कच्चे तेल के महंगे होने से पेट्रोल और डीजल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं. हालांकि बीते तीन दिनों के दौरान इनमें कुछ कमी देखने को मिली है, लेकिन यह बहुत ही मामूली (14 पैसे) है. अब भी पेट्रोल दिल्ली में 79.29, मुंबई में 86.10, कोलकाता में 80.92 और चेन्नई में 81.28 रुपये प्रति लीटर की दर पर बेचा जा रहा है. इसी तरह दिल्ली में डीजल की बिक्री 69.20, मुंबई में 73.67, कोलकाता में 71.75 और चेन्नई में 73.06 रुपये प्रति लीटर पर की जा रही है.

हाल तक अटकलें लग रही थीं कि केंद्र इन उत्पादों के दाम घटाने वाला कोई उपाय करने जा रहा है. पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस तरह के बयान दिए थे. कुछ का कहना था कि चार साल पूरे होने पर मोदी सरकार शायद 26 मई को पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले उत्पाद करों में कटौती का कोई ऐलान करेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

अब कहा जा रहा है कि मोदी सरकार उत्पाद कर घटाने या तेल उत्पादन कंपनियों पर विंडफॉल टैक्स (तय कीमत से अधिक भाव वसूलने पर लगने वाला कर) की राह पर नहीं बढ़ेगी. जानकारों के अनुसार सरकार का मानना है कि ऐसे कदमों से उसकी या तेल कंपनियों की आमदनी कम हो जाएगी जिससे उसकी परेशानियां काफी बढ़ जाएंगी. यह भी दावा किया जा रहा है कि अभी कोई भी बड़ा चुनाव कम से कम छह महीने दूर है और इसलिए सरकार जनता की नाराजगी को लेकर अभी चिंतित नहीं है.

उधर, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वित्त वर्ष 2018-19 के अभी केवल दो ही महीने बीते हैं और ऐसे में उत्पाद कर यदि दो रुपये भी घटाए गए तो इससे केंद्र का राजस्व 25 हजार करोड़ रुपये तक कम हो सकता है. इससे विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को मिलने वाली राशि खासी कम हो जाएगी क्योंकि केंद्र सरकार मौजूदा वित्त वर्ष में वित्तीय घाटे को 3.3 फीसदी तक सीमित करने के लिए प्रतिबद्ध है. राजनीतिक समीक्षकों के अनुसार मोदी सरकार को डर है कि ऐसा होने से कई परियोजनाएं रुक सकती हैं और इससे भी जनता नाराज हो सकती है.

इसके अलावा मौजूदा संकेतों को देखते हुए केंद्र सरकार को उम्मीद है कि जून के बाद कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत कम हो सकती है. उसकी यह धारणा इसलिए भी मजबूत हुई है क्योंकि पिछले कुछ दिनों में ब्रेंट क्रूड आॅयल के भाव साढ़े चार डॉलर प्रति बैरल तक घट गए हैं. 23 मई को एक समय इसका दाम 79.76 डॉलर तक चला गया था लेकिन सोमवार को यह घटकर 75.25 डॉलर पर आ गया. फिलहाल यह 77.59 डॉलर पर है.

इस बीच एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 2017 के अपवाद को छोड़कर हर साल कच्चे तेल की कीमत जनवरी से जून के बीच बढ़ती है जबकि जुलाई से यह घटने लग जाती है. इस रिपोर्ट में पिछले साल ऐसा न होने का मुख्य कारण ओपेक और रूस द्वारा तेल उत्पादन में की गई कटौती को बताया गया है. लेकिन हाल में ओपेक और रूस ने संकेत दिया है कि वे जून के बाद तेल उत्पादन में कटौती का समझौता रोक सकते हैं. जानकारों का मानना है कि सरकार इस खबर में राहत की संभावना ढूंढ़ रही है.

इस बीच पिछले चार दिनों में रुपये की तुलना में डॉलर थोड़ा कमजोर हुआ है. शुक्रवार को एक डॉलर का भाव 67.22 रुपये रहा लेकिन, 24 मई को यह इससे करीब एक रुपये ज्यादा था. जानकारों के अनुसार रुपये की कमजोरी का सिलसिला फिलहाल थमने के आसार हैं. माना जा रहा है कि आने वाले वक्त में डॉलर के 68 रुपये के दायरे में रहने की संभावना से भी केंद्र सरकार कच्चे तेल की कीमतों को लेकर केंद्र सरकार थोड़ी निश्चिंत हुई है.

पिछले एक हफ्ते में हालात बदले

कच्चे तेल के दाम में अगर 1.5 डॉलर की परिवहन लागत मिला दें तो देश में एक बैरल कच्चे तेल का आवक मूल्य फिलहाल लगभग 79 डॉलर आ रहा है. इसमें रुपये की मजबूती को भी शामिल कर लें तो केवल एक हफ्ते में कच्चे तेल का आवक मूल्य 1.5 रुपये (भाव 33.5 रुपये लीटर) घट गया है. हालांकि कर सहित तमाम प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद पेट्रोल और डीजल की अंतिम कीमतों में इससे करीब दो रुपये का अंतर आने की संभावना है. मोदी सरकार के लिए यह स्थिति थोड़ी राहत देने वाली है. जानकारों के अनुसार आने वाले हफ्तों में सरकार ऐसी राहत के बढ़ने का इंतजार कर रही है. अब देखना यह है कि आने वाले हफ्तों के अंतरराष्ट्रीय हालात क्या सरकार की इन उम्मीदों को पूरा कर पाएंगे या नहीं.

मौजूदा वित्त वर्ष में अभी 10 महीने बाकी हैं. ऐसे में कुछ आलोचकों का यह भी मानना है कि यदि कटौती की जरूरत पड़ी भी तो सरकार शायद मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में यह फैसला करेगी. इससे केंद्र के राजस्व को उतनी तगड़ी चपत नहीं लगेगी और आने वाले राज्यों और अगले साल होने वाले आम चुनावों के लिए भी माहौल सही हो जाएगा.