पिछले साल 24 अगस्त की बात है. उत्तर कश्मीर के बांदीपोरा ज़िले में पड़ने वाले कस्बे हाजिन के मुजफ्फर अहमद पररे अपने घर के पास एक रिश्तेदार के यहां पर थे. खाना खाकर शाम को वे अपने घर की तरफ निकले. देर रात तक जब मुज़फ्फर अपने घर नहीं पहुंचे तो चिंतित घरवालों और रिश्तेदारों ने एक-दूसरे से संपर्क किया. फिर उनकी तलाश शुरू हुई. लेकिन अगले दो दिन तक 24 साल के मुज़फ्फर का कहीं पता नहीं चला.

दो दिन के बाद जो हुआ उसने सिर्फ हाजिन में ही नहीं बल्कि पूरी कश्मीर घाटी में सनसनी फैला दी. 27 अगस्त की सुबह हाजिन के मंडी इलाके में झेलम के किनारे मुज़फ्फर की लाश मिली. लाश का सर कटा हुआ था और हाथ पीछे को बंधे हुए. मुज़फ्फर का कटा हुआ सर उनके परिजनों को अब तक नहीं मिला है.

इस बर्बर हत्या को लोग अगले कुछ दिनों में भूल गए जैसा कि अक्सर होता है. लेकिन हाजिन के लोग और ख़ासतौर पर मुज़फ्फर के घरवाले इस हत्या को अब तक भूल नहीं पाए हैं, या यूं कहें उनको भूलने नहीं दिया जा रहा. मुज़फ्फर की हत्या के बाद हाजिन में अब तक अज्ञात बंदूकधारियों ने सात और लोगों की रहस्यमय ढंग से बेरहमी से हत्या कर दी है. इनमें से छह इस साल अप्रैल और मई के महीनों में मारे गए हैं.

मारे गए छह लोगों में से एक का सर मुज़फ्फर की तरह ही धड़ से गायब था जबकि एक को पेड़ से बांधकर गला घोंट के उसकी हत्या कर दी गयी थी. इसके अलावा मारे जाने वालों में से एक की बीवी (जो मुज़फ्फर की बहन है) और दूसरे के पिता गंभीर रूप से घायल कर दिए गए थे. इन हत्याओं में हुई अभी तक की आखिरी हत्या 25 मई को देर रात हाजिन के ही गुंड प्रांग मोहल्ले में रहने वाले मुहम्मद याक़ूब वगय की हुई है. याक़ूब को उनके बीवी बच्चों के सामने ही कुछ नक़ाबपोश लोगों ने गला काट कर मार दिया.

जाहिर है हाजिन में दहशत का माहौल बना हुआ है. दूसरी ओर पूरी घाटी में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इतने बर्बर तरीके से ये हत्याएं कौन कर रहा है?

लश्कर जिम्मेदार

मुज़फ्फर की हत्या को पुलिस ने हत्या का आम मामला बताया था. लेकिन जैसे जैसे और हत्याएं होती गईं, पुलिस मिलिटेंट गुट लश्कर-ए-तैयबा को इन हत्याओं का ज़िम्मेदार ठहराती गयी. बांदीपोरा के एसपी शेख ज़ुल्फ़िक़ार आज़ाद, जिन्होंने मुज़फ्फर की हत्या को हत्या का आम सा मामला बताया था, ने कुछ दिन पहले 25 मई को हुई याक़ूब की हत्या के बाद कहा कि इन हत्याओं के लिए जिम्मेदार लश्कर-ए-तैयबा के गुट को जल्द ही उसके अंजाम तक पहुंचाया जाएगा. जुल्फिकार कहा कहना था, ‘लश्कर-ए-तैयबा के आठ से 10 मिलिटेंट हैं जो ये हत्याएं अंजाम दे रहे हैं. इनको जल्द ही मार गिराया जाएगा.’ पुलिस का कहना है कि ये हत्याएं लोगों में डर पैदा करने के लिए की जा रही हैं.

लेकिन क्या वाक़ई लश्कर-ए-तैयबा के मिलिटेंट इन हत्याओं के पीछे हैं और इन्हें अंजाम दे रहे हैं?

सत्याग्रह ने हाजिन में मारे गए लोगों के परिजनों के साथ एक-एक करके दो दिन तक बात की. लेकिन कहीं से भी कोई साफ जवाब नहीं मिला. मारे गए लोगों के परिजनों के साथ साथ पूरा हाजिन जितना भय में जी रहा है, उतने ही वहां के लोग हैरान भी हैं. कुछ सरकार को दोषी मान रहे हैं और कुछ यह कहकर मुंह मोड़ रहे हैं कि मारने वाले लोग नकाबपोश थे.

