड़ियों की होती है. राशिद कहते हैं, ‘कैंप में खेलते वक़्त विकेट नहीं होता था. रूल था कि अगर बल्लेबाज गेंद मिस करेगा तो आउट.’ बल्लेबाज बॉल कैसे मिस करे, इसी कोशिश ने राशिद की बॉलिंग को एक अलग नैसर्गिक तेवर दिया. गली क्रिकेट का वह हुनर उन्हें आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में डॉट बॉल फेंकने में मदद करता है.

अफगानिस्तान में हालात ठीक हुए तो उनका परिवार वापस देश लौट गया. तीसरी दुनिया के मध्यमवर्गीय परिवारों की तरह उनके मां-बाप भी चाहते थे कि राशिद क्रिकेट के बजाय पढ़ाई पर ध्यान दें. लेकिन राशिद का अरमान कुछ और था. वे छुप कर क्रिकेट खेलते रहे और नेशनल लेवल तक आ पहुंचे.

उनके लेग स्पिनर बनने का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है. वे शुरू में टीम में एक ओपनर बल्लेबाज के तौर पर खिलाये गए. लेकिन तीन मैच के बाद उन्होंने बल्ले से कुछ खास नहीं किया. हां, तीन मैचों में 18 विकेट जरूर चटका दिये. तब उनके कप्तान ने कहा कि वे बॉलर हैं और उनका बल्लेबाजी क्रम आठ कर दिया गया. इसके बाद राशिद ने मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने आस्ट्रेलियन और कैरेबियन लीग खेली. 2017 के आईपीएल में भी उन्होंने अपनी गेंदबाजी से प्रभावित किया. लेकिन 2018 के आईपीएल ने उन्हें उस खास जमात में शामिल कर दिया, जहां अब उन्हें दुनिया के सबसे बेहतरीन लेग स्पिनरों में गिना जा रहा है.

बेंड इट लाइक बेकहम नहीं, बेंड इट लाइक अफगानी जलेबी

क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर ने उन्हें बीसम-बीस क्रिकेट का दुनिया का सबसे बेहतरीन लेग स्पिनर कहा है तो ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज डीन जोंस ने उन्हें किसी भी फार्मेट का सबसे बेहतरीन लेग स्पिनर करार दिया. यह तो दिग्गजों की बात हुई. उभरते हुए भारतीय बल्लेबाज केएल राहुल और ऋषभ पंत भी कहते हैं कि आईपीएल में जिस गेंदबाज को खेलना सबसे मुश्किल था वे थे राशिद खान अरमान.

यूं तो राशिद इस आईपीएल से पहले ही रिकॉर्ड बुक में अपने नाम के सामने दनादन उपलब्धियां दर्ज करा रहे थे. उन्होंने वनडे क्रिकेट में सबसे तेजी से 100 विकेट अपने नाम करने का रिकॉर्ड बनाया. आईसीसी रैंकिंग में पहला नंबर हासिल किया. सबसे कम उम्र में अफगान नेशनल टीम की कप्तानी हासिल की. लेकिन मौजूदा विश्व क्रिकेट की शक्तिपीठ भारत के आईपीएल जैसे टूर्नामेंट में उनके प्रदर्शन ने तहलका मचा दिया. उनकी तुलना लेग स्पिनर्स की उस बिरादरी से होने लगी जिसमें शेन वार्न और मुश्ताक अहमद जैसे गेंदबाज हैं. कुछ लोगों को अपने पहले ही टेस्ट में 16 विकेट चटकाने वाले भारतीय गेंदबाज नरेंद्र हिरवानी की गुगली भी याद आई.

आईपीएल जिसमें बल्लेबाज किसी रन मशीन की तरह काम करता है और अच्छी-खराब हर तरह की गेंद मारता है,उसमें प्रति ओवर सात से भी कम रन खर्च कर 21 विकेट झटकने वाले राशिद ने क्रिकेट विशेषज्ञों का दिल जीत लिया है. इंग्लैंड के तेज रफ्तार फुटबॉलर डेविड बेकहम पर बना मुहावरा बेंड इट लाइक बेकहम आईपीएल में बेंड इट लाइक अफगानी जलेबी हो गया.

ये लेग स्पिनर जरा जुदा किस्म का है

राशिद खान अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में आने से पहले शाहिद अफरीदी की तरह बॉलिंग करना चाहते थे. लेकिन अगर आज देखें तो अफरीदी से उनकी सिर्फ दो चीजें मिलती हैं- पहला उनका हाई आर्म एक्शन और दूसरा अपील करने का अंदाज. अफरीदी भी राशिद की तरह क्रीज में तेजी से गेंद लाते थे,लेकिम राशिद जैसी विविधता उनमें न थी. बाजुओं के सहारे तेज गति से गेंद करने वाले स्पिनर्स में उनकी तुलना अनिल कुंबले से की जा सकती है. लेकिन यहां सिर्फ स्पीड ही कॉमन है. अजंता मेंडिस को अबूझ स्पिनर कहा जाता था. लेकिन उनका रहस्य उनके अजीबोगरीब एक्शन और हाथ की बीच वाली अंगुली के इस्तेमाल का था. राशिद के साथ ऐसा कुछ नहीं है. उनका एक्शन बहुत सामान्य है,लेकिन फिर भी राशिद की ग्रिप और हाथ को देख बल्लेबाज अंदाजा नहीं लगा पाते कि वे गुगली डालेंगे या लेग ब्रेक या फिर कैरम बॉल.

राशिद के मुताबिक इतनी विविधता उनमें इसलिए आई कि शुरुआत में उनकी कोई औपचारिक कोचिंग नहीं हुई. इसलिए बल्लेबाज को आउट करने के लिए वे बॉल को अलग अलग तरीके से ग्रिप करने लगे. पूरे ओवर में कई किस्म की गेंदों का मिश्रण भी विकेट लेने की चाहत का नतीजा था. फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उनकी कोचिंग शुरू हुई, लेकिन तब तक राशिद अपनी बॉलिंग का एक सिग्नेचर बना चुके थे. उन्हें विकेट भी मिल रहे थे, लिहाजा कोच ने उन्हें छेड़ना ठीक नहीं समझा. अफगान टीम के कोच रह चुके डीन जोंस कहते हैं कि राशिद बॉल को चार तरीके से पकड़ता है. बांहों के इस्तेमाल के कारण गेंद तेजी से आती है और तब आप अंदाजा नहीं लगा पाते हैं कि गुगली आई है या लेग ब्रेक.

इसके अलावा अगर क्लासिक लेग स्पिन गेंदबाजों को देखे तो वे काफी फ्लाइट देते हैं और कलाइयों के सहारे विकेट के अंदर-बाहर से गेंद घुमाते हैं. महान स्पिनर शेन वार्न इसी मिजाज के गेंदबाज थे. लेकिन राशिद यहां भी कुछ अलग करते नजर आते हैं. वे विकेट टू विकेट बॉल करते हैं और कलाई के बजाय उंगलियों का इस्तेमाल करते हैं. राशिद कहते भी हैं कि जब वे अपनी बॉलिंग तकनीक के बारे में भारतीय स्पिनर कुलदीप यादव या यजुवेंद्र चहल से बात करते हैं तो वे उनके तरीके पर हैरानी जताते हैं कि ऐसे कोई लेग स्पिन कर सकता है.

लेकिन यही शायद इस बॉलर की मिस्ट्री है जिसका सामना भारतीय बल्लेबाज़ी को आने वाली अफगान टेस्ट सीरीज में करना होगा.