हाल तक कुछ लोग इन हत्याओं के लिए दबी जबान में मिलिटेंट्स को भी दोष दे रहे थे. इसका कारण यह था कि लश्कर-ए-तैयबा ने अभी तक इन हत्याओं की निंदा नहीं की थी. लेकिन 25 मई को हुई याक़ूब की हत्या के बाद लश्कर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आया जिसमें उसने याक़ूब और उनसे फ़ौरन पहले हुई हिलाल अहमद पररे की हत्या को ‘इंडियन एजेंसीज’ का काम बताया.

वीडियो में एक बिना चेहरे की आवाज़ बोलती हुई सुनाई पड़ती है, ‘इंडियन एजेंसीज चाहती हैं कि लोगों में मिलिटेंट्स के प्रति नफरत पैदा हो इसीलिए ये हत्याएं अंजाम दी जा रही हैं. हम याक़ूब और हिलाल की हत्याओं की कड़ी निंदा करते हैं और लोगों को बताना चाहते हैं कि यह हत्याएं हमने नहीं कीं.’

दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ हिलाल के घरवालों ने ही ढके-छिपे अल्फाज़ में मिलिटेंट्स को ज़िम्मेदार ठहराया था. हिलाल के पिता अब्दुल रशीद पररे ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा, ‘हमारा घर मिलिटेंसी से बहुत अरसे से जुड़ा हुआ है. मेरा छोटा भाई 90 के दशक में हिजबुल मुजाहिदीन का कमांडर हुआ करता था और आर्मी के हाथों मारा गया था.’ उन्हें उम्मीद है कि मिलिटेंट्स उनको उनके बेटे की गलती-जिसके लिए वह मारा गया-बताएंगे. उनका कहना था, ‘कम से कम हमें यह तो पता चले कि उसने किया क्या था. आप जानते हैं मिलिटेंट्स के हाथों मरना कश्मीर में किसी कलंक से कम नहीं है, क्योंकि इसका सीधा सा मतलब यह निकलता है कि मारा जाने वाला आर्मी का मुखबिर था, जो अपने आप में एक कलंक है.’

अब जबकि लश्कर ने हत्याओं की निंदा कर दी है बाकी लोगों की तरह ही उनके परिवारवालों की शक की सुई भी कहीं और घूमेगी. अभी तक लेकिन उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं कहा है.

जिनकी हत्याएं हुई हैं उनमें सिर्फ मुज़फ्फर के घर वाले स्पष्ट रूप से सुरक्षा बलों को दोषी मानते थे. जब मुज़फ्फर की हत्या हुई थी तो उनके परिजन इस बात को लेकर साफ थे कि मुज़फ्फर को उनकी ‘आज़ादी पसंद’ सोच के लिए मारा गया था. मुज़फ्फर के चाचा मेहराज-उद-दीन का कहना था, ‘मारे जाने से एक महीना पहले मुज़फ्फर तीन महीने की क़ैद से छूटे थे. पुलिस ने उन्हें इतना मारा था कि वो 20 दिन के बाद अपने पैरों पे खड़े हो पाए थे.’

मुज़फ्फर के परिवार ने यह आरोप भी लगाया था कि जिस रात वे गायब हुए उस रात उनके गांव में सुरक्षा बलों ने पहरा लगाया हुआ था. परिवार का कहना था कि उन्होंने मुज़फ्फर के गायब होने की पुलिस रिपोर्ट भी नहीं लिखाई थी क्यूंकि उन्हें लगता था कि मुज़फ्फर ने मिलिटेंसी में कदम रख दिया होगा. इसके अलावा मुज़फ्फर के मारे जाने से कुछ दिन पहले उनकी एक फोटो भी सोशल मीडिया पर आयी थी, जिसमें उन्होंने आर्मी की वर्दी पहन रखी थी और हाथ में हथियार भी था. इस तरीके की फोटोज सोशल मीडिया पर तभी आती हैं जब तसवीर वाले व्यक्ति ने मिलिटेंसी ज्वाइन कर ली हो. लेकिन मुज़फ्फर उसके बाद घर लौट आये थे.

इतने स्पष्ट बयान देने के बाद भी मुज़फ्फर का परिवार अब मीडिया से बात करते कतराता है. हुआ यूं कि इस साल दो अप्रैल को मुज़फ्फर के घर कुछ अज्ञात व्यक्ति घुस आये. उन्होंने मुजफ्फर की बहन नीलोफर के पेट में छुरा घोंप कर उनके पति नसीर अहमद शेख को अगवा कर लिया. नीलोफर तो बच गयीं लेकिन, अगली सुबह नसीर की गोलियों से छलनी हुई लाश उनके घर से एक किलोमीटर की दूरी पर पायी गयी.

मुज़फ्फर की हत्या की लश्कर ने निंदा कर दी थी लेकिन, नसीर की हत्या और नीलोफर पर हुए घातक वार की कोई निंदा नहीं हुई. इस बात ने मुज़फ्फर के घरवालों को हैरान-परेशान कर छोड़ा है. हालांकि नसीर के माता-पिता किसी पर उंगली नहीं उठा रहे. नसीर की मां मेहमूदा ने आंसुओं के बीच सत्याग्रह को बताया, ‘हमें क्या पता किस ने मारा. अपनी बीवी के पास गया था एक रात के लिए और लौटा ही नहीं.’

संक्षेप में कहा जाए तो जो कुछ भी हाजिन में हो रहा है चौंकाने वाला है. और जो चीज़ हाजिन में हो रही इन हत्याओं को और उलझाती है वह है हाजिन का समकालीन इतिहास. ज़रूरी है इस इतिहास पर एक सरसरी नज़र दौड़ाई जाए.

क्या जवाब इतिहास में छिपा है?

श्रीनगर से उत्तर की दिशा में लगभग 35 किलोमीटर पर स्थित हाजिन देखने में तो बाकी कस्बों की तरह ही एक आम सा इलाका है, लेकिन वास्तव में यह एक आम जगह नहीं है. कश्मीर में पिछले तीन दशक से चल रही मिलिटेंसी की कहानी में हाजिन का एक अहम किरदार बनता है. यह कस्बा 90 के दशक में इख्वान-उल-मुस्लिमीन या इख्वान का गढ़ था. तब मिलिटेंट्स सरकार से जा मिले थे और फिर उन्होंने साथ मिलकर मिलिटेंसी का सफाया किया था.

मुहम्मद यूसुफ़ पररे उर्फ़ कुका पररे इसी इख्वान के सूत्रधार हुआ करते थे. वे बाद में विधायक भी बने. 2003 में एक मिलिटेंट अटैक में वे मारे गए. कुका पररे हाजिन के पररे मोहल्ला के निवासी थे. यह वही पररे मोहल्ला है जहां के निवासी मारे गए मुज़फ्फर भी थे. कुका पररे का का नाम मानवाधिकार उल्लंघन के दर्जनों मामलों से जोड़ा जाता है. उनके हाजिन में उस समय काफी समर्थक रहे थे जो अब एक आम सी जिंदगी बसर कर रहे हैं.

अब जबकि पिछले एक दो साल में मिलिटेंट्स हाजिन में फिर से पैर जमाने लगे हैं, कुछ सूत्रों का यह भी मानना है कि अब हो रही हत्याएं कहीं न कहीं कुका पररे के दौर और उसमें हुए उत्पीड़न से जुडी हुई हैं. कम से कम 24 साल के एक चरवाहे, मंज़ूर अहमद भट की बर्बर ढंग से हुई हत्या से तो यही ज़ाहिर होता है. भट के पिता अब्दुल ग़फ़्फ़ार भट कुका पररे के ख़ास लोगों में से गिने जाते थे. वे अब ग़फ़्फ़ार हाजिन म्युनिसिपल कमेटी की प्लांटेशन डिविज़न में काम करते हैं. लेकिन उनका अतीत लोग नहीं भूले हैं.

इस साल चार अप्रैल की रात ग़फ़्फ़ार के घर में कुछ नक़ाबपोश आधी रात को घुसे और ग़फ़्फ़ार समेत उनके बेटे मंज़ूर को भी बंदूक की नोक पर अपने साथ ले गए. ग़फ़्फ़ार के परिवारजन कहते हैं कि उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया गया. करीब आधे घंटे बाद ग़फ़्फ़ार ज़ख़्मी हालत में घर लौटे. ग़फ़्फ़ार की बीवी साजा बेगम का कहना था, ‘उन्होंने हमें बताया कि वे जान छुड़ा के भाग रहे थे कि उनको बंधक बनाने वालों ने उनपर गोली चला दी.’ उनके मुताबिक ग़फ़्फ़ार को अस्पताल ले जाने के बाद परिवार मंज़ूर को खोजने में लग गया. मंज़ूर मिला लेकिन मुर्दा. छह अप्रैल को सुबह नौ बजे घर से एक किलोमीटर की दूरी पर मंज़ूर की सर कटी लाश मिली. उसका सर भी अब तक नहीं मिला है.

उत्तर कश्मीर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने सत्याग्रह को नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इख्वान एंगल को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता. उनका कहना था, ‘हाजिन और कश्मीर में इख्वान ख़तम हुआ है उसके समर्थक नहीं. हो सकता है वे लोग फिर से इकट्ठा होने की कोशिश में जुटे हुए हों और मिलिटेंट्स को इस बात का पता चल गया हो.’

एक और बात जिससे सुई इख्वान की तरफ घूमती है वह यह है कि मारे गए कम से कम तीन लोगों के परिजनों में से कोई न कोई लकड़ी के कारोबार से जुड़ा हुआ है. एक और सुरक्षा एजेंसी के सूत्र ने सत्याग्रह को बताया, ‘ग़फ़्फ़ार प्लांटेशन डिवीज़न में हैं और लोग उन्हें कूका परे के साथी के रूप में जानते रहे हैं. हिलाल के पिता 90 के दशक में लकड़ी का कारोबार करते थे और नसीर के पिता ग़ुलाम नबी शेख फारेस्ट डिपार्टमेंट के कर्मचारी हैं.’

सुनने में इनके पेशे आम से लगते हैं जिन पर इंसान ज़्यादा ध्यान नहीं देगा, लेकिन अतीत पर नज़र दौड़ाई जाए तो कुका परे को लकड़ी की तस्करी के लिए भी जाना जाता था और इसलिए भी कि उन्होंने अपने समर्थकों को फॉरेस्ट डिपार्टमेंट या लकड़ी के कारोबार से जुड़े विभागों में नौकरियां दिलायीं थी.

लेकिन दूसरी तरफ स्थानीय लोग इस बात को हिचकिचाते हुए ही सही नकार रहे हैं. सत्याग्रह से बात करते हुए हाजिन के एक बड़े व्यापारी का कहना था, ‘मिलिटेंट्स को इख्वान और कुका परे के समर्थक ही मारने होते तो उन्हीं को मारते, बच्चों को क्यों? और उनमें से सबसे जाने-माने लोग तो खुले आम अपना कामकाज कर रहे हैं. कुछ तो धार्मिक संस्थाएं भी चला रहे हैं.’

इनकी बात सुनकर एक नज़र फिर से दौड़ाई जाए तो इनका कहना भी ठीक ही लगता है. हाजिन के शाहगुंड इलाके के ग़ुलाम हसन डार अलवाववादियों के खुले समर्थक थे. उन्हें और उनके भतीजे बशीर अहमद डार को पांच मई की शाम घर से अगवा करके मार गिराया गया. दोनों का इख्वान से दूर दूर तक कोई नाता नहीं था.

कुल मिलाकर बात यह है कि जितने ज़्यादा सवाल हैं उतने ही कम जवाब. आम तौर पर ऐसे अपराधों के बाद जवाबों के लिए नज़रें पुलिस पर टिकी हुई होती हैं लेकिन, यहां पुलिस ने सब कुछ लश्कर पर थोप दिया है. आलम यह है कि पुलिस अब तक किसी भी पीड़ित परिवार के पास नहीं गई है. परिवार में से कुछ लोगों को थाने बुलाकर उनके बयान ले लिए जाते हैं. वारदात के मौके पर भी पुलिस सिर्फ एंबुलेंस भेजती है. यानी पुलिस से भी स्पष्ट जवाब मिलने की अभी कोई आशंका नहीं दिखाई दे रही.

उधर, हाजिन के लोग सिर्फ इतनी उम्मीद कर रहे हैं कि यह खूनखराबा बंद हो. हिलाल परे के घर पर एक बुज़ुर्ग की कही बात इस निराशा और भय का प्रतीक है. हिलाल के बुज़ुर्ग मामा ग़ुलाम मुहम्मद भट का कहना था, ‘हिंदुस्तान और पाकिस्तान को चाहिए कि कश्मीरी लोगों को गिनके उनका बंटवारा कर लें ताकि उनको ध्यान रहे कि किसको कितने लोगों की हत्या करनी है. फिर आराम से ज़मीन का बंटवारा करते रहेंगे ये लोग.’

उधर, उत्तर कश्मीर के बारामूला में भी एक मई को तीन युवकों की गोली मारके हत्या कर दी गई थी. सत्याग्रह ने उनके परिजनों से भी बात की. लेकिन ये हत्याएं हाजिन की कड़ी नहीं लगतीं. इन हत्याओं के सिलसिले में पुलिस ने कुछ लोगों को हिरासत में भी लिया है. मारे गए युवकों के परिजन अपराधियों के लिए मृत्यु दंड की मांग कर रहे हैं.